विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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२३० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८
| भूयस्ततो वृको जज्ञे गत्वा तं निर्जने वने ।<br>स्मारयामास भर्त्तारं पूर्ववृत्तमनिन्दिता ॥ ७७<br>न त्वं वृको महाभाग राजा शतधनुर्भवान् ।<br>श्वा भूत्वा त्वं शृगालोऽभूद्वृकत्वं साम्प्रतं गतः ॥ ७८<br>स्मारितेन यदा त्यक्तस्तेनात्मा गृध्रतां गतः ।<br>अपापा सा पुनश्चैनं बोधयामास भामिनी ॥ ७९<br>नरेन्द्र स्मर्यतामात्मा ह्यलं ते गृध्रचेष्टया ।<br>पाषण्डालापजातोऽयं दोषो यद्गृध्रतां गतः ॥ ८०<br>ततः काकत्वमापन्नं समनन्तरजन्मनि ।<br>उवाच तन्वी भर्त्तारमुपलब्ध्यात्मयोगतः ॥ ८१<br>अशेषभूपृत्तः पूर्वं वश्या यस्मै बलिं ददुः ।<br>स त्वं काकत्वमापन्नो जातोऽद्य बलिभुक् प्रभो ॥ ८२<br>एवमेव च काकत्वे स्मारितस्य पुरातनम् ।<br>तत्याज भूपतिः प्राणान्मयूरत्वमवाप च ॥ ८३<br>मयूरत्वे ततस्सा वै चकारानुगतिं शुभा ।<br>दत्तैः प्रतिक्षणं भोज्यैर्बाला तज्जातिभोजनैः ॥ ८४<br>ततस्तु जनको राजा वाजिमेधं महाक्रतुम् ।<br>चकार तस्यावभृथे स्नापयामास तं तदा ॥ ८५<br>सस्नौ स्वयं च तन्वङ्गी स्मारयामास चापि तम् ।<br>यथासौ श्वशृगालादियोनिं जग्राह पार्थिवः ॥ ८६<br>स्मृतजन्मक्रमस्सोऽथ तत्याज स्वकलेवरम् ।<br>जज्ञे स जनकस्यैव पुत्रोऽसौ सुमहात्मनः ॥ ८७<br>ततस्सा पितरं तन्वी विवाहार्थमचोदयत् ।<br>स चापि कारयामास तस्या राजा स्वयंवरम् ॥ ८८<br>स्वयंवरे कृते सा तं सम्प्राप्तं पतिमात्मनः ।<br>वरयामास भूयोऽपि भर्तृभावेन भामिनी ॥ ८९<br>बुभुजे च तया सार्द्धं सम्भोगान्नृपनन्दनः ।<br>पितर्युपरते राज्यं विदेहेषु चकार सः ॥ ९०<br>इयाज यज्ञांत्सुबहून्ददौ दानानि चार्थिनाम् ।<br>पुत्रानुत्पादयामास युयुधे च सहारिभिः ॥ ९१<br>राज्यं भुक्त्वा यथान्यायं पालयित्वा वसुन्धराम् ।<br>तत्याज स प्रियान्प्राणान्संग्रामे धर्मतो नृपः ॥ ९२ | फिर वह एक भेड़िया हुआ; उस समय भी अनिन्दिता राजकन्याने उस निर्जन वनमें जाकर अपने पतिको उसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त स्मरण कराया ॥ ७७ ॥ [उसने कहा—] "हे महाभाग ! तुम भेड़िया नहीं हो, तुम राजा शतधनु हो। तुम [अपने पूर्वजन्मोंमें] क्रमशः कुक्कुर और शृगाल होकर अब भेड़िया हुए हो" ॥ ७८ ॥ इस प्रकार उसके स्मरण करानेपर राजाने जब भेड़ियेके शरीरको छोड़ा तो गृध्र-योनिमें जन्म लिया। उस समय भी उसकी निष्पाप भार्याने उसे फिर बोध कराया ॥ ७९ ॥ 'हे नरेन्द्र ! तुम अपने स्वरूपका स्मरण करो; इन गृध्र-चेष्टाओंको छोड़ो। पाखण्डीके साथ वार्तालाप करनेके दोषसे ही तुम गृध्र हुए हो' ॥ ८० ॥<br><br>फिर दूसरे जन्ममें काक-योनिको प्राप्त होनेपर भी अपने पतिको योगबलसे पाकर उस सुन्दरीने कहा— ॥ ८१ ॥ "हे प्रभो ! जिनके वशीभूत होकर सम्पूर्ण सामन्तगण नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट करते थे वही आप आज काक-योनिको प्राप्त होकर बलिभोजी हुए हैं" ॥ ८२ ॥ इसी प्रकार काक-योनिमें भी पूर्वजन्मका स्मरण कराये जानेपर राजाने अपने प्राण छोड़ दिये और फिर मयूर-योनिमें जन्म लिया ॥ ८३ ॥<br><br>मयूरावस्थामें भी काशिराजकी कन्या उसे क्षण-क्षणमें अति सुन्दर मयूरोचित आहार देती हुई उसकी टहल करने लगी ॥ ८४ ॥ उस समय राजा जनकने अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया; उस यज्ञमें अवभृथ-स्नानके समय उस मयूरको स्नान कराया ॥ ८५ ॥ तब उस सुन्दरीने स्वयं भी स्नान कर राजाको यह स्मरण कराया कि किस प्रकार उसने श्वान और शृगाल आदि योनियाँ ग्रहण की थीं ॥ ८६ ॥ अपनी जन्म-परम्पराका स्मरण होनेपर उसने अपना शरीर त्याग दिया और फिर महात्मा जनकजीके यहाँ ही पुत्ररूपसे जन्म लिया ॥ ८७ ॥<br><br>तब उस सुन्दरीने अपने पिताको विवाहके लिये प्रेरित किया। उसकी प्रेरणासे राजाने उसके स्वयंवरका आयोजन किया ॥ ८८ ॥ स्वयंवर होनेपर उस राजकन्याने स्वयंवरमें आये हुए अपने उस पतिको फिर पतिभावसे वरण कर लिया ॥ ८९ ॥ उस राजकुमारने काशिराजसुताके साथ नाना प्रकारके भोग भोगे और फिर पिताके परलोकवासी होनेपर विदेहनगरका राज्य किया ॥ ९० ॥ उसने बहुत-से यज्ञ किये, याचकोंको नाना प्रकारसे दान दिये, बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये और शत्रुओंके साथ अनेकों युद्ध किये ॥ ९१ ॥ इस प्रकार उस राजाने पृथिवीका न्यायानुकूल पालन करते हुए राज्य-भोग किया और अन्तमें अपने प्रिय प्राणोंको धर्मयुद्धमें छोड़ा ॥ ९२ ॥ |
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