भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 558 में से

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पृष्ठ 232

अ० १७ ] * तृतीय अंश * २२१


गौरीं वाप्युद्वहेत्कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ।
यजेत वाश्वमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ॥ २० ॥

अथवा गौरी कन्यासे विवाह करेगा, नीला वृषभ छोड़ेगा या दक्षिणासहित विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ करेगा ?' ॥ २० ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेंऽशे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥


सत्रहवाँ अध्याय

नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान्‌की शरणमें जाना और भगवान्‌का मायामोहको प्रकट करना

श्रीपराशर उवाच
इत्याह भगवानौर्वस्सगराय महात्मने।
सदाचारं पुरा सम्यङ् मैत्रेय परिपृच्छते ॥ १ ॥
मयाप्येतदशेषेण कथितं भवतो द्विज।
समुल्लङ्घ्य सदाचारं कश्चिन्नाप्नोति शोभनम् ॥ २ ॥

श्रीमैत्रेय उवाच
षण्ढापविद्धप्रमुखा विदिता भगवन्मया।
उदक्याद्याश्च मे सम्यङ् नग्नमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
को नग्नः किं समाचारो नग्नसंज्ञां नरो लभेत्।
नग्नस्वरूपमिच्छामि यथावत्कथितं त्वया।
श्रोतुं धर्मभृतां श्रेष्ठ न ह्यास्त्यविदितं तव ॥ ४ ॥

श्रीपराशर उवाच
ऋग्यजुस्सामसंज्ञेयं त्रयी वर्णावृतिर्द्विज।
एतामुज्झति यो मोहात्स नग्नः पातकी द्विजः ॥ ५ ॥
त्रयी समस्तवर्णानां द्विज संवरणं यतः।
नग्नो भवत्युज्झितायामतस्तस्यां न संशयः ॥ ६ ॥
इदं च श्रूयतामन्यद्गाङ्गेयाय महात्मने।
कथयामास धर्मज्ञो वसिष्ठोऽस्मत्पितामहः ॥ ७ ॥
मयापि तस्य गदतश्श्रुतमेतन्महात्मनः।
नग्नसम्बन्धि मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥ ८ ॥
देवासुरमभूद्युद्धं दिव्यमब्दशतं पुरा।
तस्मिन्पराजिता देवा दैत्यैर्ह्लादपुरोगमैः ॥ ९ ॥
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं गत्वातप्यन्त वै तपः।
विष्णोराराधनार्थाय जगुश्चेमं स्तवं तदा ॥ १० ॥


श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! पूर्वकालमें महात्मा सगरसे उनके पूछनेपर भगवान् और्वने इस प्रकार गृहस्थके सदाचारका निरूपण किया था ॥ १ ॥ हे द्विज! मैंने भी तुमसे इसका पूर्णतया वर्णन कर दिया। कोई भी पुरुष सदाचारका उल्लंघन करके सद्गति नहीं पा सकता ॥ २ ॥

श्रीमैत्रेयजी बोले— भगवन्! नपुंसक, अपविद्ध और रजस्वला आदिको तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ [किन्तु यह नहीं जानता कि 'नग्न' किसको कहते हैं]। अतः इस समय मैं नग्नके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ नग्न कौन है? और किस प्रकारके आचरणवाला पुरुष नग्न संज्ञा प्राप्त करता है? हे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! मैं आपके द्वारा नग्नके स्वरूपका यथावत् वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आपको कोई भी बात अविदित नहीं है ॥ ४ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विज! ऋक्, साम और यजुः यह वेदत्रयी वर्णोंका आवरणस्वरूप है। जो पुरुष मोहसे इसका त्याग कर देता है वह पापी 'नग्न' कहलाता है ॥ ५ ॥ हे ब्रह्मन्! समस्त वर्णोंका संवरण (ढँकनेवाला वस्त्र) वेदत्रयी ही है; इसलिये उसका त्याग कर देनेपर पुरुष 'नग्न' हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६ ॥ हमारे पितामह धर्मज्ञ वसिष्ठजीने इस विषयमें महात्मा भीष्मजीसे जो कुछ कहा था वह श्रवण करो ॥ ७ ॥ हे मैत्रेय! तुमने जो मुझसे नग्नके विषयमें पूछा है, इस सम्बन्धमें भीष्मके प्रति वर्णन करते समय मैंने भी महात्मा वसिष्ठजीका कथन सुना था ॥ ८ ॥

पूर्वकालमें किसी समय सौ दिव्यवर्षतक देवता और असुरोंका परस्पर युद्ध हुआ। उसमें ह्राद प्रभृति दैत्योंद्वारा देवगण पराजित हुए ॥ ९ ॥ अतः देवगणने क्षीरसागरके उत्तरीय तटपर जाकर तपस्या की और भगवान् विष्णुकी आराधनाके लिये उस समय इस स्तवका गान किया ॥ १० ॥

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