विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १८
देवतापितृभूतानि तथानभ्यर्च्य योऽतिथीन्। भुङ्क्ते स पातकं भुङ्क्ते निष्कृतिस्तस्य नेष्यते॥ ४७ ब्राह्मणाद्यास्तु ये वर्णास्स्वधर्मादन्यतोमुखाः। यान्ति ते नग्नसंज्ञां तु हीनकर्मस्ववस्थिताः॥ ४८ चतुर्णां यत्र वर्णानां मैत्रेयात्यन्तसंकरः। तत्रास्या साधुवृत्तीनामुपघाताय जायते॥ ४९ अनभ्यर्च्य ऋषीन्देवान्पितॄन्भूतातिथींस्तथा। यो भुङ्क्ते तस्य संल्लापात्पतन्ति नरके नराः॥ ५० तस्मादेतान्नरो नग्नांस्त्रयीसन्त्यागदूषितान्। सर्वदा वर्जयेत्प्राज्ञ आलापस्पर्शनादिषु॥ ५१ श्रद्धावद्भिः कृतं यत्नाद्देवान्पितॄन्पितामहान्। न प्रीणयति तच्छ्राद्धं यद्येभिरवलोकितम्॥ ५२ श्रूयते च पुरा ख्यातो राजा शतधनुर्भुवि। पत्नी च शैव्या तस्याभूदतिधर्मपरायणा॥ ५३ पतिव्रता महाभागा सत्यशौचदयान्विता। सर्वलक्षणसम्पन्ना विनयेन नयेन च॥ ५४ स तु राजा तया सार्द्धं देवदेवं जनार्दनम्। आराधयामास विभुं परमेण समाधिना॥ ५५ होमैर्जपैस्तथा दानैरुपवासैश्च भक्तितः। पूजाभिश्चानुदिवसं तन्मना नान्यमानसः॥ ५६ एकदा तु समं स्नातौ तौ तु भार्यापती जले। भागीरथ्यास्समुत्तीर्णौ कार्त्तिक्यां समु Schneider षितौ। पाषण्डिनमपश्येतामायान्तं सम्मुखं द्विज॥ ५७ चापाचार्यस्य तस्यासौ सखा राज्ञो महात्मनः। अतस्तद्गौरवात्तेन सखाभावमथाकरोत्॥ ५८ न तु सा वाग्यता देवी तस्य पत्नी पतिव्रता। उपोषितास्मीति रविं तस्मिन्दृष्टे ददर्श च॥ ५९ समागम्य यथान्यायं दम्पती तौ यथाविधि। विष्णोः पूजादिकं सर्वं कृतवन्तौ द्विजोत्तम॥ ६० कालेन गच्छता राजा ममरासौ सपत्नजित्। अन्वारुरोह तं देवी चितास्थं भूपतिं पतिम्॥ ६१
जो मनुष्य देवता, पितर, भूतगण और अतिथियोंका पूजन किये बिना स्वयं भोजन करता है वह पापमय भोजन करता है; उसकी शुभगति नहीं हो सकती॥ ४७॥ जो ब्राह्मणादि वर्ण स्वधर्मको छोड़कर परधर्ममें प्रवृत्त होते हैं अथवा हीनवृत्तिका अवलम्बन करते हैं वे 'नग्न' कहलाते हैं॥ ४८॥ हे मैत्रेय! जिस स्थानमें चारों वर्णोंका अत्यन्त मिश्रण हो उसमें रहनेसे पुरुषकी साधुवृत्तियोंका क्षय हो जाता है॥ ४९॥ जो पुरुष ऋषि, देव, पितृ, भूत और अतिथिगणका पूजन किये बिना भोजन करता है उससे सम्भाषण करनेसे भी लोग नरकमें पड़ते हैं॥ ५०॥ अतः वेदत्रयीके त्यागसे दूषित इन नग्नोंके साथ प्राज्ञपुरुष सर्वदा सम्भाषण और स्पर्श आदिका भी त्याग कर दे॥ ५१॥ यदि इनकी दृष्टि पड़ जाय तो श्रद्धावान् पुरुषोंका यत्नपूर्वक किया हुआ श्राद्ध देवता अथवा पितृ-पितामहगणकी तृप्ति नहीं करता॥ ५२॥ सुना जाता है, पूर्वकालमें पृथिवीतलपर शतधनु नामसे विख्यात एक राजा था। उसकी पत्नी शैव्या अत्यन्त धर्मपरायणा थी॥ ५३॥ वह महाभागा पतिव्रता, सत्य, शौच और दयासे युक्त तथा विनय और नीति आदि सम्पूर्ण सुलक्षणोंसे सम्पन्ना थी॥ ५४॥ उस महारानीके साथ राजा शतधनुने परम समाधिद्वारा सर्वव्यापक, देवदेव श्रीजनार्दनकी आराधना की॥ ५५॥ वे प्रतिदिन तन्मय होकर अनन्यभावसे होम, जप, दान, उपवास और पूजन आदिद्वारा भगवान्की भक्तिपूर्वक आराधना करने लगे॥ ५६॥ हे द्विज! एक दिन कार्त्तिकी पूर्णिमाको उपवास कर उन दोनों पति-पत्नियोंने श्रीगंगाजीमें एक साथ ही स्नान करनेके अनन्तर बाहर आनेपर एक पाखण्डीको सामने आता देखा॥ ५७॥ यह ब्राह्मण उस महात्मा राजाके धनुर्वेदाचार्यका मित्र था; अतः आचार्यके गौरववश राजाने भी उससे मित्रवत् व्यवहार किया॥ ५८॥ किन्तु उसकी पतिव्रता पत्नीने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; वह मौन रही और यह सोचकर कि मैं उपोषिता (उपवासयुक्त) हूँ उसे देखकर सूर्यका दर्शन किया॥ ५९॥ हे द्विजोत्तम! फिर उन स्त्री-पुरुषोंने यथारीति आकर भगवान् विष्णुके पूजा आदिक सम्पूर्ण कर्म विधिपूर्वक किये॥ ६०॥ कालान्तरमें वह शत्रुजित् राजा मर गया। तब देवी शैव्याने भी चितारूढ़ महाराजका अनुगमन किया॥ ६१॥
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