विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० २ ] * प्रथम अंश * ९
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| वैरे महति यद्वाक्याद्गुरोरद्याश्रिता क्षमा।<br>त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्च्छास्त्राणि वेत्स्यति ॥ २४ | तुमने, चित्तमें बड़ा वैरभाव रहनेपर भी अपने बड़े-बूढ़े वसिष्ठजीके कहनेसे क्षमा स्वीकार की है, इसलिये तुम सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता होगे ॥ २४ ॥ |
| सन्ततेर्न ममोच्छेदः क्रुद्धेनापि यतः कृतः।<br>त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम् ॥ २५ | हे महाभाग ! अत्यन्त क्रोधित होनेपर भी तुमने मेरी सन्तानका सर्वथा मूलोच्छेद नहीं किया; अतः मैं तुम्हें एक और उत्तम वर देता हूँ ॥ २५ ॥ |
| पुराणसंहिताकर्ता भवान्वत्स भविष्यति।<br>देवतापारमार्थ्यं च यथावद्वेत्स्यते भवान् ॥ २६ | हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके वक्ता होगे और देवताओंके यथार्थ स्वरूपको जानोगे ॥ २६ ॥ |
| प्रवृत्ते च निवृत्ते च कर्मण्यस्तमला मतिः।<br>मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति ॥ २७ | तथा मेरे प्रसादसे तुम्हारी निर्मल बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति (भोग और मोक्ष)-के उत्पन्न करनेवाले कर्मोंमें निःसन्देह हो जायगी ॥ २७ ॥ |
| ततश्च प्राह भगवान्वसिष्ठो मे पितामहः।<br>पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति ॥ २८ | [पुलस्त्यजीके इस तरह कहनेके अनन्तर] फिर मेरे पितामह भगवान् वसिष्ठजी बोले “पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य होगा” ॥ २८ ॥ |
| इति पूर्वं वसिष्ठेन पुलस्त्येन च धीमता।<br>यदुक्तं तत्स्मृतिं याति त्वत्प्रश्नादखिलं मम ॥ २९ | हे मैत्रेय ! इस प्रकार पूर्वकालमें बुद्धिमान् वसिष्ठजी और पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हारे प्रश्नसे मुझे स्मरण हो आया है ॥ २९ ॥ |
| सोऽहं वदाम्यशेषं ते मैत्रेय परिपृच्छते।<br>पुराणसंहितां सम्यक् तां निबोध यथातथम् ॥ ३० | अतः हे मैत्रेय ! तुम्हारे पूछनेसे मैं उस सम्पूर्ण पुराणसंहिताको तुम्हें सुनाता हूँ; तुम उसे भली प्रकार ध्यान देकर सुनो ॥ ३० ॥ |
| विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्।<br>स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः ॥ ३१ | यह जगत् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है, वे ही इसकी स्थिति और लयके कर्ता हैं तथा यह जगत् भी वे ही हैं ॥ ३१ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽशे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्के उत्पत्ति-क्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने।<br>सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ १<br><br>नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च।<br>वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे ॥ २ | जो ब्रह्मा, विष्णु और शंकररूपसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कारण हैं तथा अपने भक्तोंको संसार-सागरसे तारनेवाले हैं, उन विकाररहित, शुद्ध, अविनाशी, परमात्मा, सर्वदा एकरस, सर्वविजयी भगवान् वासुदेव विष्णुको नमस्कार है ॥ १-२ ॥ |
| एकानेकस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः।<br>अव्यक्तव्यक्तरूपाय विष्णवे मुक्तिहेतवे ॥ ३ | जो एक होकर भी नाना रूपवाले हैं, स्थूल-सूक्ष्ममय हैं, अव्यक्त (कारण) एवं व्यक्त (कार्य) रूप हैं तथा [अपने अनन्य भक्तोंकी] मुक्तिके कारण हैं, [उन श्रीविष्णुभगवान्को नमस्कार है] ॥ ३ ॥ |
| सर्गस्थितिविनाशानां जगतो यो जगन्मयः।<br>मूलभूतो नमस्तस्मै विष्णवे परमात्मने ॥ ४ | जो विश्वरूप प्रभु विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके मूल-कारण हैं, उन परमात्मा विष्णुभगवान्को नमस्कार है ॥ ४ ॥ |
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