भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

अ० १३ ] * द्वितीय अंश * १५५


समाधिभङ्गस्तस्यासीत्तन्मयत्वादृतात्मनः।
सन्त्यक्तराज्यभोगर्द्धिश्वजनस्यापि भूपतेः॥ २९
इस प्रकार उसीमें आसक्तचित्त रहनेसे, राज्य, भोग, समृद्धि और स्वजनोंको त्याग देनेवाले भी राजा भरतकी समाधि भंग हो गयी॥ २९॥

चपलं चपले तस्मिन्दूरगं दूरगामिनि।
मृगपोतेऽभवच्चित्तं स्थैर्यवत्तस्य भूपतेः॥ ३०
उस राजाका स्थिरचित्त उस मृगके चंचल होनेपर चंचल हो जाता और दूर चले जानेपर दूर चला जाता॥ ३०॥

कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः।
पितेव सास्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः॥ ३१
कालान्तरमें राजा भरतने, उस मृगबालकद्वारा पुत्रके सजल नयनोंसे देखे जाते हुए पिताके समान अपने प्राणोंका त्याग किया॥ ३१॥

मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजन्प्राणानसावपि।
तन्मयत्वेन मैत्रेय नान्यत्किञ्चिदचिन्तयत्॥ ३२
हे मैत्रेय! राजा भी प्राण छोड़ते समय स्नेहवश उस मृगको ही देखता रहा तथा उसीमें तन्मय रहनेसे उसने और कुछ भी चिन्तन नहीं किया॥ ३२॥

ततश्च तत्कालकृतां भावनां प्राप्य तादृशीम्।
जम्बूमार्गे महारण्ये जातो जातिस्मरो मृगः॥ ३३
तदनन्तर, उस समयकी सुदृढ़ भावनाके कारण वह जम्बूमार्ग (कालंजरपर्वत)-के घोर वनमें अपने पूर्वजन्मकी स्मृतिसे युक्त एक मृग हुआ॥ ३३॥

जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम।
विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ॥ ३४
हे द्विजोत्तम! अपने पूर्वजन्मका स्मरण रहनेके कारण वह संसारसे उपरत हो गया और अपनी माताको छोड़कर फिर शालग्रामक्षेत्रमें आकर ही रहने लगा॥ ३४॥

शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम्।
मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ॥ ३५
वहाँ सूखे घास-फूस और पत्तोंसे ही अपना शरीर-पोषण करता हुआ वह अपने मृगत्व-प्राप्तिके हेतुभूत कर्मोंका निराकरण करने लगा॥ ३५॥

तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः।
सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले॥ ३६
तदनन्तर, उस शरीरको छोड़कर उसने सदाचार-सम्पन्न योगियोंके पवित्र कुलमें ब्राह्मण-जन्म ग्रहण किया। उस देहमें भी उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा॥ ३६॥

सर्वविज्ञानसम्पन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्।
अपश्यत्स च मैत्रेय आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ३७
हे मैत्रेय! वह सर्वविज्ञानसम्पन्न और समस्त शास्त्रोंके मर्मको जाननेवाला था तथा अपने आत्माको निरन्तर प्रकृतिसे परे देखता था॥ ३७॥

आत्मनोऽधिगतज्ञानो देवादीनि महामुने।
सर्वभूतान्यभेदेन स ददर्श तदात्मनः॥ ३८
हे महामुने! आत्मज्ञानसम्पन्न होनेके कारण वह देवता आदि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेसे अभिन्नरूपसे देखता था॥ ३८॥

न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतिम्।
न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च॥ ३९
उपनयन-संस्कार हो जानेपर वह गुरुके पढ़ानेपर भी वेद-पाठ नहीं करता था तथा न किसी कर्मकी ओर ध्यान देता और न कोई अन्य शास्त्र ही पढ़ता था॥ ३९॥

उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडवाक्यमभाषत।
तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यवाक्योक्तिसंश्रितम्॥ ४०
जब कोई उससे बहुत पूछताछ करता तो जडके समान कुछ असंस्कृत, असार एवं ग्रामीण वाक्योंसे मिले हुए वचन बोल देता॥ ४०॥

अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृग्द्विजः।
क्लिन्नदन्तान्तरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः॥ ४१
निरन्तर मैला-कुचैला शरीर, मलिन वस्त्र और अपरिमार्जित दन्तयुक्त रहनेके कारण वह ब्राह्मण सदा अपने नगरनिवासियोंसे अपमानित होता रहता था॥ ४१॥

सम्मानना परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः।
जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति॥ ४२
हे मैत्रेय! योगश्रीके लिये सबसे अधिक हानिकारक सम्मान ही है, जो योगी अन्य मनुष्योंसे अपमानित होता है वह शीघ्र ही सिद्धि लाभ कर लेता है॥ ४२॥