विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] * द्वितीय अंश * १६१
पूर्वमेव महाभागं कपिलर्षिमहं द्विज।
प्रष्टुमभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किं त्वत्र शंस मे॥ ७
तदन्तरे च भवता यदेतद्वाक्यमीरितम्।
तेनैव परमार्थार्थं त्वयि चेतः प्रधावति॥ ८
कपिलर्षिर्भगवतः सर्वभूतस्य वै द्विज।
विष्णोरंशो जगन्मोहनाशायोर्वीमुपागतः॥ ९
स एव भगवान्नू नमस्माकं हितकाम्यया।
प्रत्यक्षतामत्र गतो यथैतद्भवतोच्यते॥ १०
तन्मह्यं प्रणताय त्वं यच्छ्रेयः परमं द्विज।
तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान्॥ ११
ब्राह्मण उवाच
भूप पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थं नु पृच्छसि।
श्रेयांस्यपरमार्थानि अशेषानि च भूपते॥ १२
देवताराधनं कृत्वा धनसम्पदमिच्छति।
पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप॥ १३
कर्म यज्ञात्मकं श्रेयः फलं स्वर्गाप्तिलक्षणम्।
श्रेयः प्रधानं च फले तदेवानभिसंहिते॥ १४
आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस्तथा परम्।
श्रेयस्तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः॥ १५
श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः।
सन्त्यत्र परमार्थस्तु न त्वेते श्रूयतां च मे॥ १६
धर्माय त्यज्यते किन्नु परमार्थो धनं यदि।
व्ययश्च क्रियते कस्मात्कामप्राप्त्युपलक्षणः॥ १७
पुत्रश्चेत्परमार्थः स्यात्सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर।
परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि तत्पिता॥ १८
एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्यस्मिञ्चराचरे।
परमार्थो हि कार्याणि कारणानामशेषतः॥ १९
राज्यादिप्राप्तिरत्रोक्ता परमार्थतया यदि।
परमार्था भवन्त्यत्र न भवन्ति च वै ततः॥ २०
ऋग्यजुःसामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव।
परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां गदतो मम॥ २१
हे द्विज! मैं तो पहले ही महाभाग कपिल मुनिसे यह पूछनेके लिये कि बताइये 'संसारमें मनुष्योंका श्रेय किसमें है' उनके पास जानेको तत्पर हुआ हूँ॥ ७॥ किन्तु बीचहीमें, आपने जो वाक्य कहे हैं उन्हें सुनकर मेरा चित्त परमार्थ-श्रवण करनेके लिये आपकी ओर झुक गया है॥ ८॥ हे द्विज! ये कपिल मुनि सर्वभूत भगवान् विष्णुके ही अंश हैं। इन्होंने संसारका मोह दूर करनेके लिये ही पृथिवीपर अवतार लिया है॥ ९॥ किन्तु आप जो इस प्रकार भाषण कर रहे हैं उससे मुझे निश्चय होता है कि वे ही भगवान् कपिलदेव मेरे हितकी कामनासे यहाँ आपके रूपमें प्रकट हो गये हैं॥ १०॥ अतः हे द्विज! हमारा जो परम श्रेय हो वह आप मुझ विनीतसे कहिये। हे प्रभो! आप सम्पूर्ण विज्ञान-तरंगोंके मानो समुद्र ही हैं॥ ११॥
ब्राह्मण बोले—हे राजन्! तुम श्रेय पूछना चाहते हो या परमार्थ? क्योंकि हे भूपते! श्रेय तो सब अपारमार्थिक ही हैं॥ १२॥ हे नृप! जो पुरुष देवताओंकी आराधना करके धन, सम्पत्ति, पुत्र और राज्यादिकी इच्छा करता है उसके लिये तो वे ही परम श्रेय हैं॥ १३॥ जिसका फल स्वर्गलोककी प्राप्ति है वह यज्ञात्मक कर्म भी श्रेय है; किन्तु प्रधान श्रेय तो उसके फलकी इच्छा न करनेमें ही है॥ १४॥ अतः हे राजन्! योगयुक्त पुरुषोंको प्रकृति आदिसे अतीत उस आत्माका ही ध्यान करना चाहिये, क्योंकि उस परमात्माका संयोगरूप श्रेय ही वास्तविक श्रेय है॥ १५॥
इस प्रकार श्रेय तो सैकड़ों-हजारों प्रकारके अनेकों हैं, किंतु ये सब परमार्थ नहीं हैं। अब जो परमार्थ है सो सुनो—॥ १६ यदि धन ही परमार्थ है तो धर्मके लिये उसका त्याग क्यों किया जाता है? तथा इच्छित भोगोंकी प्राप्तिके लिये उसका व्यय क्यों किया जाता है? [अतः वह परमार्थ नहीं है] ॥ १७॥ हे नरेश्वर! यदि पुत्रको परमार्थ कहा जाय तो वह तो अन्य (अपने पिता)-का परमार्थभूत है, तथा उसका पिता भी दूसरेका पुत्र होनेके कारण उस (अपने पिता)-का परमार्थ होगा॥ १८॥ अतः इस चराचर जगत्में पिताका कार्यरूप पुत्र भी परमार्थ नहीं है। क्योंकि फिर तो सभी कारणोंके कार्य परमार्थ हो जायँगे॥ १९॥ यदि संसारमें राज्यादिकी प्राप्तिको परमार्थ कहा जाय तो ये कभी रहते हैं और कभी नहीं रहते। अतः परमार्थ भी आगमापायी हो जायगा। [इसलिये राज्यादि भी परमार्थ नहीं हो सकते] ॥ २०॥ यदि ऋक्, यजुः और सामरूप वेदत्रयीसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्मको परमार्थ मानते हो तो उसके विषयमें मेरा ऐसा विचार है—॥ २१॥