भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १

देवर्षिपार्थिवानां च चरितं यन्महामुने।
वेदशाखाप्रणयनं यथावद्व्यासकर्तृकम्॥ ९
धर्मंश्च ब्राह्मणादीनां तथा चाश्रमवासिनाम्।
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं त्वत्तो वासिष्ठनन्दन॥ १०
ब्रह्मन्प्रसादप्रवणं कुरुष्व मयि मानसम्।
येनाहमेतज्जानीयां त्वत्प्रसादान्महामुने॥ ११
श्रीपराशर उवाच
साधु मैत्रेय धर्मज्ञ स्मारितोऽस्मि पुरातनम्।
पितुः पिता मे भगवान् वसिष्ठो यदुवाच ह॥ १२
विश्वामित्रप्रयुक्तेन रक्षसा भक्षितः पुरा।
श्रुतस्तातस्ततः क्रोधो मैत्रेयाभून्ममातुलः॥ १३
ततोऽहं रक्षसां सत्रं विनाशाय समारभम्।
भस्मीभूताश्च शतशस्तस्मिन्सत्रे निशाचराः॥ १४
ततः सङ्क्षीयमाणेषु तेषु रक्षस्स्वशेषतः।
मामुवाच महाभागो वसिष्ठो मत्पितामहः॥ १५
अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि।
राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं हि तत्॥ १६
मूढानामेव भवति क्रोधो ज्ञानवतां कुतः।
हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान्॥ १७
सञ्चितस्यापि महता वत्स क्लेशेन मानवैः।
यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः परः॥ १८
स्वर्गापवर्गव्यासेधकारणं परमर्षयः।
वर्जयन्ति सदा क्रोधं तात मा तद्वशो भव॥ १९
अलं निशाचरैर्दग्धैर्दीनैरनपकारिभिः।
सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः॥ २०
एवं तातेन तेनाहमनुनीतो महात्मना।
उपसंहृतवान्सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात्॥ २१
ततः प्रीतः स भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः।
सम्प्राप्तश्च तदा तत्र पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः॥ २२
पितामहेन दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः।
मामुवाच महाभागो मैत्रेय पुलहाग्रजः॥ २३


[हिन्दी अनुवाद]

पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण धर्म, देवर्षि और राजर्षियोंके चरित्र, श्रीव्यासजीकृत वैदिक शाखाओंकी यथावत् रचना तथा ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंके धर्म—ये सब, हे महामुनि शक्तिनन्दन! मैं आपसे सुनना चाहता हूँ॥६—१०॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरे प्रति अपना चित्त प्रसादोन्मुख कीजिये जिससे हे महामुने! मैं आपकी कृपासे यह सब जान सकूँ'॥११॥

श्रीपराशरजी बोले—"हे धर्मज्ञ मैत्रेय! मेरे पिताजीके पिता श्रीवसिष्ठजीने जिसका वर्णन किया था, उस पूर्व प्रसंगका तुमने मुझे अच्छा स्मरण कराया—[इसके लिये तुम धन्यवादके पात्र हो]॥१२॥ हे मैत्रेय! जब मैंने सुना कि पिताजीको विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसने खा लिया है, तो मुझको बड़ा भारी क्रोध हुआ॥१३॥ तब राक्षसोंका ध्वंस करनेके लिये मैंने यज्ञ करना आरम्भ किया। उस यज्ञमें सैकड़ों राक्षस जलकर भस्म हो गये॥१४॥ इस प्रकार उन राक्षसोंको सर्वथा नष्ट होते देख मेरे महाभाग पितामह वसिष्ठजी मुझसे बोले—॥१५॥ "हे वत्स! अत्यन्त क्रोध करना ठीक नहीं, अब इसे शान्त करो। राक्षसोंका कुछ भी अपराध नहीं है, तुम्हारे पिताके लिये तो ऐसा ही होना था॥१६॥ क्रोध तो मूर्खोंको ही हुआ करता है, विचारवानोंको भला कैसे हो सकता है? भैया! भला कौन किसीको मारता है? पुरुष स्वयं ही अपने कियेका फल भोगता है॥१७॥ हे प्रियवर! यह क्रोध तो मनुष्यके अत्यन्त कष्टसे संचित यश और तपका भी प्रबल नाशक है॥१८॥ हे तात! इस लोक और परलोक दोनोंको बिगाड़नेवाले इस क्रोधका महर्षिगण सर्वदा त्याग करते हैं, इसलिये तू इसके वशीभूत मत हो॥१९॥ अब इन बेचारे निरपराध राक्षसोंको दग्ध करनेसे कोई लाभ नहीं; अपने इस यज्ञको समाप्त करो। साधुओंका धन तो सदा क्षमा ही है'॥२०॥

महात्मा दादाजीके इस प्रकार समझानेपर उनकी बातोंके गौरवका विचार करके मैंने वह यज्ञ समाप्त कर दिया॥२१॥ इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी बहुत प्रसन्न हुए। उसी समय ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यजी वहाँ आये॥२२॥ हे मैत्रेय! पितामह [वसिष्ठजी]-ने उन्हें अर्घ्य दिया, तब वे महर्षि पुलहके ज्येष्ठ भ्राता महाभाग पुलस्त्यजी आसन ग्रहण करके मुझसे बोले॥२३॥