विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] * तृतीय अंश * २१९
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।
रजतस्य तथा दानं कथासंकीर्तनादिकम्॥ ५२
वर्ज्यानि कुर्वता श्राद्धं क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा।
भोक्तुरप्यत्र राजेन्द्र त्रयमेतन्न शस्यते॥ ५३
विश्वेदेवास्सपितरस्तथा मातामहा नृप।
कुलं चाप्यायते पुंसां सर्वं श्राद्धं प्रकुर्वताम्॥ ५४
सोमाधारः पितृगणो योगाधारश्च चन्द्रमाः।
श्राद्धे योगिनियोगस्तु तस्माद्भूपाल शस्यते॥ ५५
सहस्रस्यापि विप्राणां योगी चेत्पुरतः स्थितः।
सर्वान्भोक्तूंस्तारयति यजमानं तथा नृप॥ ५६
दौहित्र (लड़कीका लड़का), कुतप (दिनका आठवाँ मुहूर्त) और तिल—ये तीन तथा चाँदीका दान और उसकी बातचीत करना—ये सब श्राद्धकालमें पवित्र माने गये हैं॥ ५२॥ हे राजेन्द्र! श्राद्धकर्ताके लिये क्रोध, मार्गगमन और उतावलापन—ये तीन बातें वर्जित हैं; तथा श्राद्धमें भोजन करनेवालोंको भी इन तीनोंका करना उचित नहीं है॥ ५३॥
हे राजन्! श्राद्ध करनेवाले पुरुषसे विश्वेदेवगण, पितृगण, मातामह तथा कुटुम्बीजन—सभी सन्तुष्ट रहते हैं॥ ५४॥ हे भूपाल! पितृगणका आधार चन्द्रमा है और चन्द्रमाका आधार योग है, इसलिये श्राद्धमें योगिजनको नियुक्त करना अति उत्तम है॥ ५५॥ हे राजन्! यदि श्राद्धभोजी एक सहस्र ब्राह्मणोंके सम्मुख एक योगी भी हो तो वह यजमानके सहित उन सबका उद्धार कर देता है॥ ५६॥
इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
सोलहवाँ अध्याय
श्राद्ध-कर्ममें विहित और अविहित वस्तुओंका विचार
और्व उवाच
हविष्यमत्स्यमांसैस्तु शशस्य नकुलस्य च।
सौकरच्छागलैणेयौरवैर्र्गवयेन च॥ १
औरभ्रगव्यैश्च तथा मासवृद्ध्या पितामहाः।
प्रयान्ति तृप्तिं मांसैस्तु नित्यं वार्ध्रीणसामिषैः॥ २
खड्गमांसमतीवात्र कालशाकं तथा मधु।
शस्तानि कर्मण्यत्यन्ततृप्तिदानि नरेश्वर॥ ३
और्व बोले— हवि, मत्स्य, शशक (खरगोश), नकुल, शूकर, छाग, कस्तूरिया मृग, कृष्ण मृग, गवय (वनगाय) और मेषके मांसोंसे तथा गव्य (गौके दूध-घी आदि)-से पितृगण क्रमशः एक-एक मास अधिक तृप्ति लाभ करते हैं और वार्ध्रीणस पक्षीके मांससे सदा तृप्त रहते हैं॥ १-२॥ हे नरेश्वर! श्राद्धकर्ममें गेंडेका मांस, कालशाक और मधु अत्यन्त प्रशस्त और अत्यन्त तृप्तिदायक हैं*॥ ३॥
* इन तीन श्लोकोंका मूलके अनुसार अनुवाद कर दिया गया है। समझमें नहीं आता, इस व्यवस्थाका क्या रहस्य है? मालूम होता है, श्रुति-स्मृतिमें जहाँ कहीं मांसका विधान है, वह स्वाभाविक मांसभोजी मनुष्योंकी प्रवृत्तिको संकुचित और नियमित करनेके लिये ही है। सभी जगह उत्कृष्ट धर्म तो मांसभक्षणका सर्वथा त्याग ही माना गया है। मनुस्मृति अ० ५ में मांसप्रकरणका उपसंहार करते हुए श्लोक ४५ से ५६ तक मांसभक्षणकी निन्दा और निरामिष आहारकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है। श्राद्धकर्ममें मांस कितना निन्दनीय है, यह श्रीमद्भागवत सप्तम स्कन्ध अध्याय १५ के इन श्लोकोंसे स्पष्ट हो जाता है—
न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित्। मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया॥ ७॥
नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम्। न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः॥ ८॥
द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्ट्वा भूतानि बिभ्यति। एष माऽकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम्॥ १०॥
अर्थ- धर्मके मर्मको समझनेवाला पुरुष श्राद्धमें [खानेके लिये] मांस न दे और न स्वयं ही खाय, क्योंकि पितृगणकी तृप्ति जैसी मुनिजनोचित आहारसे होती है वैसी पशुहिंसासे नहीं होती॥ ७॥ सद्धर्मकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये 'सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और शरीरसे दण्डका त्याग कर देना'—इसके समान और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है॥ ८॥ पुरुषको द्रव्ययज्ञसे यजन करते देखकर जीव डरते हैं कि यह अपने ही प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दय अज्ञानी मुझे अवश्य मार डालेगा॥ १०॥