भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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२२४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८


तमूचुस्सकला देवाः प्रणिपातपुरस्सरम्।
प्रसीद नाथ दैत्येभ्यस्त्राहि नश्शरणाथिनः॥ ३६
त्रैलोक्ययज्ञभागाश्च दैत्यैर्ह्लादपुरोगमैः।
हृता नो ब्रह्मणोऽप्याज्ञामुल्लङ्घ्य परमेश्वर॥ ३७
यद्यप्यशेषभूतस्य वयं ते च तवांशजाः।
तथाप्यविद्याभेदेन भिन्नं पश्यामहे जगत्॥ ३८
स्ववर्णधर्माभिरता वेदमार्गानुसारिणः।
न शक्यास्तेऽरयो हन्तुमस्माभिस्तपसावृताः॥ ३९
तमुपायमशेषात्मन्नस्माकं दातुमर्हसि।
येन तानसुरान्हन्तुं भवेम भगवन्क्षमाः॥ ४०

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तो भगवांस्तेभ्यो मायामोहं शरीरतः।
समुत्पाद्य ददौ विष्णुः प्राह चेदं सुरोत्तमान्॥ ४१
मायामोहोऽयमखिलान्दैत्यांस्तान्मोहयिष्यति।
ततो वध्या भविष्यन्ति वेदमार्गबहिष्कृताः॥ ४२
स्थितौ स्थितस्य मे वध्या यावन्तः परिपन्थिनः।
ब्रह्मणो ह्यधिकारस्य देवदैत्यादिकाः सुराः॥ ४३
तद्गच्छत न भीः कार्या मायामोहोऽयमग्रतः।
गच्छन्नद्योपकाराय भवतां भविता सुराः॥ ४४

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ताः प्रणिपत्यैनं ययुर्देवा यथागतम्।
मायामोहोऽपि तैस्सार्द्धं ययौ यत्र महासुराः॥ ४५

उन्हें देखकर समस्त देवताओंने प्रणाम करनेके अनन्तर उनसे कहा—“हे नाथ! प्रसन्न होइये और हम शरणागतोंकी दैत्योंसे रक्षा कीजिये॥ ३६॥ हे परमेश्वर! ह्लाद प्रभृति दैत्यगणने ब्रह्माजीकी आज्ञाका भी उल्लंघन कर हमारे और त्रिलोकीके यज्ञभागोंका अपहरण कर लिया है॥ ३७॥ यद्यपि हम और वे सर्वभूत आपके अंशज हैं तथापि अविद्यावश हम जगत्को परस्पर भिन्न-भिन्न देखते हैं॥ ३८॥ हमारे शत्रुगण अपने वर्णधर्मका पालन करनेवाले, वेदमार्गावलम्बी और तपोनिष्ठ हैं, अतः वे हमसे नहीं मारे जा सकते॥ ३९॥ अतः हे सर्वात्मन्! जिससे हम उन असुरोंका वध करनेमें समर्थ हों ऐसा कोई उपाय आप हमें बतलाइये”॥ ४०॥

**श्रीपराशरजी बोले—**उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने अपने शरीरसे मायामोहको उत्पन्न किया और उसे देवताओंको देकर कहा—॥ ४१॥ “यह मायामोह उन सम्पूर्ण दैत्यगणको मोहित कर देगा, तब वे वेदमार्गका उल्लंघन करनेसे तुमलोगोंसे मारे जा सकेंगे॥ ४२॥ हे देवगण! जो कोई देवता अथवा दैत्य ब्रह्माजीके कार्यमें बाधा डालते हैं वे सृष्टिकी रक्षामें तत्पर मेरे वध्य होते हैं॥ ४३॥ अतः हे देवगण! अब तुम जाओ, डरो मत। यह मायामोह आगेसे जाकर तुम्हारा उपकार करेगा”॥ ४४॥

**श्रीपराशरजी बोले—**भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर देवगण उन्हें प्रणाम कर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये, तथा उनके साथ मायामोह भी जहाँ असुरगण थे वहाँ गया॥ ४५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽंशे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


अठारहवाँ अध्याय

मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा

श्रीपराशर उवाच
तपस्यभिरतान्सोऽथ मायामोहो महासुरान्।
मैत्रेय ददृशे गत्वा नर्मदातीरसंश्रितान्॥ १
ततो दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपिच्छधरो द्विज।
मायामोहोऽसुरान् श्लक्ष्णमिदं वचनमब्रवीत्॥ २

**श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! तदनन्तर मायामोहने [देवताओंके साथ] जाकर देखा कि असुरगण नर्मदाके तटपर तपस्यामें लगे हुए हैं॥ १॥ तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोहने असुरोंसे अति मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा॥ २॥