विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] * तृतीय अंश * १८३
हिरण्यनाभात्तावत्यस्संहिता यैर्द्विजोत्तमैः।
गृहीतास्तेऽपि चोच्यन्ते पण्डितैः प्राच्यसामगाः॥ ५
लोकाक्षिनौधमिश्चैव कक्षीवाँल्लाङ्गलिस्तथा।
पौष्पिञ्जिशिष्यास्तद्भेदैस्संहिता बहुलीकृताः॥ ६
हिरण्यनाभशिष्यस्तु चतुर्विंशतिसंहिताः।
प्रोवाच कृतिनामासौ शिष्येभ्यश्च महामुनिः॥ ७
तैश्चापि सामवेदोऽसौ शाखाभिर्बहुलीकृतः।
अथर्वणामथो वक्ष्ये संहितानां समुच्चयम्॥ ८
अथर्ववेदं स मुनिस्सुमन्तुर्मितद्युतिः।
शिष्यमध्यापयामास कबन्धं सोऽपि तं द्विधा।
कृत्वा तु देवदर्शाय तथा पथ्याय दत्तवान्॥ ९
देवदर्शस्य शिष्यास्तु मेधोब्रह्मबलिस्तथा।
शौल्कायनिः पिप्पलादस्तथान्यौ द्विजसत्तम॥ १०
पथ्यस्यापि त्रयश्शिष्याः कृता यैर्द्विज संहिताः।
जाबालिः कुमुदादिश्च तृतीयश्शौनको द्विज॥ ११
शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावेकां तु बभ्रवे।
द्वितीयां संहितां प्रादात्सैन्धवाय च संज्ञिने॥ १२
सैन्धवान्मुञ्जिकेशश्च द्वेधाभिन्नास्त्रिधा पुनः।
नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च॥ १३
चतुर्थस्स्यादांगिरसश्शान्तिकल्पश्च पञ्चमः।
श्रेष्ठास्त्वथर्वणामेते संहितानां विकल्पकाः॥ १४
आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः।
पुराणसंहितां चक्रे पुराणार्थविशारदः॥ १५
प्रख्यातो व्यासशिष्योऽभूत्सूतो वै रोमहर्षणः।
पुराणसंहितां तस्मै ददौ व्यासो महामतिः॥ १६
सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च मित्रायुश्शांसपायनः।
अकृतव्रणसावर्णी षट् शिष्यास्तस्य चाभवन्॥ १७
काश्यपः संहिताकर्ता सावर्णिश्चांशपायनः।
रोमहर्ष णिका चान्या तिसॄणां मूलसंहिता॥ १८
चतुष्टयेन भेदेन संहितानामिदं मुने॥ १९
आद्यं सर्वपुराणानां पुराणं ब्राह्ममुच्यते।
अष्टादशपुराणानि पुराणज्ञाः प्रचक्षते॥ २०
इसी प्रकार जिन अन्य द्विजोत्तमोंने इतनी ही संहिताएँ हिरण्यनाभसे और ग्रहण कीं उन्हें पण्डितजन प्राच्य सामग कहते हैं॥ ५॥ पौष्पिंजिके शिष्य लोकाक्षि, नौधमि, कक्षीवान् और लांगलि थे। उनके शिष्य-प्रशिष्योंने अपनी-अपनी संहिताओंके विभाग करके उन्हें बहुत बढ़ा दिया॥ ६॥ महामुनि कृति नामक हिरण्यनाभके एक और शिष्यने अपने शिष्योंको सामवेदकी चौबीस संहिताएँ पढ़ायीं॥ ७॥ फिर उन्होंने भी इस सामवेदका शाखाओंद्वारा खूब विस्तार किया। अब मैं अथर्ववेदकी संहिताओंके समुच्चयका वर्णन करता हूँ॥ ८॥
अथर्ववेदको सर्वप्रथम अमिततेजोमय सुमन्तु मुनिने अपने शिष्य कबन्धको पढ़ाया था, फिर कबन्धने उसके दो भाग कर उन्हें देवदर्श और पथ्य नामक अपने शिष्योंको दिया॥ ९॥ हे द्विजसत्तम! देवदर्शके शिष्य मेध, ब्रह्मबलि, शौल्कायनि और पिप्पलाद थे॥ १०॥ हे द्विज! पथ्यके भी जाबालि, कुमुदादि और शौनक नामक तीन शिष्य थे, जिन्होंने संहिताओंका विभाग किया॥ ११॥ शौनकने भी अपनी संहिताके दो विभाग करके उनमेंसे एक बभ्रुको तथा दूसरी सैन्धव नामक अपने शिष्यको दी॥ १२॥ सैन्धवसे पढ़कर मुंजिकेशने अपनी संहिताके पहले दो और फिर तीन [इस प्रकार पाँच] विभाग किये। नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहितानकल्प, आंगिरसकल्प और शान्तिकल्प—उनके रचे हुए ये पाँच विकल्प अथर्ववेद-संहिताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १३-१४॥
तदनन्तर पुराणार्थविशारद व्यासजीने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धिके सहित पुराणसंहिताकी रचना की॥ १५॥ रोमहर्षण सूत व्यासजीके प्रसिद्ध शिष्य थे। महामति व्यासजीने उन्हें पुराणसंहिताका अध्ययन कराया॥ १६॥ उन सूतजीके सुमति, अग्निवर्चा, मित्रायु, शांसपायन, अकृतव्रण और सावर्णि—ये छः शिष्य थे॥ १७॥ काश्यपगोत्रीय अकृतव्रण, सावर्णि और शांसपायन—ये तीनों संहिताकर्ता हैं। उन तीनों संहिताओंकी आधार एक रोमहर्षणजीकी संहिता है। हे मुने! इन चारों संहिताओंकी सारभूत मैंने यह विष्णुपुराणसंहिता बनायी है॥ १८-१९॥ पुराणज्ञ पुरुष कुल अठारह पुराण बतलाते हैं; उन सबमें प्राचीनतम ब्रह्मपुराण है॥ २०॥
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth