भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 558 में से

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पृष्ठ 169
१५८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३

यदा नोपचयस्तस्य न चैवापचयो नृप।<br>तदा पीवानसीतीत्थं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥ ७२ | हे नृप ! जब उसके उपचय (वृद्धि), अपचय (क्षय) ही नहीं होते तो तुमने यह बात किस युक्तिसे कही कि 'तू मोटा है?' ॥ ७२ ॥ यदि क्रमशः पृथिवी, पाद, जंघा, कटि, ऊरु और उदरपर स्थित कन्धोंपर रखी हुई यह शिबिका मेरे लिये भाररूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिये भी तो हो सकती है? [क्योंकि ये पृथिवी आदि तो जैसे तुमसे पृथक् हैं वैसे ही मुझ आत्मासे भी सर्वथा भिन्न हैं] ॥ ७३ ॥ तथा इस युक्तिसे तो अन्य समस्त जीवोंने भी केवल शिबिका ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथिवी आदिका भार उठा रखा है ॥ ७४ ॥ हे राजन् ! जब प्रकृतिजन्य कारणोंसे पुरुष सर्वथा भिन्न है तो उसका परिश्रम भी मुझको कैसे हो सकता है? ॥ ७५ ॥ और जिस द्रव्यसे यह शिबिका बनी हुई है उसीसे यह आपका, मेरा अथवा और सबका शरीर भी बना है; जिसमें कि ममत्वका आरोप किया हुआ है ॥ ७६ ॥ भूपादजङ्घाकट्यूरूजठरादिषु संस्थिते।<br>शिबिकेयं यथा स्कन्धे तथा भारः समस्त्वया॥ ७३ | तथान्यैर्जन्तुभिर्भूप शिबिकोढा न केवलम्।<br>शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवी सम्भवोऽपि वा ॥ ७४ | यदा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः कारणैर्नृप।<br>सोढव्यस्तु तदायासः कथं वा नृपते मया ॥ ७५ | यद्द्रव्या शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः।<br>भवतो मेऽखिलस्यास्य ममत्वेनोपबृंहितः ॥ ७६ | श्रीपराशर उवाच<br>एवमुक्तवाभवन्मौनी स वहञ्छिबिकां द्विज।<br>सोऽपि राजावतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन् ॥ ७७ | श्रीपराशरजी बोले— ऐसा कह वे द्विजवर शिबिकाको धारण किये हुए ही मौन हो गये; और राजाने भी तुरन्त पृथिवीपर उतरकर उनके चरण पकड़ लिये ॥ ७७ ॥ राजोवाच<br>भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज।<br>कथ्यतां को भवानत्र जाल्मरूपधरः स्थितः ॥ ७८ | राजा बोला— अहो द्विजराज ! इस शिबिकाको छोड़कर आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये। प्रभो ! कृपया बताइये, इस जडवेषको धारण किये आप कौन हैं? ॥ ७८ ॥ हे विद्वन् ! आप कौन हैं? किस निमित्तसे यहाँ आपका आना हुआ? तथा आनेका क्या कारण है? यह सब आप मुझसे कहिये। मुझे आपके विषयमें सुननेकी बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ ७९ ॥ यो भवान्यन्निमित्तं वा यदागमनकारणम्।<br>तत्सर्वं कथ्यतां विद्वन्मह्यं शुश्रूषवे त्वया ॥ ७९ | ब्राह्मण उवाच<br>श्रूयतां सोऽहमित्येतद्वक्तुं भूप न शक्यते।<br>उपभोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया ॥ ८० | ब्राह्मण बोले— हे राजन् ! सुनो, मैं अमुक हूँ— यह बात कही नहीं जा सकती और तुमने जो मेरे यहाँ आनेका कारण पूछा सो आना-जाना आदि सभी क्रियाएँ कर्मफलके उपभोगके लिये ही हुआ करती हैं ॥ ८० ॥ सुख-दुःखका भोग ही देह आदिकी प्राप्ति करानेवाला है तथा धर्माधर्मजन्य सुख-दुःखोंको भोगनेके लिये ही जीव देहादि धारण करता है ॥ ८१ ॥ हे भूपाल ! समस्त जीवोंकी सम्पूर्ण अवस्थाओंके कारण ये धर्म और अधर्म ही हैं, फिर विशेषरूपसे मेरे आगमनका कारण तुम क्यों पूछते हो ? ॥ ८२ ॥ सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ।<br>धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जन्तुर्देहादिमृच्छति ॥ ८१ | सर्वस्यैव हि भूपाल जन्तोः सर्वत्र कारणम्।<br>धर्माधर्मौ यतः कस्मात्कारणं पृच्छ्यते त्वया ॥ ८२ | राजोवाच<br>धर्माधर्मौ न सन्देहस्सर्वकार्येषु कारणम्।<br>उपभोगनिमित्तं च देहाद्देहान्तरागमः ॥ ८३ | राजा बोला— अवश्य ही, समस्त कार्योंमें धर्म और अधर्म ही कारण हैं और कर्मफलके उपभोगके लिये ही एक देहसे दूसरे देहमें जाना होता है ॥ ८३ ॥ किन्तु आपने जो कहा कि 'मैं कौन हूँ— यह नहीं बताया जा सकता' इसी बातको सुननेकी मुझे इच्छा हो रही है ॥ ८४ ॥ यस्त्वेतद्भवता प्रोक्तं सोऽहमित्येतदात्मनः।<br>वक्तुं न शक्यते श्रोतुं तन्ममेच्छा प्रवर्तते ॥ ८४ |

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