भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१६२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १४

यत्तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया। तत्कारणानुगमनाज्ज्ञायते नृप मृण्मयम् ॥ २२

एवं विनाशभिर्द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः। निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी ॥ २३

अनाशी परमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते। तत्तु नाशि न सन्देहो नाशिद्रव्योपपादितम् ॥ २४

तदेवाफलदं कर्म परमार्थो मतस्तव। मुक्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् ॥ २५

ध्यानं चैवात्मनो भूप परमार्थार्थशब्दितम्। भेदकारि परेभ्यस्तु परमार्थो न भेदवान् ॥ २६

परमात्मात्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते। मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः ॥ २७

तस्माच्छ्रेयांस्यशेषाणि नृपैतानि न संशयः। परमार्थस्तु भूपाल संक्षेपाच्छ्रूयतां मम ॥ २८

एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः। जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतोऽव्ययः ॥ २९

परज्ञानमयोऽसद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः। न योगवान्न युक्तोऽभून्नैव पार्थिव योक्ष्यते ॥ ३०

तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येक मयं हि यत्। विज्ञानं परमार्थोऽसौ द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥ ३१

वेणुरन्ध्रप्रभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः। अभेदव्यापिनो वायोस्तथास्य परमात्मनः ॥ ३२

एकस्वरूपभेदश्च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः। देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणे हि सः ॥ ३३

हे नृप! जो वस्तु कारणरूपा मृत्तिकाका कार्य होती है वह कारणकी अनुगामिनी होनेसे मृत्तिकारूप ही जानी जाती है ॥ २२ ॥ अतः जो क्रिया समिध, घृत और कुशा आदि नाशवान् द्रव्योंसे सम्पन्न होती है वह भी नाशवान् ही होगी ॥ २३ ॥ किन्तु परमार्थको तो प्राज्ञ पुरुष अविनाशी बतलाते हैं और नाशवान् द्रव्योंसे निष्पन्न होनेके कारण कर्म [ अथवा उनसे निष्पन्न होनेवाले स्वर्गादि] नाशवान् ही हैं—इसमें सन्देह नहीं ॥ २४ ॥ यदि फलाशासे रहित निष्कामकर्मको परमार्थ मानते हो तो वह तो मुक्तिरूप फलका साधन होनेसे साधन ही है, परमार्थ नहीं ॥ २५॥ यदि देहादिसे आत्माका पार्थक्य विचारकर उसके ध्यान करनेको परमार्थ कहा जाय तो वह तो अनात्मासे आत्माका भेद करनेवाला है और परमार्थमें भेद है नहीं [अतः वह भी परमार्थ नहीं हो सकता] ॥ २६ ॥ यदि परमात्मा और जीवात्माके संयोगको परमार्थ कहें तो ऐसा कहना सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि अन्य द्रव्यसे अन्य द्रव्यकी एकता कभी नहीं हो सकती* ॥ २७ ॥

अतः हे राजन्! निःसन्देह ये सब श्रेय ही हैं, [परमार्थ नहीं] अब जो परमार्थ है वह मैं संक्षेपसे सुनाता हूँ, श्रवण करो ॥ २८ ॥ आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृतिसे परे है; वह जन्म-वृद्धि आदिसे रहित, सर्वव्यापी और अव्यय है ॥ २९ ॥ हे राजन्! वह परम ज्ञानमय है, असत् नाम और जाति आदिसे उस सर्वव्यापकका संयोग न कभी हुआ, न है और न होगा ॥ ३० ॥ 'वह, अपने और अन्य प्राणियोंके शरीरमें विद्यमान रहते हुए भी, एक ही है'—इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान है वही परमार्थ है; द्वैत भावनावाले पुरुष तो अपरमार्थदर्शी हैं ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार अभिन्न भावसे व्याप्त एक ही वायुके बाँसुरीके छिद्रोंके भेदसे षड्ज आदि भेद होते हैं उसी प्रकार [शरीरादि उपाधियोंके कारण] एक ही परमात्माके [देवता-मनुष्यादि] अनेक भेद प्रतीत होते हैं ॥ ३२ ॥ एकरूप आत्माके जो नाना भेद हैं वे बाह्य देहादिकी कर्मप्रवृत्तिके कारण ही हुए हैं। देवादि शरीरोंके भेदका निराकरण हो जानेपर वह नहीं रहता। उसकी स्थिति तो अविद्याके आवरणतक ही है ॥ ३३ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

* अर्थात् यदि आत्मा परमात्मासे भिन्न है तब तो गौ और अश्वके समान उनकी एकता हो नहीं सकती और यदि बिम्ब-प्रतिबिम्बकी भाँति अभिन्न है तो उपाधिके निराकरणके अतिरिक्त और उनका संयोग ही क्या होगा ?