विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० १० ] * द्वितीय अंश * १४५
| यत्तु मेघैः समुत्सृष्टं वारि तत्प्राणिनां द्विज।<br>पुष्णात्योषधयः सर्वा जीवनायामृतं हि तत्॥ १८ | हे द्विज! जो जल मेघोंद्वारा बरसाया जाता है वह प्राणियोंके जीवनके लिये अमृतरूप होता है और ओषधियोंका पोषण करता है॥ १८॥ |
| तेन वृद्धिं परां नीतः सकलश्चौषधीगणः।<br>साधकः फलपाकान्तः प्रजानां द्विज जायते॥ १९ | हे विप्र! उस वृष्टिके जलसे परम वृद्धिको प्राप्त होकर समस्त ओषधियाँ और फल पकनेपर सूख जानेवाले [गोधूम, यव आदि अन्न] प्रजावर्गके [शरीरकी उत्पत्ति एवं पोषण आदिके] साधक होते हैं॥ १९॥ |
| तेन यज्ञान्यथाप्रोक्तान्मानवाः शास्त्रचक्षुषः।<br>कुर्वन्त्यहरहस्तैश्च देवानाप्याययन्ति ते॥ २० | उनके द्वारा शास्त्रविद् मनीषीगण नित्यप्रति यथाविधि यज्ञानुष्ठान करके देवताओंको सन्तुष्ट करते हैं॥ २०॥ |
| एवं यज्ञाश्च वेदाश्च वर्णाश्च वृष्टिपूर्वकाः।<br>सर्वे देवनिकायाश्च सर्वे भूतगणाश्च ये॥ २१ | इस प्रकार सम्पूर्ण यज्ञ, वेद, ब्राह्मणादि वर्ण, समस्त देवसमूह और प्राणिगण वृष्टिके ही आश्रित हैं॥ २१॥ |
| वृष्ट्या धृतमिदं सर्वमन्नं निष्पाद्यते यया।<br>सापि निष्पाद्यते वृष्टिः सवित्रा मुनिसत्तम॥ २२ | हे मुनिश्रेष्ठ! अन्नको उत्पन्न करनेवाली वृष्टि ही इन सबको धारण करती है तथा उस वृष्टिकी उत्पत्ति सूर्यसे होती है॥ २२॥ |
| आधारभूतः सवितुर्ध्रुवो मुनिवरोत्तम।<br>ध्रुवस्य शिशुमारोऽसौ सोऽपि नारायणात्मकः॥ २३ | हे मुनिवरोत्तम! सूर्यका आधार ध्रुव है, ध्रुवका शिशुमार है तथा शिशुमारके आश्रय श्रीनारायण हैं॥ २३॥ |
| हृदि नारायणस्तस्य शिशुमारस्य संस्थितः।<br>बिभर्ति सर्वभूतानामादिभूतः सनातनः॥ २४ | उस शिशुमारके हृदयमें श्रीनारायण स्थित हैं जो समस्त प्राणियोंके पालनकर्ता तथा आदिभूत सनातन पुरुष हैं॥ २४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे द्वितीयेऽशे नवमोऽध्यायः॥ ९॥
दसवाँ अध्याय
द्वादश सूर्योंके नाम एवं अधिकारियोंका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| साशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः।<br>आरोहणावरोहाभ्यां भानोरब्देन या गतिः॥ १ | आरोह और अवरोहके द्वारा सूर्यकी एक वर्षमें जितनी गति है उस सम्पूर्ण मार्गकी दोनों काष्ठाओंका अन्तर एक सौ अस्सी मण्डल है॥ १॥ |
| स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्ऋषिभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ २ | सूर्यका रथ [प्रति मास] भिन्न-भिन्न आदित्य, ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, सर्प और राक्षसगणोंसे अधिष्ठित होता है॥ २॥ |
| धाता क्रतुस्थला चैव पुलस्त्यो वासुकिस्तथा।<br>रथभृद्ग्रामणीर्हेतिस्तुम्बुरुश्चैव सप्तमः॥ ३ | हे मैत्रेय! मधुमास चैत्रमें सूर्यके रथमें सर्वदा धाता नामक आदित्य, क्रतुस्थला अप्सरा, पुलस्त्य ऋषि, वासुकि सर्प, रथभृत् यक्ष, हेति राक्षस और तुम्बुरु गन्धर्व—ये सात मासाधिकारी रहते हैं॥ ३-४॥ |
| एते वसन्ति वै चैत्रे मधुमासे सदैव हि।<br>मैत्रेय स्यन्दने भानोः सप्त मासाधिकारिणः॥ ४ | |
| अर्यमा पुलहश्चैव रथौजाः पुञ्जिकस्थला।<br>प्रहेतिः कच्छवीरश्च नारदश्च रथे रवेः॥ ५ | तथा अर्यमा नामक आदित्य, पुलह ऋषि, रथौजा यक्ष, पुंजिकस्थला अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छवीर सर्प और नारद नामक गन्धर्व—ये वैशाख-मासमें सूर्यके रथपर निवास करते हैं। हे मैत्रेय! अब ज्येष्ठ-मासमें [निवास करनेवालोंके नाम] सुनो॥ ५-६॥ |
| माधवे निवसन्त्येते शुचिसंज्ञे निबोध मे॥ ६ |