विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 558 में से
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श्रीपराशर उवाच
मायामोहेन ते दैत्याः प्रकारैर्बहुभिस्तथा।
व्युत्थापिता यथा नैषां त्रयी कश्चिदरोचयत्॥ ३२
इत्थमुन्मार्गयातेषु तेषु दैत्येषु तेऽमराः।
उद्योगं परमं कृत्वा युद्धाय समुपस्थिताः॥ ३३
ततो दैवासुरं युद्धं पुनरेवाभवद् द्विज।
हताश्च तेऽसुरा देवैः सन्मार्गपरिपन्थिनः॥ ३४
स्वधर्मकवचं तेषामभूद्यत्प्रथमं द्विज।
तेन रक्षाभवत्पूर्वं नेशुर्नष्टे च तत्र ते॥ ३५
ततो मैत्रेय तन्मार्गवर्तिनो येऽभवञ्जनाः।
नग्नास्ते तैरैयतस्त्यक्तं त्रयीसंवरणं तथा॥ ३६
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथाश्रमी।
परिव्राड् वा चतुर्थोऽत्र पञ्चमो नोपपद्यते॥ ३७
यस्तु सन्त्यज्य गार्हस्थ्यं वानप्रस्थो न जायते।
परिव्राट् चापि मैत्रेय स नग्नः पापकृन्नरः॥ ३८
नित्यानां कर्मणां विप्र तस्य हानिरहर्निशम्।
अकुर्वन्विहितं कर्म शक्तः पतति तद्दिने॥ ३९
प्रायश्चित्तेन महता शुद्धिमाप्नोत्यनापदि।
पक्षं नित्यक्रियाहानेः कर्त्ता मैत्रेय मानवः॥ ४०
संवत्सरं क्रियाहानिर्यस्य पुंसोऽभिजायते।
तस्यावलोकनात्सूर्यो निरीक्ष्यस्साधुभिस्सदा॥ ४१
स्पृष्टे स्नानं सचैलस्य शुद्धेर्हेतुर्महामते।
पुंसो भवति तस्योक्ता न शुद्धिः पापकर्मणः॥ ४२
देवर्षिपितृभूतानि यस्य निःश्वस्य वेश्मनि।
प्रयान्त्यनर्चितान्यत्र लोके तस्मान्न पापकृत्॥ ४३
सम्भाषणाqueriesनुप्रश्नादि सहास्यां चैव कुर्वतः।
जायते तुल्यता तस्य तेनैव द्विज वत्सरात्॥ ४४
देवाद्दिनिःश्वासहतं शरीरं यस्य वेश्म च।
न तेन संकरं कुर्याद् गृहासनपरिच्छदैः॥ ४५
अथ भुङ्क्ते गृहे तस्य करोत्यास्यां तथासने।
शेते चाप्येकशयने स सद्यस्तत्समो भवेत्॥ ४६
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार अनेक युक्तियोंसे मायामोहने दैत्योंको विचलित कर दिया जिससे उनमेंसे किसीकी भी वेदत्रयीमें रुचि नहीं रही॥ ३२॥ इस प्रकार दैत्योंके विपरीत मार्गमें प्रवृत्त हो जानेपर देवगण खूब तैयारी करके उनके पास युद्धके लिये उपस्थित हुए॥ ३३॥
हे द्विज! तब देवता और असुरोंमें पुनः संग्राम छिड़ा। उसमें सन्मार्गविरोधी दैत्यगण देवताओंद्वारा मारे गये॥ ३४॥ हे द्विज! पहले दैत्योंके पास जो स्वधर्मरूप कवच था उसीसे उनकी रक्षा हुई थी। अबकी बार उसके नष्ट हो जानेसे वे भी नष्ट हो गये॥ ३५॥ हे मैत्रेय! उस समयसे जो लोग मायामोहद्वारा प्रवर्तित मार्गका अवलम्बन करनेवाले हुए; वे 'नग्न' कहलाये क्योंकि उन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्रको त्याग दिया था॥ ३६॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—ये चार ही आश्रमी हैं। इनके अतिरिक्त पाँचवाँ आश्रमी और कोई नहीं है॥ ३७॥ हे मैत्रेय! जो पुरुष गृहस्थाश्रमको छोड़नेके अनन्तर वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं होता वह पापी भी नग्न ही है॥ ३८॥
हे विप्र! सामर्थ्य रहते हुए भी जो विहित कर्म नहीं करता वह उसी दिन पतित हो जाता है और उस एक दिन-रातमें ही उसके सम्पूर्ण नित्यकर्मोंका क्षय हो जाता है॥ ३९॥ हे मैत्रेय! आपत्तिकालको छोड़कर और किसी समय एक पक्षतक नित्यकर्मका त्याग करनेवाला पुरुष महान् प्रायश्चित्तसे ही शुद्ध हो सकता है॥ ४०॥ जो पुरुष एक वर्षतक नित्य-क्रिया नहीं करता उसपर दृष्टि पड़ जानेसे साधु पुरुषको सदा सूर्यका दर्शन करना चाहिये॥ ४१॥ हे महामते! ऐसे पुरुषका स्पर्श होनेपर वस्त्रसहित स्नान करनेसे शुद्धि हो सकती है और उस पापात्माकी शुद्धि तो किसी भी प्रकार नहीं हो सकती॥ ४२॥
जिस मनुष्यके घरसे देवगण, ऋषिगण, पितृगण और भूतगण बिना पूजित हुए निःश्वास छोड़ते अन्यत्र चले जाते हैं, लोकमें उससे बढ़कर और कोई पापी नहीं है॥ ४३॥ हे द्विज! ऐसे पुरुषके साथ एक वर्षतक सम्भाषण, कुशलप्रश्न और उठने-बैठनेसे मनुष्य उसीके समान पापान्मा हो जाता है॥ ४४॥ जिसका शरीर अथवा गृह देवता आदिके निःश्वाससे निहत है उसके साथ अपने गृह, आसन और वस्त्र आदिको न मिलावे॥ ४५॥ जो पुरुष उसके घरमें भोजन करता है, उसका आसन ग्रहण करता है अथवा उसके साथ एक ही शय्यापर शयन करता है वह शीघ्र ही उसीके समान हो जाता है॥ ४६॥