विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 558 में से
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भौमश्चतुर्दशश्चात्र मैत्रेय भविता मनुः। शुचिरिन्द्रः सुरगणास्तत्र पञ्च शृणुष्व तान्॥ ४२ चाक्षुषाश्च पवित्राश्च कनिष्ठा भ्राजिकास्तथा। वाचावृद्धाश्च वै देवास्सप्तर्षीनपि मे शृणु॥ ४३ अग्निबाहुः शुचिः शुक्नो मागधोऽग्नीध्र एव च। युक्तस्तथा जितश्चान्यो मनुपुत्रानतः शृणु॥ ४४ ऊरुगम्भीरबुद्ध्याद्या मनोस्तस्य सुता नृपाः। कथिता मुनिशार्दूल पालयिष्यन्ति ये महीम्॥ ४५ चतुर्युगान्ते वेदानां जायते किल विप्लवः। प्रवर्तयन्ति तानेत्य भुवं सप्तर्षयो दिवः॥ ४६ कृते कृते स्मृतेर्विप्र प्रणेता जायते मनुः। देवा यज्ञभुजस्ते तु यावन्मन्वन्तरं तु तत्॥ ४७ भवन्ति ये मनोः पुत्रा यावन्मन्वन्तरं तु तैः। तदन्वयोद्भवैश्चैव तावद्भूः परिपाल्यते॥ ४८ मनुस्सप्तर्षयो देवा भूपालाश्च मनोः सुताः। मन्वन्तरे भवन्त्येते शक्रश्चैवाधिकारिणः॥ ४९ चतुर्दशभिरेतैस्तु गतैर्मन्वन्तरैर्द्विज। सहस्त्रयुगपर्यन्तः कल्पो निश्शेष उच्यते॥ ५० तावत्प्रमाणा च निशा ततो भवति सत्तम। ब्रह्मरूपधरश्शेते शेषाहावम्बुसम्मप्लवे॥ ५१ त्रैलोक्यमखिलं ग्रस्त्वा भगवानादिकृद्विभुः। स्वमायासंस्थितो विप्र सर्वभूतो जनार्दनः॥ ५२ ततः प्रबुद्धो भगवान् यथा पूर्वं तथा पुनः। सृष्टिं करोत्यव्ययात्मा कल्पे कल्पे रजोगुणः॥ ५३ मनवो भूभुजस्सेन्द्रा देवास्सप्तर्षयस्तथा। सात्त्विकोंऽशः स्थितिकरो जगतो द्विजसत्तम॥ ५४ चतुर्युगेऽप्यसौ विष्णुः स्थितिव्यापारलक्षणः। युगव्यवस्थां कुरुते यथा मैत्रेय तच्छृणु॥ ५५ कृते युगे परं ज्ञानं कपिलादिस्वरूपधृक्। ददाति सर्वभूतात्मा सर्वभूतहिते रतः॥ ५६ चक्रवर्त्तिस्वरूपेण त्रेतायामपि स प्रभुः। दुष्टानां निग्रहं कुर्वन्परिपाति जगत्त्रयम्॥ ५७
हे मैत्रेय! चौदहवाँ मनु भौम होगा। उस समय शुचि नामक इन्द्र और पाँच देवगण होंगे; उनके नाम सुनो—वे चाक्षुष, पवित्र, कनिष्ठ, भ्राजिक और वाचावृद्ध नामक देवता हैं। अब तत्कालीन सप्तर्षियोंके नाम भी सुनो॥ ४२-४३॥ उस समय अग्निबाहु, शुचि, शुक्र, मागध, अग्नीध्र, युक्त और जित—ये सप्तर्षि होंगे। अब मनुपुत्रोंके विषयमें सुनो॥ ४४॥ हे मुनिशार्दूल! कहते हैं, उस मनुके ऊरु और गम्भीरबुद्धि आदि पुत्र होंगे जो राज्याधिकारी होकर पृथिवीका पालन करेंगे॥ ४५॥
प्रत्येक चतुर्युगके अन्तमें वेदोंका लोप हो जाता है, उस समय सप्तर्षिगण ही स्वर्गलोकसे पृथिवीमें अवतीर्ण होकर उनका प्रचार करते हैं॥ ४६॥ प्रत्येक सत्ययुगके आदिमें [मनुष्योंकी धर्म-मर्यादा स्थापित करनेके लिये] स्मृति-शास्त्रके रचयिता मनुका प्रादुर्भाव होता है; और उस मन्वन्तरके अन्त-पर्यन्त तत्कालीन देवगण यज्ञ-भागोंको भोगते हैं तथा मनुके पुत्र और उनके वंशधर मन्वन्तरके अन्ततक पृथिवीका पालन करते रहते हैं॥ ४७-४८॥ इस प्रकार मनु सप्तर्षि, देवता, इन्द्र तथा मनु-पुत्र राजागण—ये प्रत्येक मन्वन्तरके अधिकारी होते हैं॥ ४९॥
हे द्विज! इन चौदह मन्वन्तरोंके बीत जानेपर एक सहस्र युग रहनेवाला कल्प समाप्त हुआ कहा जाता है॥ ५०॥ हे साधुश्रेष्ठ! फिर इतने ही समयकी रात्रि होती है। उस समय ब्रह्मरूपधारी श्रीविष्णुभगवान् प्रलयकालीन जलके ऊपर शेष-शय्यापर शयन करते हैं॥ ५१॥ हे विप्र! तब आदिकर्ता सर्वव्यापक सर्वभूत भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण त्रिलोकीका ग्रास कर अपनी मायामें स्थित रहते हैं॥ ५२॥ फिर [प्रलय-रात्रिका अन्त होनेपर] प्रत्येक कल्पके आदिमें अव्ययात्मा भगवान् जाग्रत् होकर रजोगुणका आश्रय कर सृष्टिकी रचना करते हैं॥ ५३॥ हे द्विजश्रेष्ठ! मनु, मनु-पुत्र राजागण, इन्द्र देवता तथा सप्तर्षि—ये सब जगत्का पालन करनेवाले भगवान्के सात्त्विक अंश हैं॥ ५४॥
हे मैत्रेय! स्थितिकारक भगवान् विष्णु चारों युगोंमें जिस प्रकार व्यवस्था करते हैं, सो सुनो—॥ ५५॥ समस्त प्राणियोंके कल्याणमें तत्पर वे सर्वभूतात्मा सत्ययुगमें कपिल आदिरूप धारणकर परम ज्ञानका उपदेश करते हैं॥ ५६॥ त्रेतायुगमें वे सर्वसमर्थ प्रभु चक्रवर्ती भूपाल होकर दुष्टोंका दमन करके त्रिलोकीकी रक्षा करते हैं॥ ५७॥