भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240
अ० १८ ]* तृतीय अंश *२२९

स तु तेनापचारेण श्वा जज्ञे वसुधाधिपः।
उपोषितेन पाषण्डसंल्लापो यत्कृतोऽभवत्॥ ६२
राजा शतधनुने उपवास-अवस्थामें पाखण्डीसे वार्तालाप किया था। अतः उस पापके कारण उसने कुत्तेका जन्म लिया॥ ६२॥ तथा वह शुभलक्षणा

सा तु जातिस्मरा जज्ञे काशीराजसुता शुभा।
सर्वविज्ञानसम्पूर्णा सर्वलक्षणपूजिता॥ ६३
काशीनरेशकी कन्या हुई, जो सब प्रकारके विज्ञानसे युक्त, सर्वलक्षणसम्पन्ना और जातिस्मरा (पूर्वजन्मका

तां पिता दातुकामोऽभूद्वराय विनिवारितः।
तयैव तन्व्या विरतो विवाहारम्भतो नृपः॥ ६४
वृत्तान्त जाननेवाली) थी॥ ६३॥ राजाने उसे किसी वरको देनेकी इच्छा की, किन्तु उस सुन्दरीके ही रोक देनेपर वह उसके विवाहादिसे उपरत हो गये॥ ६४॥

ततस्सा दिव्यया दृष्ट्या दृष्ट्वा श्वानं निजं पतिम्।
विदिशाख्यं पुरं गत्वा तदवस्थं ददर्श तम्॥ ६५
तब उसने दिव्य दृष्टिसे अपने पतिको श्वान हुआ जान विदिशा नामक नगरमें जाकर उसे वहाँ कुत्तेकी अवस्थामें देखा॥ ६५॥ अपने महाभाग पतिको

तं दृष्ट्वैव महाभागं श्वभूतं तु पतिं तदा।
ददौ तस्मै वराहारं सत्कारप्रवणं शुभा॥ ६६
श्वानरूपमें देखकर उस सुन्दरीने उसे सत्कारपूर्वक अति उत्तम भोजन कराया॥ ६६॥ उसके दिये हुए

भुञ्जन्दत्तं तया सोऽन्नमतिमृष्टमभीप्सितम्।
स्वजातिललितं कुर्वन्बहु चाटु चकार वै॥ ६७
उस अति मधुर और इच्छित अन्नको खाकर वह अपनी जातिके अनुकूल नाना प्रकारकी चाटुता प्रदर्शित करने लगा॥ ६७॥ उसके चाटुता करनेसे अत्यन्त

अतीव व्रीडिता बाला कुर्वता चाटु तेन सा।
प्रणामपूर्वमाहेदं दयितं तं कुयोनिजम्॥ ६८
संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनिमें उत्पन्न हुए उस अपने प्रियतमको प्रणाम कर उससे इस प्रकार कहा—॥ ६८॥ “महाराज! आप अपनी उस

स्मर्यतां तन्महाराज दाक्षिण्यललितं त्वया।
येन श्वयोनिमापन्नो मम चाटुकरो भवान्॥ ६९
उदारताका स्मरण कीजिये जिसके कारण आज आप श्वान-योनिको प्राप्त होकर मेरे चाटुकार हुए हैं॥ ६९॥

पाषण्डिनं समाभाष्य तीर्थस्नानादनन्तरम्।
प्राप्तोऽसि कुत्सितां योनिं किन्न स्मरसि तत्प्रभो॥ ७०
हे प्रभो! क्या आपको यह स्मरण नहीं है कि तीर्थस्नानके अनन्तर पाखण्डीसे वार्तालाप करनेके कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है?”॥ ७०॥

श्रीपराशर उवाच
श्रीपराशरजी बोले—

तयैवं स्मारिते तस्मिन्पूर्वजातिकृते तदा।
दध्यौ चिरमथावाप निर्वेदमतिदुर्लभम्॥ ७१
काशिराजसुताद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर उसने बहुत देरतक अपने पूर्वजन्मका चिन्तन किया। तब उसे अति दुर्लभ निर्वेद प्राप्त हुआ॥ ७१॥

निर्विण्णचित्तस्स ततो निर्गम्य नगराद्बहिः।
मरुत्प्रपतनं कृत्वा शार्गालीं योनिमागतः॥ ७२
उसने अति उदास चित्तसे नगरके बाहर आ प्राण त्याग दिये और फिर शृगाल-योनिमें जन्म लिया॥ ७२॥ तब

सापि द्वितीये सम्प्राप्ते वीक्ष्य दिव्येन चक्षुषा।
ज्ञात्वा शृगालं तं द्रष्टुं ययौ कोलाहलं गिरिम्॥ ७३
काशिराजकन्या दिव्य दृष्टिसे उसे दूसरे जन्ममें शृगाल हुआ जान उसे देखनेके लिये कोलाहल पर्वतपर गयी॥ ७३॥

तत्रापि दृष्ट्वा तं प्राह शार्गालीं योनिमागतम्।
भर्त्तारमपि चार्वङ्गी तनया पृथिवीक्षितः॥ ७४
वहाँ भी अपने पतिको शृगाल-योनिमें उत्पन्न हुआ देख वह सुन्दरी राजकन्या उससे बोली—॥ ७४॥ “हे राजेन्द्र!

अपि स्मरसि राजेन्द्र श्वयोनिस्थस्य यन्मया।
प्रोक्तं ते पूर्वचरितं पाषण्डालापसंश्रयम्॥ ७५
श्वान-योनिमें जन्म लेनेपर मैंने आपसे जो पाखण्डीसे वार्तालापविषयक पूर्वजन्मका वृत्तान्त कहा था क्या वह आपको स्मरण है?”॥ ७५॥ तब सत्यनिष्ठोंमें श्रेष्ठ राजा

पुनस्तयोक्तं स ज्ञात्वा सत्यं सत्यवतां वरः।
कानने स निराहारस्तत्याज स्वं कलेवरम्॥ ७६
शतधनुने उसके इस प्रकार कहनेपर सारा सत्य वृत्तान्त जानकर निराहार रह वनमें अपना शरीर छोड़ दिया॥ ७६॥

विष्णु पुराण · पृष्ठ 240, कुल 558 में से · BharatKosha