भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165
१५४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १३ ]

ततः सम्भवत्तत्र पीतप्राये जले तथा।
सिंहस्य नादः सुमहान्सर्वप्राणिभयङ्करः ॥ १४

ततः सा सहसा त्रासादाप्लुता निम्नगातटम्।
अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह॥ १५

तमूह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिप्लुतम्।
जग्राह स नृपो गर्भात्पतितं मृगपोतकम् ॥ १६

गर्भप्रच्युतिदोषेण प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च।
मैत्रेय सापि हरिणी पपात च ममार च॥ १७

हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः।
मृगपोतं समादाय निजमाश्रममागतः ॥ १८

चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः।
पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने ॥ १९

चचाराश्रमपर्यन्ते तृणानि गहनेषु सः।
दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासादभ्यायायौ पुनः ॥ २०

प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्यथाश्रमम्।
पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजाजिरे ॥ २१

तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि।
आसीच्चेतः समासक्तं न ययावन्यतो द्विज ॥ २२

विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबान्धवः।
ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणबालके ॥ २३

किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः।
चिरायमाणे निष्क्रान्ते तस्यासीदिति मानसम् ॥ २४

एषा वसुमती तस्य खुराग्रक्षतकर्कुरा।
प्रीतये मम जातोऽसौ क्व ममैणकबालकः ॥ २५

विषाणाग्रेण मद्बाहुं कण्डूयनपरो हि सः।
क्षेमेणाभ्यागतोऽरण्यादपि मां सुखयिष्यति ॥ २६

एते लूनशिखास्तस्य दशनैरचिरोद्गतैः।
कुशाः काशा विराजन्ते बटवः सामगा इव ॥ २७

इत्थं चिरगते तस्मिन्स चक्रे मानसं मुनिः।
प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥ २८


हिन्दी अनुवाद

उस समय जब वह प्रायः जल पी चुकी थी, वहाँ सब प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली सिंहकी गम्भीर गर्जना सुनायी पड़ी ॥ १४ ॥ तब वह अत्यन्त भयभीत हो अकस्मात् उछलकर नदीके तटपर चढ़ गयी; अतः अत्यन्त उच्च स्थानपर चढ़नेके कारण उसका गर्भ नदीमें गिर गया ॥ १५ ॥

नदीकी तरंगमालाओंमें पड़कर बहते हुए उस गर्भ-भ्रष्ट मृगबालकको राजा भरतने पकड़ लिया ॥ १६ ॥ हे मैत्रेय ! गर्भपातके दोषसे तथा बहुत ऊँचे उछलनेके कारण वह हरिणी भी पछाड़ खाकर गिर पड़ी और मर गयी ॥ १७ ॥ उस हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी भरत उसके बच्चेको अपने आश्रमपर ले आये ॥ १८ ॥

हे मुने! फिर राजा भरत उस मृगछौनेका नित्यप्रति पालन-पोषण करने लगे और वह भी उनसे पोषित होकर दिन-दिन बढ़ने लगा ॥ १९ ॥ वह बच्चा कभी तो उस आश्रमके आस-पास ही घास चरता रहता और कभी वनमें दूरतक जाकर फिर सिंहके भयसे लौट आता ॥ २० ॥ प्रातःकाल वह बहुत दूर भी चला जाता, तो भी सायंकालको फिर आश्रममें ही लौट आता और भरतजीके आश्रमकी पर्णशालाके आँगनमें पड़ रहता ॥ २१ ॥

हे द्विज! इस प्रकार कभी पास और कभी दूर रहनेवाले उस मृगमें ही राजाका चित्त सर्वदा आसक्त रहने लगा, वह अन्य विषयोंकी ओर जाता ही नहीं था ॥ २२ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण राज-पाट और अपने पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंको छोड़ दिया था वे ही भरतजी उस हरिणके बच्चेपर अत्यन्त ममता करने लगे ॥ २३ ॥ उसे बाहर जानेके अनन्तर यदि लौटनेमें देरी हो जाती तो वे मन-ही-मन सोचने लगते —'अहो! उस बच्चेको आज किसी भेड़ियेने तो नहीं खा लिया? किसी सिंहके पंजेमें तो आज वह नहीं पड़ गया? ॥ २४ ॥ देखो, उसके खुरोंके चिह्नोंसे यह पृथिवी कैसी चित्रित हो रही है? मेरी ही प्रसन्नताके लिये उत्पन्न हुआ वह मृगछौना न जाने आज कहाँ रह गया है? ॥ २५ ॥ क्या वह वनसे कुशलपूर्वक लौटकर अपने सींगोंसे मेरी भुजाको खुजलाकर मुझे आनन्दित करेगा? ॥ २६ ॥ देखो, उसके नवजात दाँतोंसे कटी हुई शिखावाले ये कुश और काश सामाध्यायी [शिखाहीन] ब्रह्मचारियोंके समान कैसे सुशोभित हो रहे हैं? ॥ २७ ॥ देरके गये हुए उस बच्चेके निमित्त भरत मुनि इसी प्रकार चिन्ता करने लगते थे और जब वह उनके निकट आ जाता तो उसके प्रेमसे उनका मुख खिल जाता था ॥ २८ ॥