विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आधारभूतं विश्वस्याप्यणीयांसमणीयसाम् ।<br>प्रणम्य सर्वभूतस्थमच्युतं पुरुषोत्तमम् ॥ ५<br><br>ज्ञानस्वरूपमत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः ।<br>तमेवार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥ ६<br><br>विष्णुं ग्रसिष्णुं विश्वस्य स्थितौ सर्गे तथा प्रभुम् ।<br>प्रणम्य जगतामीशमजमक्षयमव्ययम् ॥ ७<br><br>कथयामि यथापूर्वं दक्षाद्यैर्मुनिसत्तमैः ।<br>पृष्टः प्रोवाच भगवानब्जयोनिः पितामहः ॥ ८ | जो विश्वके अधिष्ठान हैं, अतिसूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सर्व प्राणियोंमें स्थित पुरुषोत्तम और अविनाशी हैं, जो परमार्थतः (वास्तवमें) अति निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्था रूपसे प्रतीत होते हैं, तथा जो [कालस्वरूपसे] जगत्की उत्पत्ति और स्थितिमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, उन जगदीश्वर, अजन्मा, अक्षय और अव्यय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तुम्हें वह सारा प्रसंग क्रमशः सुनाता हूँ जो दक्ष आदि मुनिश्रेष्ठोंके पूछनेपर पितामह भगवान् ब्रह्माजीने उनसे कहा था॥ ५–८॥ |
| तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदातटे ।<br>सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च ॥ ९ | वह प्रसंग दक्ष आदि मुनियोंने नर्मदा-तटपर राजा पुरुकुत्सको सुनाया था तथा पुरुकुत्सने सारस्वतसे और सारस्वतने मुझसे कहा था॥ ९॥ |
| परः पराणां परमः परमात्मात्मसंस्थितः ।<br>रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जितः ॥ १०<br><br>अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्द्धिजन्मभिः ।<br>वर्जितः शक्यते वक्तुं यः सदास्तीति केवलम् ॥ ११<br><br>सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः ।<br>ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥ १२<br><br>तद्ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम् ।<br>एकस्वरूपं तु सदा हेयाभावाच्च निर्मलम् ॥ १३ | 'जो पर (प्रकृति)-से भी पर, परमश्रेष्ठ, अन्तरात्मामें स्थित परमात्मा, रूप, वर्ण, नाम और विशेषण आदिसे रहित है; जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश—इन छः विकारोंका सर्वथा अभाव है; जिसको सर्वदा केवल 'है' इतना ही कह सकते हैं, तथा जिनके लिये यह प्रसिद्ध है कि 'वे सर्वत्र हैं और उनमें समस्त विश्व बसा हुआ है—इसलिये ही विद्वान् जिसको वासुदेव कहते हैं' वही नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, एकरस और हेय गुणोंके अभावके कारण निर्मल परब्रह्म है॥ १०–१३॥ |
| तदेव सर्वमेवैतद्व्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् ।<br>तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम् ॥ १४ | वही इन सब व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) जगत्के रूपसे, तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण कालके रूपसे स्थित है॥ १४॥ |
| परस्य ब्रह्मणो रूपं पुरुषः प्रथमं द्विज ।<br>व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस्तथा परम् ॥ १५ | हे द्विज! परब्रह्मका प्रथम रूप पुरुष है, अव्यक्त (प्रकृति) और व्यक्त (महदादि) उसके अन्य रूप हैं तथा [सबको क्षोभित करनेवाला होनेसे] काल उसका परमरूप है॥ १५॥ |
| प्रधानपुरुषव्यक्तकालानां परमं हि यत् ।<br>पश्यन्ति सूरयः शुद्धं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १६ | इस प्रकार जो प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल—इन चारोंसे परे है तथा जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १६॥ |
| प्रधानपुरुषव्यक्तकालास्तु प्रविभागशः ।<br>रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्भावहेतवः ॥ १७ | प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल—ये [भगवान् विष्णुके] रूप पृथक्-पृथक् संसारकी उत्पत्ति, पालन और संहारके प्रकाश तथा उत्पादनमें कारण हैं॥ १७॥ |
| व्यक्तं विष्णुस्तथाव्यक्तं पुरुषः काल एव च ।<br>क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय ॥ १८ | भगवान् विष्णु जो व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष और कालरूपसे स्थित होते हैं, इसे उनकी बालवत् क्रीडा ही समझो॥ १८॥ |
| अव्यक्तं कारणं यत्तत्प्रधानमृषिसत्तमैः ।<br>प्रोच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा नित्यं सदसदात्मकम् ॥ १९ | उनमेंसे अव्यक्त कारणको, जो सदसद्रूप (कारण-शक्तिविशिष्ट) और नित्य (सदा एकरस) है, श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं॥ १९॥ |