भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५९


योऽस्ति सोऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते।
आत्मन्येष न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥ ८५

ब्राह्मण उवाच

शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येष तथैव तत्।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा भ्रान्तिलक्षणः ॥ ८६

जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दन्तोष्ठौ तालुके नृप।
एते नाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः ॥ ८७

किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाह्ममिति स्वयम्।
अतः पीवानसीत्येतद्वक्तुमित्थं न युज्यते ॥ ८८

पिण्डः पृथग्यतः पुंसः शिरःपाण्यादिलक्षणः।
ततोऽहमिति कुत्रैतां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥ ८९

यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम।
तदैषोऽहमयं चान्यो वक्तुमेवमपीष्यते ॥ ९०

यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः।
तदा हि को भवान्सोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥ ९१

त्वं राजा शिबिका चेयमिमे वाहाः पुरःसराः।
अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥ ९२

वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिबिका त्वदधिष्ठिता।
किं वृक्षसंज्ञा वास्याः स्याद्दारुसंज्ञाथ वा नृप ॥ ९३

वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः।
न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिबिकागतम् ॥ ९४

शिबिका दारुसङ्घातो रचनास्थितिसंस्थितः।
अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठ तद्भेद शिबिका त्वया ॥ ९५

एवं छत्रशलाकानां पृथग्भावे विमृश्यताम्।
क्व यातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि ॥ ९६

पुमान्स्त्री गौरजो वाजी कुञ्जरो विहगस्तरुः।
देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥ ९७

पुमान्न देवो न नरो न पशुर्न च पादपः।
शरीराकृतिभेदास्तु भूपैते कर्मयोनयः ॥ ९८


हे ब्रह्मन्! 'जो है [अर्थात् जो आत्मा कर्त्ता-भोक्त्तारूपसे प्रतीत होता हुआ सदा सत्तारूपसे वर्तमान है] वही मैं हूँ'—ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता? हे द्विज! यह 'अहम्' शब्द तो आत्मामें किसी प्रकारके दोषका कारण नहीं होता ॥ ८५ ॥

**ब्राह्मण बोले—**हे राजन्! तुमने जो कहा कि 'अहम्' शब्दसे आत्मामें कोई दोष नहीं आता सो ठीक ही है, किन्तु अनात्मामें ही आत्मत्वका ज्ञान करानेवाला भ्रान्तिमूलक 'अहम्' शब्द ही दोषका कारण है ॥ ८६ ॥ हे नृप! 'अहम्' शब्दका उच्चारण जिह्वा, दन्त, ओष्ठ और तालुसे ही होता है, किन्तु ये सब उस शब्दके उच्चारणके कारण हैं, 'अहम्' (मैं) नहीं ॥ ८७ ॥ तो क्या जिह्वादि कारणोंके द्वारा यह वाणी ही स्वयं अपनेको 'अहम्' कहती है? नहीं। अतः ऐसी स्थितिमें 'तू मोटा है' ऐसा कहना भी उचित नहीं है ॥ ८८ ॥ सिर तथा कर-चरणादिरूप यह शरीर भी आत्मासे पृथक् ही है। अतः हे राजन्! इस 'अहम्' शब्दका मैं कहाँ प्रयोग करूँ? ॥ ८९ ॥ तथा हे नृपश्रेष्ठ! यदि मुझसे भिन्न कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहा जा सकता था ॥ ९० ॥ किन्तु, जब समस्त शरीरोंमें एक ही आत्मा विराजमान है तब 'आप कौन हैं? मैं वह हूँ।' ये सब वाक्य निष्फल ही हैं ॥ ९१ ॥

'तू राजा है, यह शिबिका है, ये सामने शिबिकावाहक हैं तथा ये सब तेरी प्रजा हैं'—हे नृप! इनमेंसे कोई भी बात परमार्थतः सत्य नहीं है ॥ ९२ ॥ हे राजन्! वृक्षसे लकड़ी हुई और उससे तेरी यह शिबिका बनी; तो बता इसे लकड़ी कहा जाय या वृक्ष? ॥ ९३ ॥ किन्तु 'महाराज वृक्षपर बैठे हैं' ऐसा कोई नहीं कहता और न कोई तुझे लकड़ीपर बैठा हुआ ही बताता है! सब लोग शिबिकामें बैठा हुआ ही कहते हैं ॥ ९४ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! रचनाविशेषमें स्थित लकड़ियोंका समूह ही तो शिबिका है। यदि वह उससे कोई भिन्न वस्तु है तो काष्ठको अलग करके उसे ढूँढ़ो ॥ ९५ ॥ इसी प्रकार छत्रकी शलाकाओंको अलग रखकर छत्रका विचार करो कि वह कहाँ रहता है। यही न्याय तुममें और मुझमें लागू होता है [अर्थात् मेरे और तुम्हारे शरीर भी पंचभूतसे अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं हैं] ॥ ९६ ॥ पुरुष, स्त्री, गौ, अज (बकरा), अश्व, गज, पक्षी और वृक्ष आदि लौकिक संज्ञाओंका प्रयोग कर्महेतुक शरीरोंमें ही जानना चाहिये ॥ ९७ ॥ हे राजन्! पुरुष (जीव) तो न देवता है, न मनुष्य है, न पशु है और न वृक्ष है। ये सब तो कर्मजन्य शरीरोंकी आकृतियोंके ही भेद हैं ॥ ९८ ॥