विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ७ ] * द्वितीय अंश * १३३
| षड्गुणेन तपोलोकात्सत्यलोको विराजते।<br>अपुनर्मारका यत्र ब्रह्मलोको हि स स्मृतः॥ १५<br>पादगम्यन्तु यत्किञ्चिद्वस्तुवस्ति पृथिवीमयम्।<br>स भूर्लोकः समाख्यातो विस्तरोऽस्य मयोदितः॥ १६<br>भूमिसूर्यान्तरं यच्च सिद्धादिमुनिसेवितम्।<br>भुवर्लोकस्तु सोऽप्युक्तो द्वितीयो मुनिसत्तम॥ १७<br>ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश।<br>स्वर्लोकः सोऽपि गदितो लोकसंस्थानचिन्तकैः॥ १८<br>त्रैलोक्यमेतत्कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते।<br>जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥ १९<br>कृतकाकृतयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः।<br>शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥ २०<br>एते सप्त मया लोका मैत्रेय कथितास्तव।<br>पातालानि च सप्तैव ब्रह्माण्डस्यैष विस्तरः॥ २१<br>एतदण्डकटाहेन तिर्यक् चोर्ध्वमधस्तथा।<br>कपित्थस्य यथा बीजं सर्वतो वै समावृतम्॥ २२<br>दशोत्तरेण पयसा मैत्रेयाण्डं च तद्वृतम्।<br>सर्वोऽम्बुपरिधानोऽसौ वह्निना वेष्टितो बहिः॥ २३<br>वह्निश्च वायुना वायुर्मैत्रेय नभसा वृतः।<br>भूतादिना नभः सोऽपि महता परिवेष्टितः।<br>दशोत्तराण्यशेषाणि मैत्रेयैतानि सप्त वै॥ २४<br>महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम्।<br>अनन्तस्य न तस्यान्तः संख्यानं चापि विद्यते॥ २५<br>तदनन्तमसंख्यातप्रमाणं चापि वै यतः।<br>हेतुभूतमशेषस्य प्रकृतिः सा परा मुने॥ २६<br>अण्डानां तु सहस्राणां सहस्राण्ययुतानि च।<br>ईदृशानां तथा तत्र कोटिकोटिशतानि च॥ २७<br>दारुण्यग्निर्यथा तैलं तिले तद्वत्पुमानपि।<br>प्रधानेऽवस्थितो व्यापी चेतनात्मात्मवेदनः॥ २८<br>प्रधानं च पुमांश्र्चैव सर्वभूतात्मभूतया।<br>विष्णुशक्त्या महाबुद्धे वृतौ संश्रयधर्मिणौ॥ २९ | तपलोकसे छःगुना अर्थात् बारह करोड़ योजनके अन्तरपर सत्यलोक सुशोभित है जो ब्रह्मलोक भी कहलाता है और जिसमें फिर न मरनेवाले अमरगण निवास करते हैं॥ १५॥ जो भी पार्थिव वस्तु चरणसंचारके योग्य है वह भूर्लोक ही है। उसका विस्तार मैं कह चुका॥ १६॥ हे मुनिश्रेष्ठ! पृथिवी और सूर्यके मध्यमें जो सिद्धगण और मुनिगण-सेवित स्थान है, वही दूसरा भुवर्लोक है॥ १७॥ सूर्य और ध्रुवके बीचमें जो चौदह लक्ष योजनका अन्तर है, उसीको लोकस्थितिका विचार करनेवालोंने स्वर्लोक कहा है॥ १८॥ हे मैत्रेय! ये (भूः, भुवः, स्वः) 'कृतक' त्रैलोक्य कहलाते हैं और जन, तप तथा सत्य—ये तीनों 'अकृतक' लोक हैं॥ १९॥ इन कृतक और अकृतक त्रिलोकियोंके मध्यमें महर्लोक कहा जाता है, जो कल्पान्तमें केवल जनशून्य हो जाता है, अत्यन्त नष्ट नहीं होता [इसलिये यह 'कृतकाकृत' कहलाता है]॥ २०॥<br>हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे ये सात लोक और सात ही पाताल कहे। इस ब्रह्माण्डका बस इतना ही विस्तार है॥ २१॥ यह ब्रह्माण्ड कपित्थ (कैथे)-के बीजके समान ऊपर-नीचे सब ओर अण्डकटाहसे घिरा हुआ है॥ २२॥ हे मैत्रेय! यह अण्ड अपनेसे दसगुने जलसे आवृत है और वह जलका सम्पूर्ण आवरण अग्निसे घिरा हुआ है॥ २३॥ अग्नि वायुसे और वायु आकाशसे परिवेष्टित है तथा आकाश भूतोंके कारण तामस अहंकार और अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है। हे मैत्रेय! ये सातों उत्तरोत्तर एक-दूसरेसे दसगुने हैं॥ २४॥ महत्तत्त्वको भी प्रधानने आवृत कर रखा है। वह अनन्त है; तथा उसका न कभी अन्त (नाश) होता है और न कोई संख्या ही है; क्योंकि हे मुने! वह अनन्त, असंख्येय, अपरिमेय और सम्पूर्ण जगत्का कारण है और वही परा प्रकृति है॥ २५-२६॥ उसमें ऐसे-ऐसे हजारों, लाखों तथा सैकड़ों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं॥ २७॥ जिस प्रकार काष्ठमें अग्नि और तिलमें तैल रहता है उसी प्रकार स्वप्रकाश चेतनात्मा व्यापक पुरुष प्रधानमें स्थित है॥ २८॥ हे महाबुद्धे! ये संश्रयशील (आपसमें मिले हुए) प्रधान और पुरुष भी समस्त भूतोंकी स्वरूपभूता विष्णु-शक्तिसे आवृत हैं॥ २९॥ |