भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 558 में से

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पृष्ठ 242

अ० १८ ] * तृतीय अंश * २३१

ततश्चितास्थं तं भूयो भर्तारं सा शुभेक्षणा। अन्वारुरोह विधिवद्यथापूर्वं मुदान्विता॥ ९३ ततोऽवाप तया सार्द्धं राजपुत्र्या स पार्थिवः। ऐन्द्रानतीत्य वै लोकाँल्लोकान्प्राप तदाक्षयान्॥ ९४ स्वर्गाक्षयत्वमतुलं दाम्पत्यमतिदुर्लभम्। प्राप्तं पुण्यफलं प्राप्य संशुद्धिं तां द्विजोत्तम॥ ९५ एष पाषण्डसम्भाषादोषः प्रोक्तो मया द्विज। तथाऽश्वमेधावभृथस्नानमाहात्म्यमेव च॥ ९६ तस्मात्पाषण्डिभिः पापैरालापस्पर्शनं त्यजेत्। विशेषतः क्रियाकाले यज्ञादौ चापि दीक्षितः॥ ९७ क्रियाहानिर्गृहे यस्य मासमेकं प्रजायते। तस्यावलोकनात्सूर्यं पश्येत मतिमान्नरः॥ ९८ किं पुनर्यैस्तु सन्त्यक्ता त्रयी सर्वात्मना द्विज। पाषण्डभोजिभिः पापैर्वेदवादविरोधिभिः॥ ९९ सहालापस्तु संसर्गः सहास्र्या चातिपापिनी। पाषण्डिभिर्दुराचारैस्तस्मान्तान्यपरिवर्जयेत्॥ १०० पाषण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालव्रतिकाञ्छठान्। हैतुकाम्बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ १०१ दूरत्तस्तैस्तु सम्पर्कस्त्याज्यश्चाप्यतिपापिभिः। पाषण्डिभिर्दुराचारैस्तस्मात्तान्परिवर्जयेत्॥ १०२ एते नग्नास्तवाख्याता दृष्टाः श्राद्धोपघातकाः। येषां सम्भाषणात्पुंसां दिनपुण्यं प्रणश्यति॥ १०३ एते पाषण्डिनः पापा न ह्येतानालपेद् बुधः। पुण्यं नश्यति सम्भाषादेतेषां तद्दिनोद्भवम्॥ १०४ पुंसां जटाधरणमौण्ड्यवतां वृथैव मोघाशिनामखिलशौचनिराकृतानाम्। तोयप्रदानपितृपिण्डबहिष्कृतानां सम्भाषणादपि नरा नरकं प्रयान्ति॥ १०५

तब उस सुलोचनाने पहलेके समान फिर अपने चितारूढ पतिको विधिपूर्वक प्रसन्न-मनसे अनुगमन किया॥ ९३॥ इससे वह राजा उस राजकन्याके सहित इन्द्रलोकसे भी उत्कृष्ट अक्षय लोकोंको प्राप्त हुआ॥ ९४॥ हे द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर उसने अतुलनीय अक्षय स्वर्ग, अति दुर्लभ दाम्पत्य और अपने पूर्वार्जित पुण्यका फल प्राप्त कर लिया॥ ९५॥ हे द्विज ! इस प्रकार मैंने तुमसे पाखण्डोसे सम्भाषण करनेका दोष और अश्वमेध-यज्ञमें स्नान करनेका माहात्म्य वर्णन कर दिया॥ ९६॥ इसलिये पाखण्डी और पापाचारियोंसे कभी वार्तालाप और स्पर्श न करे; विशेषतः नित्य-नैमित्तिक कर्मोंके समय और जो यज्ञादि क्रियाओंके लिये दीक्षित हो उसे तो उनका संसर्ग त्यागना अत्यन्त आवश्यक है॥ ९७॥ जिसके घरमें एक मासतक नित्यकर्मोंका अनुष्ठान न हुआ हो उसको देख लेनेपर बुद्धिमान् मनुष्य सूर्यका दर्शन करे॥ ९८॥ फिर जिन्होंने वेदत्रयीका सर्वथा त्याग कर दिया है तथा जो पाखण्डियोंका अन्न खाते और वैदिक मतका विरोध करते हैं उन पापात्माओंके दर्शनादि करनेपर तो कहना ही क्या है?॥ ९९॥ इन दुराचारी पाखण्डियोंके साथ वार्तालाप करने, सम्पर्क रखने और उठने-बैठनेमें महान् पाप होता है; इसलिये इन सब बातोंका त्याग करे॥ १००॥ पाखण्डी, विकर्मी, विडाल-व्रतवाले, * दुष्ट, स्वार्थी और बगुला-भक्त लोगोंका वाणीसे भी आदर न करे॥ १०१॥ इन पाखण्डी, दुराचारी और अति पापियोंका संसर्ग दूरहीसे त्यागने योग्य है। इसलिये इनका सर्वदा त्याग करे॥ १०२॥ इस प्रकार मैंने तुमसे नग्नोंकी व्याख्या की, जिनके दर्शनमात्रसे श्राद्ध नष्ट हो जाता है और जिनके साथ सम्भाषण करनेसे मनुष्यका एक दिनका पुण्य क्षीण हो जाता है॥ १०३॥ ये पाखण्डी बड़े पापी होते हैं, बुद्धिमान् पुरुष इनसे कभी सम्भाषण न करे। इनके साथ सम्भाषण करनेसे उस दिनका पुण्य नष्ट हो जाता है॥ १०४॥ जो बिना कारण ही जटा धारण करते अथवा मूँड़ मुड़ाते हैं, देवता, अतिथि आदिको भोजन कराये बिना स्वयं ही भोजन कर लेते हैं, सब प्रकारसे शौचहीन हैं तथा जल-दान और पितृ-पिण्ड आदिसे भी बहिष्कृत हैं, उन लोगोंसे वार्तालाप करनेसे भी लोग नरकमें जाते हैं॥ १०५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥ इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपूरत्वनिर्णायके श्रीमत् विष्णुमहापुराणे तृतीयोऽशः समाप्तः।


* 'प्रच्छन्नानि च पापानि वैडालं नाम तद्व्र म्' अर्थात् छिपे-छिपे पाप करना वैडाल नामक व्रत है। जो वैसा करते हैं 'वे विडाल-व्रतवाले' कहलाते हैं।

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