भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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१४२* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ८
संस्कृतहिन्दी
यावन्मात्रे प्रदेशे तु मैत्रेयावस्थितो ध्रुवः।<br>क्षयमायाति तावत्तु भूमेराभूतसम्प्लवात्॥ ९७हे मैत्रेय! जितने प्रदेशमें ध्रुव स्थित है, पृथिवीसे लेकर उस प्रदेशपर्यन्त सम्पूर्ण देश प्रलयकालमें नष्ट हो जाता है॥ ९७॥
ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यस्तु ध्रुवो यत्र व्यवस्थितः।<br>एतद्विष्णुपदं दिव्यं तृतीयं व्योम्नि भासुरम्॥ ९८सप्तर्षियोंसे उत्तर-दिशामें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव स्थित है वह अति तेजोमय स्थान ही आकाशमें विष्णुभगवान्‌का तीसरा दिव्यधाम है॥ ९८॥
निर्धूतदोषपङ्कानां यतीनां संयतात्मनाम्।<br>स्थानं तत्परमं विप्र पुण्यपापपरिक्षये॥ ९९हे विप्र! पुण्य-पापके क्षीण हो जानेपर दोष-पंकशून्य संयतात्मा मुनिजनोंका यही परमस्थान है॥ ९९॥
अपुण्यपुण्योपरमे क्षीणाशेषाप्तिहेतवः।<br>यत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १००पाप-पुण्यके निवृत्त हो जाने तथा देह-प्राप्तिके सम्पूर्ण कारणोंके नष्ट हो जानेपर प्राणिगण जिस स्थानपर जाकर फिर शोक नहीं करते वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १००॥
धर्मध्रुवाद्यास्तिष्ठन्ति यत्र ते लोकसाक्षिणः।<br>तत्साष्ट्र्योत्पन्नयोगोद्भास्तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०१जहाँ भगवान्‌की समान ऐश्वर्यतासे प्राप्त हुए योगद्वारा सतेज होकर धर्म और ध्रुव आदि लोक-साक्षिगण निवास करते हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०१॥
यत्रोतमेतत्प्रोतं च यद्भूतं सचराचरम्।<br>भाव्यं च विश्वं मैत्रेय तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०२हे मैत्रेय! जिसमें यह भूत, भविष्यत् और वर्तमान चराचर जगत् ओत-प्रोत हो रहा है वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०२॥
दिवीव चक्षुराततं योगिनां तन्मयात्मनाम्।<br>विवेकज्ञानदृष्टं च तद्विष्णोः परमं पदम्॥ १०३जो तल्लीन योगिजनोंने आकाश-मण्डलमें देदीप्यमान सूर्यके समान सबके प्रकाशकरूपसे प्रतीत होता है तथा जिसका विवेक-ज्ञानसे ही प्रत्यक्ष होता है वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १०३॥
यस्मिन्प्रतिष्ठितो भास्वान्मेढीभूतः स्वयं ध्रुवः।<br>ध्रुवे च सर्वज्योतींषि ज्योतिःष्वाम्भोमुचो द्विज॥ १०४<br><br>मेघेषु सङ्गता वृष्टिर्वृष्टेः सृष्टेश्च पोषणम्।<br>आप्यायनं च सर्वेषां देवादीनां महामुने॥ १०५हे द्विज! उस विष्णुपदमें ही सबके आधारभूत परम तेजस्वी ध्रुव स्थित हैं, तथा ध्रुवजीमें समस्त नक्षत्र, नक्षत्रोंमें मेघ और मेघोंमें वृष्टि आश्रित है। हे महामुने! उस वृष्टिसे ही समस्त सृष्टिका पोषण और सम्पूर्ण देव-मनुष्यादि प्राणियोंकी पुष्टि होती है॥ १०४-१०५॥
ततश्चाज्याहुतिद्वारा पोषितास्ते हविर्भुजः।<br>वृष्टेः कारणतां यान्ति भूतानां स्थितये पुनः॥ १०६तदनन्तर गौ आदि प्राणियोंसे उत्पन्न दुग्ध और घृत आदिकी आहुतियोंसे परितुष्ट अग्निदेव ही प्राणियोंकी स्थितिके लिये पुनःवृष्टिके कारण होते हैं॥ १०६॥
एवमेतत्पदं विष्णोस्तृतीयममलात्मकम्।<br>आधारभूतं लोकानां त्रयाणां वृष्टिकारणम्॥ १०७इस प्रकार विष्णुभगवान्‌का यह निर्मल तृतीय लोक (ध्रुव) ही त्रिलोकीका आधारभूत और वृष्टिका आदिकारण है॥ १०७॥
ततः प्रभवति ब्रह्मन्सर्वपापहरा सरित्।<br>गङ्गा देवाङ्गनाङ्गानामनुलेपनपिञ्जरा॥ १०८हे ब्रह्मन्! इस विष्णुपदसे ही देवांगनाओंके अंगरागसे पाण्डुवर्ण हुई-सी सर्वपापापहारिणी श्रीगंगाजी उत्पन्न हुई हैं॥ १०८॥
वामपादाम्बुजाङ्गुष्ठनखस्रोतोविनिर्गताम्।<br>विष्णोर्बिभर्ति यां भक्त्या शिरसाहर्निशं ध्रुवः॥ १०९विष्णुभगवान्‌के वाम चरण-कमलके अँगूठेके नखरूप स्रोतसे निकली हुई उन गंगाजीको ध्रुव दिन-रात अपने मस्तकपर धारण करता है॥ १०९॥
ततः सप्तर्षयो यस्याः प्राणायामपरायणाः।<br>तिष्ठन्ति वीचिमालाभिरुह्यमानजटा जले॥ ११०तदनन्तर जिनके जलमें खड़े होकर प्राणायाम-परायण सप्तर्षिगण उनकी तरंगभंगीसे जटाकलापके कम्पायमान होते हुए, अघमर्षण-मन्त्रका जप करते हैं
वार्योघैः सन्ततैैर्यस्याः प्लावितं शशिमण्डलम्।<br>भूयोऽधिकतरां कान्तिं वहत्येतदुह क्षये॥ १११तथा जिनके विस्तृत जलसमूहसे आप्लावित