विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९ ] * द्वितीय अंश * १४३
मेरुपृष्ठे पतत्युच्चैर्निष्क्रान्ता शशिमण्डलात्। जगतः पावनार्थाय प्रयाति च चतुर्दिशम्॥ ११२
सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च संस्थिता। एकैव या चतुर्भेदा दिग्भेदगतिलक्षणा॥ ११३
भेदं चालकनन्दाख्यं यस्याः शर्वोऽपि दक्षिणम्। दधार शिरसा प्रीत्या वर्षाणामधिकं शतम्॥ ११४
शम्भोर्जटाकलापाच्च विनिष्क्रान्तास्थिशर्कराः। प्लावयित्वा दिवं निन्ये या पापान्सगरात्मजान्॥ ११५
स्नातस्य सलिले यस्याः सद्यः पापं प्रणश्यति। अपूर्वपुण्यप्राप्तिश्च सद्यो मैत्रेय जायते॥ ११६
दत्ताः पितृभ्यो यत्रापस्तनयैः श्रद्धयान्वितैः। समाशतं प्रयच्छन्ति तृप्तिं मैत्रेय दुर्लभाम्॥ ११७
यस्यामिष्ट्वा महायज्ञैर्यज्ञेशं पुरुषोत्तमम्। द्विज भूपाः परां सिद्धिमवापुर्दिवि चेह च॥ ११८
स्नानाद्विधूतपापाश्च यज्जलैर्यतयस्तथा। केशवासक्तमनसः प्राप्ता निर्वाणमुत्तमम्॥ ११९
श्रुताऽभिलषिता दृष्टा स्पृष्टा पीताऽवगाहिता। या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने॥ १२०
गङ्गा गङ्गेति यैर्नाम योजनानां शतेष्वपि। स्थितैरुच्चारितं हन्ति पापं जन्मत्रयार्जितम्॥ १२१
यतः सा पावनायालं त्रयाणां जगतामपि। समुद्भूता परं तत्त तृतीयं भगवत्पदम्॥ १२२
होकर चन्द्रमण्डल क्षयके अनन्तर पुनः पहलेसे भी अधिक कान्ति धारण करता है, वे श्रीगंगाजी चन्द्रमण्डलसे निकलकर मेरुपर्वतके ऊपर गिरती हैं और संसारको पवित्र करनेके लिये चारों दिशाओंमें जाती हैं॥ ११०-११२॥ चारों दिशाओंमें जानेसे वे एक ही सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा—इन चार भेदोंवाली हो जाती हैं॥ ११३॥ जिसके अलकनन्दा नामक दक्षिणीय भेदको भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सौ वर्षसे भी अधिक अपने मस्तकपर धारण किया था, जिसने श्रीशंकरके जटाकलापसे निकलकर पापी सगरपुत्रोंके अस्थिचूर्णको आप्लावित कर उन्हें स्वर्गमें पहुँचा दिया। हे मैत्रेय! जिसके जलमें स्नान करनेसे शीघ्र ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अपूर्व पुण्यकी प्राप्ति होती है॥ ११४-११६॥ जिसके प्रवाहमें पुत्रोंद्वारा पितरोंके लिये श्रद्धापूर्वक किया हुआ एक दिनका भी तर्पण उन्हें सौ वर्षतक दुर्लभ तृप्ति देता है॥ ११७॥ हे द्विज! जिसके तटपर राजाओंने महायज्ञोंसे यज्ञेश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका यजन करके इहलोक और स्वर्गलोकमें परमसिद्धि लाभ की है॥ ११८॥ जिसके जलमें स्नान करनेसे निष्पाप हुए यतिजनोंने भगवान् केशवमें चित्त लगाकर अत्युत्तम निर्वाणपद प्राप्त किया है॥ ११९॥ जो अपना श्रवण, इच्छा, दर्शन, स्पर्श, जलपान, स्नान तथा यशोगान करनेसे ही नित्यप्रति प्राणियोंको पवित्र करती रहती है॥ १२०॥ तथा जिसका 'गंगा, गंगा' ऐसा नाम सौ योजनकी दूरीसे भी उच्चारण किये जानेपर [ जीवके ] तीन जन्मोंके संचित पापोंको नष्ट कर देता है॥ १२१॥ त्रिलोकीको पवित्र करनेमें समर्थ वह गंगा जिससे उत्पन्न हुई है, वही भगवान्का तीसरा परमपद है॥ १२२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽंशे अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
नवाँ अध्याय
ज्योतिष्चक्र और शिशुमारचक्र
श्रीपराशर उवाच
तारामयं भगवतः शिशुमाराकृति प्रभोः।
दिवि रूपं हरेर्यत्तु तस्य पुच्छे स्थितो ध्रुवः॥ १
सैष भ्रमन् भ्रामयति चन्द्रादित्यादिकान् ग्रहान्।
भ्रमन्तमनु तं यान्ति नक्षत्राणि च चक्रवत्॥ २
श्रीपराशरजी बोले— आकाशमें भगवान् विष्णुका जो शिशुमार (गिरगिट अथवा गोधा)—के समान आकार-वाला तारामय स्वरूप देखा जाता है, उसके पुच्छ-भागमें ध्रुव अवस्थित है॥ १॥ यह ध्रुव स्वयं घूमता हुआ चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंको घुमाता है। उस भ्रमणशील ध्रुवके साथ नक्षत्रगण भी चक्रके समान घूमते रहते हैं॥ २॥