विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १७ |
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देवा ऊचुः
आराधनाय लोकानां विष्णोरीशस्य यां गिरम्।
वक्ष्यामो भगवानाद्यस्तया विष्णुः प्रसीदतु ॥ ११
यतो भूतान्यशेषाणि प्रसूतानि महात्मनः।
यस्मिंश्च लयमेष्यन्ति कस्तं स्तोतुमिहेश्वरः ॥ १२
तथाप्यरातिविध्वंसध्वस्तवीर्या भयार्थिनः।
त्वां स्तोष्यामस्तवोक्तीनां याथार्थ्यं नैव गोचरे ॥ १३
त्वमुर्वी सलिलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।
समस्तमन्तःकरणं प्रधानं तत्परः पुमान् ॥ १४
एकं तवैतद्भूतात्मन्मूर्त्तामूर्त्तमयं वपुः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं स्थानकालविभेदवत् ॥ १५
तत्रेश तव यत्पूर्वं त्वन्नाभिकमलोद्भवम्।
रूपं विश्वोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६
शक्रार्करुद्रवस्वश्विमरुत्सोमादिभेदवत् ।
वयमेकं स्वरूपं ते तस्मै देवात्मने नमः ॥ १७
दम्भप्रायमसम्बोधि तितिक्षादमवर्जितम्।
यद्रूपं तव गोविन्द तस्मै दैत्यात्मने नमः ॥ १८
नातिज्ञानवहा यस्मिन्नाड्यः स्तिमिततेजसि।
शब्दादिलोभि यत्तस्मै तुभ्यं यक्षात्मने नमः ॥ १९
क्रौर्यमायामयं घोरं यच्च रूपं तवासितम्।
निशाचरात्मने तस्मै नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ २०
स्वर्गस्थधर्मिसद्धर्मफलोपकरणं तव।
धर्माख्यं च तथा रूपं नमस्तस्मै जनार्दन ॥ २१
हर्षप्रायमसंसर्गी गतिमद्गमनादिषु।
सिद्धाख्यं तव यद्रूपं तस्मै सिद्धात्मने नमः ॥ २२
अतितिक्षायनं क्रूरमुपभोगसहं हरे।
द्विजिह्वं तव यद्रूपं तस्मै नागात्मने नमः ॥ २३
अवबोधि च यच्छान्तमदोषमपकल्मषम्।
ऋषिरूपात्मने तस्मै विष्णो रूपाय ते नमः ॥ २४
भक्षयत्यथ कल्पान्ते भूतानि यदवारितम्।
त्वद्रूपं पुण्डरीकाक्ष तस्मै कालात्मने नमः ॥ २५
देवगण बोले— हमलोग लोकनाथ भगवान् विष्णुकी आराधनाके लिये जिस वाणीका उच्चारण करते हैं, उससे वे आद्य-पुरुष श्रीविष्णुभगवान् प्रसन्न हों ॥ ११ ॥ जिन परमात्मासे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न हुए हैं और जिनमें वे सब अन्तमें लीन हो जायँगे, संसारमें उनकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है ? ॥ १२ ॥ हे प्रभो ! यद्यपि आपका यथार्थ स्वरूप वाणीका विषय नहीं है तो भी शत्रुओंके हाथसे विध्वस्त होकर पराक्रमहीन हो जानेके कारण हम अभय-प्राप्तिके लिये आपकी स्तुति करते हैं ॥ १३ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अन्तःकरण, मूल-प्रकृति और प्रकृतिसे परे पुरुष—ये सब आप ही हैं ॥ १४ ॥ हे सर्वभूतात्मन् ! ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त स्थान और कालादि भेदयुक्त यह मूर्त्तामूर्त्त पदार्थमय सम्पूर्ण प्रपंच आपहीका शरीर है ॥ १५ ॥ आपके नाभि-कमलसे विश्वके उपकारार्थ प्रकट हुआ जो आपका प्रथम रूप है, हे ईश्वर ! उस ब्रह्मस्वरूपको नमस्कार है ॥ १६ ॥ इन्द्र, सूर्य, रुद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और सोम आदि भेदयुक्त हमलोग भी आपहीका एक रूप हैं; अतः आपके उस देवरूपको नमस्कार है ॥ १७ ॥ हे गोविन्द ! जो दम्भमयी, अज्ञानमयी तथा तितिक्षा और दम्भसे शून्य है, आपकी उस दैत्य-मूर्तिको नमस्कार है ॥ १८ ॥ जिस मन्दसत्त्व स्वरूपमें हृदयकी नाड़ियाँ अत्यन्त ज्ञानवाहिनी नहीं होतीं तथा जो शब्दादि विषयोंका लोभी होता है, आपके उस यक्षरूपको नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आपका जो क्रूरता और मायासे युक्त घोर तमोमय रूप है, उस राक्षसस्वरूपको नमस्कार है ॥ २० ॥ हे जनार्दन ! जो स्वर्गमें रहनेवाले धार्मिक जनोंके यागादि सद्धर्मोंके फल (सुखादि)-की प्राप्ति करानेवाला आपका धर्म नामक रूप है उसे नमस्कार है ॥ २१ ॥ जो जल-अग्नि आदि गमनीय स्थानोंमें जाकर भी सर्वदा निर्लिप्त और प्रसन्नतामय रहता है वह सिद्ध नामक रूप आपहीका है; ऐसे सिद्धस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥ हे हरे ! जो अक्षमाका आश्रय अत्यन्त क्रूर और कामोपभोगमें समर्थ आपका द्विजिह्व (दो जीभवाला) रूप है, उन नागस्वरूप आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥ हे विष्णो ! जो ज्ञानमय, शान्त, दोषरहित और कल्मषहीन है, उस आपके मुनिमय स्वरूपको नमस्कार है ॥ २४ ॥ जो कल्पान्तमें अनिवार्यरूपसे समस्त भूतोंका भक्षण कर जाता है, हे पुण्डरीकाक्ष ! आपके उस कालस्वरूपको नमस्कार है ॥ २५ ॥