भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० १७ ] * तृतीय अंश * २२३

सम्भक्ष्य सर्वभूतानि देवादीन्यविशेषतः।<br>नृत्यत्यन्ते च यद्रूपं तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥ २६जो प्रलयकालमें देवता आदि समस्त प्राणियोंको सामान्य भावसे भक्षण करके नृत्य करता है आपके उस रुद्रस्वरूपको नमस्कार है॥ २६॥
प्रवृत्त्या रजसो यच्च कर्मणां करणात्मकम्।<br>जनार्दन नमस्तस्मै त्वद्रूपाय नरात्मने ॥ २७रजोगुणकी प्रवृत्तिके कारण जो कर्मोंका करणरूप है, हे जनार्दन ! आपके उस मनुष्यात्मक स्वरूपको नमस्कार है॥ २७॥
अष्टाविंशद्वधोपेतं यद्रूपं तामसं तव।<br>उन्मार्गगामि सर्वात्मंस्तस्मै वश्यात्मने नमः ॥ २८हे सर्वात्मन् ! जो अट्ठाईस वध-युक्त* तमोमय और उन्मार्गगामी है आपके उस पशुरूपको नमस्कार है॥ २८॥
यज्ञाङ्गभूतं यद्रूपं जगतः स्थितिसाधनम्।<br>वृक्षादिभेदैष्षड्भेदै तस्मै मुख्यात्मने नमः ॥ २९जो जगत्की स्थितिका साधन और यज्ञका अंगभूत है तथा वृक्ष, लता, गुल्म, वीरुध, तृण और गिरि—इन छः भेदोंसे युक्त हैं उन मुख्य (उद्भिद्)-रूप आपको नमस्कार है॥ २९॥
तिर्यङ्मनुष्यदेवादि व्योमशब्दादिकं च यत्।<br>रूपं तवादेः सर्वस्य तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ३०तिर्यक्, मनुष्य तथा देवता आदि प्राणी, आकाशादि पंचभूत और शब्दादि उनके गुण—ये सब, सबके आदिभूत आपहीके रूप हैं; अतः आप सर्वात्माको नमस्कार है॥ ३०॥
प्रधानबुद्ध्यादिमयादशेषा-<br>$\quad$द्यदन्यदस्मात्परमं परात्मन्।<br>रूपं तवाद्यं यदनन्यतुल्यं<br>$\quad$तस्मै नमः कारणकारणाय ॥ ३१हे परमात्मन्! प्रधान और महत्तत्वादिरूप इस सम्पूर्ण जगत्‌से जो परे है, सबका आदि कारण है तथा जिसके समान कोई अन्य रूप नहीं है, आपके उस प्रकृति आदि कारणोंके भी कारण रूपको नमस्कार है॥ ३१॥
शुक्लादिदीर्घादिघनादिहीन-<br>$\quad$मगोचरं यच्च विशेषणानाम्।<br>शुद्धातिशुद्धं परमर्षिदृश्यं<br>$\quad$रूपाय तस्मै भगवन्नताः स्मः ॥ ३२हे भगवन्! जो शुक्लादि रूपसे, दीर्घता आदि परिमाणसे तथा घनता आदि गुणोंसे रहित है, इस प्रकार जो समस्त विशेषणोंका अविषय है, तथा परमर्षियोंका दर्शनीय एवं शुद्धातिशुद्ध है, आपके उस स्वरूपको हम नमस्कार करते हैं॥ ३२॥
यन्नः शरीरेषु यदन्यदेहे-<br>$\quad$ष्वशेषवस्तुष्वजमक्षयं यत्।<br>तस्माच्च नान्यद्व्यतिरिक्तम्स्ति<br>$\quad$ब्रह्मस्वरूपाय नताः स्म तस्मै ॥ ३३जो हमारे शरीरोंमें, अन्य प्राणियोंके शरीरोंमें तथा समस्त वस्तुओंमें वर्तमान है, अजन्मा और अविनाशी है तथा जिससे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है, उस ब्रह्मस्वरूपको हम नमस्कार करते हैं॥ ३३॥
सकलमिदमजस्य यस्य रूपं<br>$\quad$परमपदात्मवतस्सनातन्स्य ।<br>तमनिधनमशेषबीजभूतं<br>$\quad$प्रभुममलं प्रणतास्म वासुदेवम् ॥ ३४परम पद ब्रह्म ही जिनका आत्मा है ऐसे जिस सनातन और अजन्मा भगवान्‌का यह सकल प्रपंच रूप है, उस सबके बीजभूत, अविनाशी और निर्मल प्रभु वासुदेवको हम नमस्कार करते हैं॥ ३४॥

श्रीपराशर उवाच

स्तोत्रस्य चावसाने ते ददृशुः परमेश्वरम्।<br>शङ्खचक्रगदापाणिं गरुडस्थं सुरा हरिम्॥ ३५**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! स्तोत्रके समाप्त हो जानेपर देवताओोंने परमात्मा श्रीहरिको हाथमें शंख, चक्र और गदा लिये तथा गरुडपर आरूढ़ हुए अपने सम्मुख विराजमान देखा॥ ३५॥

* ग्यारह इन्द्रिय-वध, नौ तुष्टि-वध और आठ सिद्धि-वध—ये कुल अट्ठाईस वध हैं। इनका प्रथमांश पञ्चमाध्याय श्लोक दसकी टिप्पणीमें विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।