भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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१३२ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० ७

सातवाँ अध्याय

भूर्भुवः आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त

श्रीमैत्रेय उवाचश्रीमैत्रेयजी बोले—
कथितं भूतलं ब्रह्मन्मैतदखिलं त्वया।<br>भुवर्लोकादिकांल्लोकाञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं मुने॥ १<br>तथैव ग्रहसंस्थानं प्रमाणानि यथा तथा।<br>समाचक्ष्व महाभाग तन्मह्यं परिपृच्छते॥ २ब्रह्मन्! आपने मुझसे समस्त भूमण्डलका वर्णन किया। हे मुने! अब मैं भुवर्लोक आदि समस्त लोकोंके विषयमें सुनना चाहता हूँ॥ १॥ हे महाभाग! मुझ जिज्ञासुसे आप ग्रहगणकी स्थिति तथा उनके परिमाण आदिका यथावत् वर्णन कीजिये॥ २॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते ।<br>ससमुद्रसरिच्छैला तावती पृथिवी स्मृता॥ ३<br>यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तारपरिमण्डलात्।<br>नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यासमण्डलतो द्विज॥ ४<br>भूमेर्योजनलक्षे तु सौरं मैत्रेय मण्डलम्।<br>लक्षाद्दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्थितम्॥ ५<br>पूर्णे शतसहस्रे तु योजनानां निशाकरात्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नमुपरिष्टात्प्रकाशते॥ ६<br>द्वे लक्षे चोत्तरे ब्रह्मन् बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशनाः स्थितः॥ ७<br>अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वये तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ ८<br>शौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे समवस्थितः।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमेकं द्विजोत्तम॥ ९<br>ऋषिभ्यस्तु सहस्राणां शतादूर्ध्वं व्यवस्थितः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिश्चक्रस्य वै ध्रुवः॥ १०<br>त्रैलोक्यमेतत्कथितमुत्सेधेन महामुने।<br>इज्याफलस्य भूरेषा इज्या चात्र प्रतिष्ठिता॥ ११<br>ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोको यत्र ते कल्पवासिनः।<br>एकयोजनकोटिस्तु यत्र ते कल्पवासिनः॥ १२<br>द्वे कोटी तु जनो लोको यत्र ते ब्रह्मणः सुताः।<br>सनन्दनाद्याः प्रथिता मैत्रेयामलचेतसः॥ १३<br>चतुर्गुणोत्तरे चोर्ध्वं जनलोकात्तपः स्थितम्।<br>वैराजा यत्र ते देवाः स्थिता दाहविवर्जिताः॥ १४जितनी दूरतक सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंका प्रकाश जाता है; समुद्र, नदी और पर्वतादिसे युक्त उतना प्रदेश पृथिवी कहलाता है॥ ३॥ हे द्विज! जितना पृथिवीका विस्तार और परिमण्डल (घेरा) है उतना ही विस्तार और परिमण्डल भुवर्लोकका भी है॥ ४॥ हे मैत्रेय! पृथिवीसे एक लाख योजन दूर सूर्यमण्डल है और सूर्यमण्डलसे भी एक लक्ष योजनके अन्तरपर चन्द्रमण्डल है॥ ५॥ चन्द्रमासे पूरे सौ हजार (एक लाख) योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित हो रहा है॥ ६॥<br><br>हे ब्रह्मन्! नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊपर बुध और बुधसे भी दो लक्ष योजन ऊपर शुक्र स्थित हैं॥ ७॥ शुक्रसे इतनी ही दूरीपर मंगल हैं और मंगलसे भी दो लाख योजन ऊपर बृहस्पतिजी हैं ॥ ८॥ हे द्विजोत्तम! बृहस्पतिजीसे दो लाख योजन ऊपर शनि हैं और शनिसे एक लक्ष योजनके अन्तरपर सप्तर्षिमण्डल है॥ ९॥ तथा सप्तर्षियोंसे भी सौ हजार योजन ऊपर समस्त ज्योतिश्चक्रकी नाभिरूप ध्रुवमण्डल स्थित है॥ १०॥ हे महामुने! मैंने तुमसे यह त्रिलोकीकी उच्चताके विषयमें वर्णन किया। यह त्रिलोकी यज्ञफलकी भोग-भूमि है और यज्ञानुष्ठानकी स्थिति इस भारतवर्षमें ही है॥ ११॥<br><br>ध्रुवसे एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक है, जहाँ कल्पान्त-पर्यन्त रहनेवाले भृगु आदि सिद्धगण रहते हैं॥ १२॥ हे मैत्रेय! उससे भी दो करोड़ योजन ऊपर जनलोक है जिसमें ब्रह्माजीके प्रख्यात पुत्र निर्मलचित्त सनकादि रहते हैं॥ १३॥ जनलोकसे चौगुना अर्थात् आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक है; वहाँ वैराज नामक देवगणोंका निवास है जिनका कभी दाह नहीं होता॥ १४॥

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