विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ९
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सूर्याचन्द्रमसौ तारा नक्षत्राणि ग्रहैः सह।<br/>वातानीकमयैर्बन्धैर्ध्रुवे बद्धानि तानि वै॥ ३<br/>शिशुमाराकृति प्रोक्तं यद्रूपं ज्योतिषां दिवि।<br/>नारायणोऽयनं धाम्नां तस्याधारः स्वयं हृदि॥ ४<br/>उत्तानपादपुत्रस्तु तमाराध्य जगत्पतिम्।<br/>स ताराशिशुमारस्य ध्रुवः पुच्छे व्यवस्थितः॥ ५<br/>आधारः शिशुमारस्य सर्वाध्यक्षो जनार्दनः।<br/>ध्रुवस्य शिशुमारस्तु ध्रुवे भानुर्व्यवस्थितः॥ ६<br/>तदाधारं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्॥ ७<br/>येन विप्र विधानेन तन्ममैकमनाः शृणु।<br/>विवस्वानष्टभिर्मासैरादायापो रसात्मिकाः।<br/>वर्षत्यम्बु ततश्चान्रमन्नादप्यखिलं जगत्॥ ८<br/>विवस्वांशुभिस्तीक्ष्णैरादाय जगतो जलम्।<br/>सोमं पुष्णात्यथेन्दुश्च वायुनाडीमयैर्दिवि।<br/>नालैर्विक्षिप्ततेऽभ्रेषु धूमाग्न्यनिलमूर्तिषु॥ ९<br/>न भ्रश्यन्ति यतस्तेभ्यो जलान्यभ्राणि तान्यतः।<br/>अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः।<br/>संस्कारं कालजनितं मैत्रेयासाद्य निर्मलाः॥ १०<br/>सरित्समुद्रभौमास्तु तथापः प्राणिसम्भवाः।<br/>चतुष्प्रकारा भगवानादत्ते सविता मुने॥ ११<br/>आकाशगङ्गासलिलं तथादाय गभस्तिमान्।<br/>अनभ्रगतमेवोर्व्यां सद्यः क्षिपति रश्मिभिः॥ १२<br/>तस्य संस्पर्शनिर्धूतपापपङ्को द्विजोत्तम।<br/>न याति नरकं मर्त्यो दिव्यं स्नानं हि तत्स्मृतम्॥ १३<br/>दृष्टसूर्ये हि यद्वारि पतत्यभ्रैर्विना दिवः।<br/>आकाशगङ्गासलिलं तद्गोभिः क्षिप्यते रवेः॥ १४<br/>कृत्तिकादिषु ऋक्षेषु विषमेषु च यद्दिवः।<br/>दृष्टार्कपतितं ज्ञेयं तद्गाङ्गं दिग्गजोझितम्॥ १५<br/>युग्मर्क्षेषु च यत्तोयं पतत्यर्कोज्झितं दिवः।<br/>तत्सूर्यरश्मिभिः सर्वं समादाय निरस्यते॥ १६<br/>उभयं पुण्यमत्यर्थं नृणां पापभयापहम्।<br/>आकाशगङ्गासलिलं दिव्यं स्नानं महामुने॥ १७ | सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र और अन्यान्य समस्त ग्रहगण वायु-मण्डलमयी डोरीसे ध्रुवके साथ बँधे हुए हैं॥ ३॥<br/>मैंने तुमसे आकाशमें ग्रहगणके जिस शिशुमार-स्वरूपका वर्णन किया है, अनन्त तेजके आश्रय स्वयं भगवान् नारायण ही उसके हृदयस्थित आधार हैं॥ ४॥ उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने उन जगत्पतिकी आराधना करके तारामय शिशुमारके पुच्छस्थानमें स्थिति प्राप्त की है॥ ५॥ शिशुमारके आधार सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, शिशुमार ध्रुवका आश्रय है और ध्रुवमें सूर्यदेव स्थित हैं तथा हे विप्र! जिस प्रकार देव, असुर और मनुष्यादिके सहित यह सम्पूर्ण जगत् सूर्यके आश्रित है, वह तुम एकाग्र होकर सुनो। सूर्य आठ मासतक अपनी किरणोंसे छः रसोंसे युक्त जलको ग्रहण करके उसे चार महीनोंमें बरसा देता है उससे अन्नकी उत्पत्ति होती है और अन्नहीसे सम्पूर्ण जगत् पोषित होता है॥ ६–८॥ सूर्य अपनी तीक्ष्ण रश्मियोंसे संसारका जल खींचकर उससे चन्द्रमाका पोषण करता है और चन्द्रमा आकाशमें वायुमयी नाड़ियोंके मार्गसे उसे धूम, अग्नि और वायुमय मेघोंमें पहुँचा देता है॥ ९॥ यह चन्द्रमाद्वारा प्राप्त जल मेघोंसे तुरन्त ही भ्रष्ट नहीं होता इसलिये 'अभ्र' कहलाता है। हे मैत्रेय! कालजनित संस्कारके प्राप्त होनेपर यह अभ्रस्थ जल निर्मल होकर वायुकी प्रेरणासे पृथिवीपर बरसने लगता है ॥ १०॥<br/>हे मुने! भगवान् सूर्यदेव नदी, समुद्र, पृथिवी तथा प्राणियोंसे उत्पन्न—इन चार प्रकारके जलोंका आकर्षण करते हैं॥ ११॥ तथा आकाशगंगाके जलको ग्रहण करके वे उसे बिना मेघादिके अपनी किरणोंसे ही तुरन्त पृथिवीपर बरसा देते हैं॥ १२॥ हे द्विजोत्तम! उसके स्पर्शमात्रसे पाप-पंकके धुल जानेसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता। अतः वह दिव्य-स्नान कहलाता है॥ १३॥ सूर्यके दिखलायी देते हुए, बिना मेघोंके ही जो जल बरसता है वह सूर्यकी किरणोंद्वारा बरसाया हुआ आकाशगंगाका ही जल होता है॥ १४॥ कृत्तिका आदि विषम (अयुग्म) नक्षत्रोंमें जो जल सूर्यके प्रकाशित रहते हुए बरसता है उसे दिग्गजोंद्वारा बरसाया हुआ आकाशगंगाका जल समझना चाहिये॥ १५॥ [रोहिणी और आर्द्रा आदि] सम संख्यावाले नक्षत्रोंमें जिस जलको सूर्य बरसाता है वह सूर्यरश्मियोंद्वारा [आकाशगंगासे] ग्रहण करके ही बरसाया जाता है॥ १६॥ हे महामुने! आकाशगंगाके ये [सम तथा विषम नक्षत्रोंमें बरसनेवाले ] दोनों प्रकारके जलमय दिव्य स्नान अत्यन्त पवित्र और मनुष्योंके पाप-भयको दूर करनेवाले हैं॥ १७॥ |