भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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१४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३
सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना।<br>सत्त्वभृद्भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥ ६२<br><br>तमोद्रेकी च कल्पान्ते रुद्ररूपी जनार्दनः।<br>मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्यतिदारुणः ॥ ६३<br><br>भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते।<br>नागपर्यङ्कशयने शेते च परमेश्वरः ॥ ६४<br><br>प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मारूपधृक् ॥ ६५<br><br>सृष्टिस्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्।<br>स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ ६६<br><br>स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पाति च।<br>उपसंह्रियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥ ६७<br><br>पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।<br>सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज्जगत् ॥ ६८<br><br>स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्ययः।<br>सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ॥ ६९<br><br>स एव सृज्यः स च सर्गकर्ता<br>   स एव पात्यत्ति च पाल्यते च।<br>ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूर्ति-<br>   र्विष्णुर्वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ॥ ७०तथा रचना हो जानेपर सत्त्वगुण-विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यन्त युग-युगमें पालन करते हैं॥ ६२॥ हे मैत्रेय! फिर कल्पका अन्त होनेपर अति दारुण तमःप्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतोंका भक्षण कर लेते हैं॥ ६३॥ इस प्रकार समस्त भूतोंका भक्षण कर संसारको जलमय करके वे परमेश्वर शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ६४॥ जगनेपर ब्रह्मारूप होकर वे फिर जगत्‌की रचना करते हैं॥ ६५॥ वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन संज्ञाओंको धारण करते हैं॥ ६६॥ वे प्रभु विष्णु स्रष्टा (ब्रह्मा) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं, पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अन्तमें स्वयं ही संहारक (शिव) तथा स्वयं ही उपसंहृत (लीन) होते हैं॥ ६७॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि जितना जगत् है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतोंके अन्तरात्मा हैं, इसलिये ब्रह्मादि प्राणियोंमें स्थित सर्गादिक भी उन्हींके उपकारक हैं। [अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजोंद्वारा किया हुआ हवन यजमानका उपकारक होता है, उसी तरह परमात्माके रचे हुए समस्त प्राणियोंद्वारा होनेवाली सृष्टि भी उन्हींकी उपकारक है ]॥ ६८-६९॥ वे सर्वस्वरूप, श्रेष्ठ, वरदायक और वरेण्य (प्रार्थनाके योग्य) भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाओं‌द्वारा रचनेवाले हैं, वे ही रचे जाते हैं, वे ही पालते हैं, वे ही पालित होते हैं तथा वे ही संहार करते हैं [और स्वयं ही संहृत होते हैं ]॥ ७०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


तीसरा अध्याय

ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप

श्रीमैत्रेय उवाच<br>निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः।<br>कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ १**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे भगवन्! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है उसका सर्गादिका कर्ता होना कैसे सिद्ध हो सकता है?॥ १॥