विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ७ ] * तृतीय अंश * १८५
सातवाँ अध्याय
यमगीता
| श्रीमैत्रेय उवाच | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे गुरो ! मैंने जो कुछ पूछा |
| यथावत्कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽसि मया गुरो । | था वह सब आपने यथावत् वर्णन किया। अब मैं |
| श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वेकं तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥ १ | एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥ हे महामुने ! सातों द्वीप, सातों पाताल |
| सप्त द्वीपानि पातालविधयश्च महामुने । | और सातों लोक—ये सभी स्थान जो इस ब्रह्माण्डके |
| सप्तलोकाश्च येऽन्तःस्था ब्रह्माण्डस्यास्य सर्वतः ॥ २ | अन्तर्गत हैं, स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा |
| स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मसूक्ष्मात्सूक्ष्मतैरैस्तथा । | स्थूल और स्थूलतर जीवोंसे भरे हुए हैं ॥ २-३ ॥ हे |
| स्थूलात्स्थूलतरैश्चैव सर्वं प्राणिभिरावृतम् ॥ ३ | मुनिसत्तम ! एक अंगुलका आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ कर्म-बन्धनसे बँधे हुए जीव न |
| अंगुलस्याष्टभागोऽपि न सोऽस्ति मुनिसत्तम । | रहते हों ॥ ४ ॥ किंतु हे भगवन् ! आयुके समाप्त होनेपर |
| न सन्ति प्राणिनो यत्र कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥ ४ | ये सभी यमराजके वशीभूत हो जाते हैं और उन्हींके |
| सर्वे चैते वशं यान्ति यमस्य भगवन् किल । | आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं ॥ ५ ॥ तदनन्तर पाप-भोगके समाप्त होनेपर |
| आयुषोऽन्ते तथा यान्ति यातनास्तत्प्रचोदिताः ॥ ५ | वे देवादि योनियोंमें घूमते रहते हैं—सकल शास्त्रोंका |
| यातनाभ्यः परिभ्रष्टा देवाद्यास्वथ योनिषु । | ऐसा ही मत है ॥ ६ ॥ अतः आप मुझे वह कर्म |
| जन्तवः परिवर्तन्ते शास्त्राणामेष निर्णयः ॥ ६ | बताइये जिसे करनेसे मनुष्य यमराजके वशीभूत नहीं |
| सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुं यमस्य वशवर्तिनः । | होता; मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥ |
| न भवन्ति नरा येन तत्कर्म कथयस्व मे ॥ ७ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने ! यही प्रश्न महात्मा |
| श्रीपराशर उवाच | नकुलने पितामह भीष्मसे पूछा था। उसके उत्तरमें |
| अयमेव मुने प्रश्नो नकुलेन महात्मना । | उन्होंने जो कुछ कहा था वह सुनो ॥ ८ ॥ |
| पृष्टः पितामहः प्राह भीष्मो यत्तच्छृणुष्व मे ॥ ८ | **भीष्मजीने कहा—**हे वत्स ! पूर्वकालमें मेरे पास एक कलिंगदेशीय ब्राह्मण-मित्र आया और मुझसे |
| भीष्म उवाच | बोला—'मेरे पूछनेपर एक जातिस्मर मुनिने बतलाया |
| पुरा ममागतो वत्स सखा कालिङ्गको द्विजः । | था कि ये सब बातें अमुक-अमुक प्रकार ही होंगी।' |
| स मामुवाच पृष्टो वै मया जातिस्मरो मुनिः ॥ ९ | हे वत्स ! उस बुद्धिमान्ने जो-जो बातें जिस-जिस प्रकार होनेको कही थीं वे सब ज्यों-की-त्यों हुईं ॥ ९-१० ॥ |
| तेनाख्यातमिदं सर्वमित्थं चैतद्भविष्यति । | इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जानेसे मैंने उससे |
| तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता ॥ १० | फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तरमें उस द्विजश्रेष्ठने जो-जो बातें बतलायीं उनके |
| स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानेन वै द्विजः । | विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा ॥ ११ ॥ एक दिन, |
| यद्यदाह न तद्द्द्ष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥ ११ | जो बात तुम मुझसे पूछते हो वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मणसे पूछी। उस समय उसने उस मुनिके वचनोंको |
| एकदा तु मया पृष्टमेतद्यद्भवतोदितम् । | याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मणने, |
| प्राह कालिङ्गको विप्रस्स्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः ॥ १२ | यम और उनके दूतोंके बीचमें जो संवाद हुआ था, |
| जातिस्मरेण कथितो रहस्यः परमो मम । | वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे |
| यमकिङ्करयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते ॥ १३ | कहता हूँ ॥ १२-१३ ॥ |
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