भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 163
१५२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १२
ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा-<br>ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ ३९<br>यदा तु शुद्धं निजरूपि सर्वं<br>कर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम्।<br>तदा हि सङ्कल्पतरोः फलानि<br>भवन्ति नो वस्तुषु वस्तु भेदाः ॥ ४०पदार्थाकार नहीं हैं। अतः इन पर्वत, समुद्र और पृथिवी आदि भेदोंको तुम एकमात्र विज्ञानका ही विलास जानो ॥ ३९ ॥ जिस समय जीव आत्मज्ञानके द्वारा दोषरहित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय हो जानेसे अपने शुद्ध-स्वरूपमें स्थित हो जाता है उस समय आत्मवस्तुमें संकल्पवृक्षके फलरूप पदार्थ-भेदोंकी प्रतीति नहीं होती ॥ ४० ॥
वस्त्वस्ति किं कुत्रचिदादिमध्य-<br>पर्यन्तहीनं सततैकरूपम्।<br>यच्चान्यथात्वं द्विज याति भूयो<br>न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ ४१हे द्विज ! कोई भी घटादि वस्तु है ही कहाँ ? आदि, मध्य और अन्तसे रहित नित्य एकरूप चित् ही तो सर्वत्र व्याप्त है। जो वस्तु पुनः-पुनः बदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं रहती, उसमें वास्तविकता ही क्या है ? ॥ ४१ ॥
मही घटत्वं घटतः कपालिका<br>कपालिका चूर्णरजस्ततोऽणुः।<br>जनैः स्वकर्मस्तिमित आत्मनिश्चयै-<br>रालक्ष्यते ब्रूहि किमत्र वस्तु ॥ ४२देखो, मृत्तिका ही घटरूप हो जाती है और फिर वही घटसे कपाल, कपालसे चूर्णरज और रजसे अणुरूप हो जाती है। तो फिर बताओ अपने कर्मोंके वशीभूत हुए मनुष्य आत्मस्वरूपको भूलकर इसमें कौन-सी सत्य वस्तु देखते हैं ॥ ४२ ॥
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चित्-<br>क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्।<br>विज्ञानमेकं निजकर्मभेद-<br>विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ ४३अतः हे द्विज ! विज्ञानसे अतिरिक्त कभी कहीं कोई पदार्थादि नहीं हैं। अपने-अपने कर्मोंके भेदसे भिन्न-भिन्न चित्तोंद्वारा एक ही विज्ञान नाना प्रकारसे मान लिया गया है ॥ ४३ ॥
ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोक-<br>मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् ।<br>एकं सदेकं परमः परेशः<br>स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ४४वह विज्ञान अति विशुद्ध, निर्मल, निःशोक और लोभादि समस्त दोषोंसे रहित है। वही एक सत्यस्वरूप परम परमेश्वर वासुदेव है, जिससे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥ ४४ ॥
सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो<br>ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत्।<br>एतत्तु यत्संव्यवहारभूतं<br>तत्रापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥ ४५इस प्रकार मैंने तुमसे यह परमार्थका वर्णन किया है, केवल एक ज्ञान ही सत्य है, उससे भिन्न और सब असत्य है। इसके अतिरिक्त जो केवल व्यवहारमात्र है उस त्रिभुवनके विषयमें भी मैं तुमसे कह चुका ॥ ४५ ॥
यज्ञः पशुर्वह्निरशेषऋत्विक्<br>सोमः सुराः स्वर्गमयश्च कामः।<br>इत्यादिकर्माश्रितमार्गदृष्टं<br>भूरादिभोगाश्च फलानि तेषाम् ॥ ४६[ इस ज्ञान-मार्गके अतिरिक्त] मैंने कर्म-मार्ग-सम्बन्धी यज्ञ, पशु, वह्नि, समस्त ऋत्विक्, सोम, सुरगण तथा स्वर्गमय कामना आदिका भी दिग्दर्शन करा दिया। भूर्लोकादिके सम्पूर्ण भोग इन कर्म-कलापोंके ही फल हैं ॥ ४६ ॥
यच्चैतद्भुवनगतं मया तवोक्तं<br>सर्वत्र व्रजति हि तत्र कर्मवश्यः।<br>ज्ञात्वैवं ध्रुवमचलं सदैकरूपं<br>तत्कुर्याद्विशति हि येन वासुदेवम् ॥ ४७यह जो मैंने तुमसे त्रिभुवनगत लोकोंका वर्णन किया है इन्हींमें जीव कर्मवश घूमा करता है, ऐसा जानकर इससे विरक्त हो मनुष्यको वही करना चाहिये जिससे ध्रुव, अचल एवं सदा एकरूप भगवान् वासुदेवमें लीन हो जाय ॥ ४७ ॥
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इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥


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