विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १४
| वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम्।<br>तथान्यच्च नृपेत्थं तन्न सत्सङ्कल्पनामयम्॥ ९९ | लोकमें धन, राजा, राजाके सैनिक तथा और भी जो-जो वस्तुएँ हैं, हे राजन्! वे परमार्थतः सत्य नहीं हैं, केवल कल्पनामय ही हैं॥ ९९॥ जिस वस्तुकी |
| यत्तु कालान्तरेणापि नान्यां संज्ञामुपैति वै।<br>परिणामादिसम्भूतां तद्वस्तु नृप तच्च किम्॥ १०० | परिणामादिके कारण होनेवाली कोई संज्ञा कालान्तरमें भी नहीं होती, वही परमार्थ-वस्तु है। हे राजन्! ऐसी वस्तु कौन-सी है? ॥ १००॥ [तू अपनेहीको देख] समस्त |
| त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः।<br>पत्न्याः पतिः पिता सूनोः किं त्वां भूप वदाम्यहम्॥ १०१ | प्रजाके लिये तू राजा है, पिताके लिये पुत्र है, शत्रुके लिये शत्रु है, पत्नीका पति है और पुत्रका पिता है। हे राजन्! बतला, मैं तुझे क्या कहूँ? ॥ १०१॥ हे महीपते! तू |
| त्वं किमेतच्छिरः किं नु ग्रीवा तव तथोदरम्।<br>किमु पादादिकं त्वं वा तवैतत्किं महीपते॥ १०२ | क्या यह सिर है, अथवा ग्रीवा है या पेट अथवा पादादिमेंसे कोई है? तथा ये सिर आदि भी 'तेरे' क्या हैं? ॥ १०२॥ |
| समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूय व्यवस्थितः।<br>कोऽहमित्यत्र निपुणो भूत्वा चिन्तय पार्थिव॥ १०३ | हे पृथिवीश्वर! तू इन समस्त अवयवोंसे पृथक् है; अतः सावधान होकर विचार कि 'मैं कौन हूँ' ॥ १०३॥ |
| एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहमिति भाषितुम्।<br>पृथक्करणनिष्पाद्यं शक्यते नृपते कथम्॥ १०४ | हे महाराज! आत्मतत्त्व इस प्रकार व्यवस्थित है। उसे सबसे पृथक् करके ही बताया जा सकता है। तो फिर, मैं उसे 'अहम्' शब्दसे कैसे बतला सकता हूँ? ॥ १०४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—उनके ये परमार्थमय वचन |
|---|---|
| निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम्।<br>प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिर्द्विजम्॥ १ | सुनकर राजाने विनयावनत होकर उन विप्रवरसे कहा॥ १॥ |
| राजोवाच | राजा बोले—भगवन्! आपने जो परमार्थमय |
| भगवन्यत्तवया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः।<br>श्रुते तस्मिन्भ्रमन्तीव मनसो मम वृत्तयः॥ २ | वचन कहे हैं उन्हें सुनकर मेरी मनोवृत्तियाँ भ्रान्त-सी हो गयी हैं॥ २॥ हे विप्र! आपने सम्पूर्ण जीवोंमें व्याप्त |
| एतद्विवेकविज्ञानं यदशेषेषु जन्तुषु।<br>भवता दर्शितं विप्र तत्परं प्रकृतेर्महत्॥ ३ | जिस असंग विज्ञानका दिग्दर्शन कराया है वह प्रकृतिसे परे ब्रह्म ही है [इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं है] ॥ ३॥ |
| नाहं वहामि शिबिकां शिबिका न मयि स्थिता।<br>शरीरमन्यदस्मत्तो येनेयं शिबिका धृता॥ ४ | परंतु आपने जो कहा कि मैं शिबिकाको वहन नहीं कर रहा हूँ, शिबिका मेरे ऊपर नहीं है, जिसने इसे उठा रखा है वह शरीर मुझसे अत्यन्त पृथक् है। जीवोंकी |
| गुणप्रवृत्त्या भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता।<br>प्रवर्तन्ते गुणा ह्येते किं ममेति त्वयोदितम्॥ ५ | प्रवृत्ति गुणों (सत्त्व, रज, तम)-की प्रेरणासे होती है और गुण कर्मोंसे प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं—इसमें मेरा कर्तृत्व कैसे माना जा सकता है? ॥ ४-५॥ हे परमार्थज्ञ! |
| एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते।<br>मनो विह्वलतामेति परमार्थार्थितां गतम्॥ ६ | यह बात मेरे कानोंमें पड़ते ही मेरा मन परमार्थका जिज्ञासु होकर बड़ा उतावला हो रहा है॥ ६॥ |
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