भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 558 में से

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पृष्ठ 229

२१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्सन्निधानादपयान्तु सद्यो<br>रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे ॥ ३७अतः उनकी सन्निधिके कारण समस्त राक्षस और असुरगण यहाँसे तुरन्त भाग जायँ' ॥ ३७ ॥
तृप्तेष्वेतेषु विकिरेदन्नं विप्रेषु भूतले।<br>दद्यादाचमनार्थाय तेभ्यो वारि सकृत्सकृत् ॥ ३८तदनन्तर ब्राह्मणोंके तृप्त हो जानेपर थोड़ा-सा अन्न पृथिवीपर डाले और आचमनके लिये उन्हें एक-एक बार और जल दे ॥ ३८ ॥
सुतृप्तैस्तैरनुज्ञातस्सर्वैणान्नेन भूतले।<br>सतिलेन ततः पिण्डान्सम्यग्दद्यात्समाहितः ॥ ३९फिर भलीप्रकार तृप्त हुए उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा होनेपर समाहितचित्तसे पृथिवीपर अन्न और तिलके पिण्ड-दान करे ॥ ३९ ॥
पितृतीर्थेन सतिलं तथैव सलिलाञ्जलिम्।<br>मातामहेभ्यस्तेनैव पिण्डांस्तीर्थेन निर्वपेत् ॥ ४०और पितृतीर्थसे तिलयुक्त जलांजलि दे तथा मातामह आदिको भी उस पितृतीर्थसे ही पिण्ड-दान करे ॥ ४० ॥
दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु पुष्पधूपादिपूजितम्।<br>स्वपित्रे प्रथमं पिण्डं दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ ॥ ४१ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट (जूठन)-के निकट दक्षिणकी ओर अग्रभाग करके बिछाये हुए कुशाओंपर पहले अपने पिताके लिये पुष्प-धूपादिसे पूजित पिण्डदान करे ॥ ४१ ॥
पितामहाय चैवान्यं तत्पित्रे च तथापरम्।<br>दर्भमूले लेपभुजः प्रीणयेल्लेपघर्षणैः ॥ ४२तत्पश्चात् एक पिण्ड पितामहके लिये और एक प्रपितामहके लिये दे और फिर कुशाओंके मूलमें हाथमें लगे अन्नको पोंछकर ['लेपभागभुजस्तृप्यन्ताम्' ऐसा उच्चारण करते हुए ] लेपभोजी पितृगणको तृप्त करे ॥ ४२ ॥
पिण्डैर्मातामहांस्तद्वद्गन्धमाल्यादिसंयुतैः।<br>पूजयित्वा द्विजाग्र्याणां दद्याच्चाचमनं ततः ॥ ४३इसी प्रकार गन्ध और मालादियुक्त पिण्डोंसे मातामह आदिका पूजन कर फिर द्विजश्रेष्ठोंको आचमन करावे ॥ ४३ ॥
पितृभ्यः प्रथमं भक्त्या तन्मनस्को नरेश्वर।<br>सुस्वधेत्याशिषा युक्तां दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम् ॥ ४४और हे नरेश्वर ! इसके पीछे भक्तिभावसे तन्मय होकर पहले पितृपक्षीय ब्राह्मणोंका 'सुस्वधा' यह आशीर्वाद ग्रहण करता हुआ यथाशक्ति दक्षिणा दे ॥ ४४ ॥
दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो वाचयेद्वैश्वदेविकान्।<br>प्रीयन्तामिह ये विश्वेदेवास्तेन इतीरयेत् ॥ ४५फिर वैश्वदैविक ब्राह्मणोंके निकट जा उन्हें दक्षिणा देकर कहे कि 'इस दक्षिणासे विश्वेदेवगण प्रसन्न हों' ॥ ४५ ॥
तथेति चोक्ते तैर्विप्रैः प्रार्थनीयास्तथाशिषः।<br>पश्चाद्विसर्जयेद्देवान्पूर्वं पित्र्यान्महीपते ॥ ४६उन ब्राह्मणोंके 'तथास्तु' कहनेपर उनसे आशीर्वादके लिये प्रार्थना करे और फिर पहले पितृपक्षके और पीछे देवपक्षके ब्राह्मणोंको विदा करे ॥ ४६ ॥
मातामहानामप्येवं सह देवैः क्रमः स्मृतः।<br>भोजने च स्वशक्त्या च दाने तद्वद्विसर्जने ॥ ४७विश्वेदेवगणके सहित मातामह आदिके श्राद्धमें भी ब्राह्मण-भोजन, दान और विसर्जन आदिकी यही विधि बतलायी गयी है ॥ ४७ ॥
आपादशौचनात्पूर्वं कुर्याद्देवद्विजन्मसु।<br>विसर्जनं तु प्रथमं पैत्रमातामहेषु वै ॥ ४८पितृ और मातामह दोनों ही पक्षोंके श्राद्धोंमें पादशौच आदि सभी कर्म पहले देवपक्षके ब्राह्मणोंके करे; परन्तु विदा पहले पितृपक्षीय अथवा मातामहपक्षीय ब्राह्मणोंकी ही करे ॥ ४८ ॥
विसर्जयेत्प्रीतिवचस्सम्मान्याभ्यर्थितांस्ततः।<br>निवर्त्तेताभ्यनुज्ञात आद्वारं ताननुव्रजेत् ॥ ४९तदनन्तर प्रीतिवचन और सम्मानपूर्वक ब्राह्मणोंको विदा करे और उनके जानेके समय द्वारतक उनके पीछे-पीछे जाय तथा जब वे आज्ञा दें तो लौट आवे ॥ ४९ ॥
ततस्तु वैश्वदेवाख्यं कुर्यान्नित्यक्रियां बुधः।<br>भुञ्जीयाच्चैव समं पूज्यभृत्यबन्धुभिरात्मनः ॥ ५०फिर विज्ञ पुरुष वैश्वदेव नामक नित्यकर्म करे और अपने पूज्य पुरुष, बन्धुजन तथा भृत्यगणके सहित स्वयं भोजन करे ॥ ५० ॥
एवं श्राद्धं बुधः कुर्यात्पित्र्यं मातामहं तथा।<br>श्राद्धैराप्यायिता दद्युस्सर्वान्कामान्पितामहाः ॥ ५१बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकार पैत्र्य और मातामह-श्राद्धका अनुष्ठान करे। श्राद्धसे तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ ५१ ॥