विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १
| निर्मलाः सर्वकालन्तु समस्तार्थेषु वै मुने।<br>चक्रुःक्रियां यथान्यायम्फलाकाङ्क्षिणो हि ते ॥ १० | हे मुने! वे निर्मलचित्त और कर्म-फलकी इच्छासे रहित थे तथा समस्त विषयोंमें सदा न्यायाानुकूल ही प्रवृत्त होते थे ॥ १० ॥ |
| प्रियव्रतो ददौ तेषां सप्तानां मुनिसत्तम।<br>सप्तद्वीपानि मैत्रेय विभज्य सुमहात्मनाम् ॥ ११ | हे मुनिश्रेष्ठ! राजा प्रियव्रतने अपने शेष सात महात्मा पुत्रोंको सात द्वीप बाँट दिये ॥ ११॥ |
| जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता।<br>मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ॥ १२ | हे महाभाग! पिता प्रियव्रतने आग्नीध्रको जम्बूद्वीप और मेधातिथिको प्लक्ष नामक दूसरा द्वीप दिया ॥ १२ ॥ |
| शाल्मले च वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान्।<br>ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान्प्रभुः ॥ १३ | उन्होंने शाल्मलद्वीपमें वपुष्मान्को अभिषिक्त किया; ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया ॥ १३ ॥ |
| द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि भव्यं चक्रे प्रियव्रतः।<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं चापि स प्रभुः ॥ १४ | द्युतिमान्को क्रौंचद्वीपके शासनपर नियुक्त किया, भव्यको प्रियव्रतने शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति किया ॥ १४ ॥ |
| जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम ॥ १५<br>तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव।<br>नाभिः किम्पुरुषश्चैव हरिवर्ष इलावृतः ॥ १६<br>रम्यो हिरण्वान्व्रष्ठश्च कुरुर्भद्राश्व एव च।<br>केतुमालस्तथैवान्यः साधुचेष्टोऽभवन्नृपः ॥ १७ | हे मुनिसत्तम! उनमें जो जम्बूद्वीपके अधीश्वर राजा आग्नीध्र थे उनके प्रजापतिके समान नौ पुत्र हुए। वे नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व और सत्कर्मशील राजा केतुमाल थे ॥ १५-१७ ॥ हे विप्र! अब उनके जम्बूद्वीपके विभाग सुनो। |
| जम्बूद्वीपविभागांश्च तेषां विप्र निशामय।<br>पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम् ॥ १८ | पिता आग्नीध्रने दक्षिणकी ओरका हिमवर्ष [जिसे अब भारतवर्ष कहते हैं] नाभिको दिया ॥ १८ ॥ |
| हेमकूटं तथा वर्षं ददौ किम्पुरुषाय सः।<br>तृतीयं नैषधं वर्षं हरिवर्षाय दत्तवान् ॥ १९ | इसी प्रकार किम्पुरुषको हेमकूटवर्ष तथा हरिवर्षको तीसरा नैषधवर्ष दिया ॥ १९ ॥ |
| इलावृताय प्रददौ मेरूर्यत्र तु मध्यमः।<br>नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता ॥ २० | जिसके मध्यमें मेरुपर्वत है वह इलावृतवर्ष उन्होंने इलावृतको दिया तथा नीलाचलसे लगा हुआ वर्ष रम्यको दिया ॥ २० ॥ |
| श्वेतं तदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते ॥ २१<br>यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत्कुरवे ददौ।<br>मेरोः पूर्वेण यद्वर्षं भद्राश्वाय प्रदत्तवान् ॥ २२<br>गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्।<br>इत्येतानि ददौ तेभ्यः पुत्रेभ्यः स नरेश्वरः ॥ २३ | पिता आग्नीध्रने उसका उत्तरवर्ती श्वेतवर्ष हिरण्वान्को दिया तथा जो वर्ष श्रृंगवान्पर्वतके उत्तरमें स्थित है वह कुरुको और जो मेरुके पूर्वमें स्थित है वह भद्राश्वको दिया तथा केतुमालको गन्धमादनवर्ष दिया। इस प्रकार राजा आग्नीध्रने अपने पुत्रोंको ये वर्ष दिये ॥ २१-२३ ॥ |
| वर्षेष्वेतेषु तान्पुत्रानभिषिच्य स भूमिपः।<br>शालग्रामं महापुण्यं मैत्रेय तपसे ययौ ॥ २४ | हे मैत्रेय! अपने पुत्रोंको इन वर्षोमें अभिषिक्त कर वे तपस्याके लिये शालग्राम नामक महापवित्र क्षेत्रको चले गये ॥ २४ ॥ |
| यानि किम्पुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने।<br>तेषांस्वाभाविकीसिद्धिः सुखप्रायाह्ययत्नतः ॥ २५ | हे महामुने! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं उनमें सुखकी बहुलता है और बिना यत्नके स्वभावसे ही समस्त भोग-सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ २५ ॥ |