भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 558 में से

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पृष्ठ 236

अ० १८ ] * तृतीय अंश * २२५


मायामोह उवाच
हे दैत्यपतयो ब्रूत यदर्थं तप्यते तपः।
ऐहिकं वाथ पारत्र्यं तपसः फलमिच्छथ ॥ ३

असुरा ऊचुः
पारत्र्यफललाभाय तपश्चर्या महामते।
अस्माभिरियमारब्धा किं वा तेऽत्र विवक्षितम्॥ ४

मायामोह उवाच
कुरुध्वं मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीप्सथ।
अर्हध्वमेनं धर्मं च मुक्तिद्वारमंसंवृतम् ॥ ५
धर्मो विमुक्तेर्होऽयं नैतस्मादपरो वरः।
अत्रैव संस्थिताः स्वर्गं विमुक्तिं वा गमिष्यथ ॥ ६
अर्हध्वं धर्ममेतं च सर्वे यूयं महाबलाः ॥ ७

श्रीपराशर उवाच
एवं प्रकारैर्बहुभिर्युक्तिदर्शनचर्चितैः ।
मायामोहेन ते दैत्या वेदमार्गादपाकृताः ॥ ८
धर्मार्यैतदधर्मार्यं सदेतन्न सदित्यपि।
विमुक्तये त्विदं नैतद्विमुक्तिं सम्प्रयच्छति ॥ ९
परमार्थोऽयमत्यर्थं परमार्थो न चाप्ययम्।
कार्यमेतदकार्यं च नैतदेवं स्फुटं त्विदम्॥ १०
दिग्वाससामयं धर्मो धर्मोऽयं बहुवाससाम् ॥ ११
इत्यनेकान्तवादं च मायामोहेन नैकधा।
तेन दर्शयता दैत्यास्स्वधर्मं त्याजिता द्विज ॥ १२
अर्हतैतं महाधर्मं मायामोहेन ते यतः।
प्रोक्तास्तमाश्रिता धर्ममार्हतास्तेन तेऽभवन् ॥ १३
त्रयीधर्मसमुत्सर्गं मायामोहेन तेऽसुराः।
कारितास्तन्मया ह्यासंस्ततोऽन्ये तत्रचोदिताः ॥ १४
तैरप्यन्ये परे तैश्च तैरप्यन्ये परे च तैः।
अल्पैरहोभिस्सन्न्यक्ता तैर्दैत्यैः प्रायशस्त्रयी ॥ १५
पुनश्च रक्ताम्बरधृङ् मायामोहो जितेन्द्रियः।
अन्यानाहासुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम्॥ १६
स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थमथासुराः।
तदलं पशुघातादिदुष्टधर्मैर्निबोधत ॥ १७


मायामोह बोला— हे दैत्यपतिगण! कहिये, आपलोग किस उद्देश्यसे तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फलकी इच्छा है या पारलौकिक की ?॥ ३॥

असुरगण बोले— हे महामते! हमलोगोंने पारलौकिक फलकी कामनासे तपस्या आरम्भ की है। इस विषयमें तुमको हमसे क्या कहना है?॥ ४॥

मायामोह बोला— यदि आपलोगोंको मुक्तिकी इच्छा है तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। आपलोग मुक्तिके खुले द्वाररूप इस धर्मका आदर कीजिये ॥ ५॥ यह धर्म मुक्तिमें परमोपयोगी है। इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है। इसका अनुष्ठान करनेसे आपलोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे। आप सब लोग महाबलवान् हैं, अतः इस धर्मका आदर कीजिये ॥ ६-७॥

श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार नाना प्रकारकी युक्तियोंसे अतिरंजित वाक्योंद्वारा मायामोहने दैत्यगणको वैदिक मार्गसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ८ ॥ 'यह धर्मयुक्त है और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत् है और यह असत् है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती, यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है, यह कर्तव्य है और यह अकर्तव्य है, यह ऐसा नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरोंका धर्म है और यह साम्बरोंका धर्म है'—हे द्विज ! ऐसे अनेक प्रकारके अनन्त वादोंको दिखलाकर मायामोहने उन दैत्योंको स्वधर्मसे च्युत कर दिया ॥ ९—१२॥ मायामोहने दैत्योंसे कहा था कि आपलोग इस महाधर्मको 'अर्हत' अर्थात् इसका आदर कीजिये। अतः उस धर्मका अवलम्बन करनेसे वे 'आर्हत' कहलाये ॥ १३॥

मायामोहने असुरगणको त्रयीधर्मसे विमुख कर दिया और वे मोहग्रस्त हो गये; तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्योंको भी इसी धर्ममें प्रवृत्त किया ॥ १४ ॥ उन्होंने दूसरे दैत्योंको, दूसरोंने तीसरोँको, तीसरोँने चौथोंको तथा उन्होंने औरोंको इसी धर्ममें प्रवृत्त किया। इस प्रकार थोड़े ही दिनोंमें दैत्यगणने वेदत्रयीका प्रायः त्याग कर दिया ॥ १५॥

तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोहने रक्तवस्त्र धारणकर अन्यान्य असुरोंके पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दोंमें कहा— ॥ १६॥ “हे असुरगण! यदि तुमलोगोंको स्वर्ग अथवा मोक्षकी इच्छा है तो पशुहिंसा आदि दुष्टकर्मोंको त्यागकर बोध प्राप्त करो ॥ १७॥


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