भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ३ ] * प्रथम अंश * १५


श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय!
शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।<br>यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः।<br>भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥ २समस्त भाव-पदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य-ज्ञानकी विषय होती हैं; [उनमें कोई युक्ति काम नहीं देती] अतः अग्निकी शक्ति उष्णताके समान ब्रह्मकी भी सर्गादि-रचनारूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं॥ २॥
तन्निबोध यथा सर्गे भगवान्सम्प्रवर्त्तते।<br>नारायणाख्यो भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३<br>उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्नित्यमेवोपचारतः॥ ४अब जिस प्रकार नारायण नामक लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं सो सुनो। हे विद्वन्! वे सदा उपचारसे ही ‘उत्पन्न हुए’ कहलाते हैं॥ ३-४॥
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत्पराख्यं तदर्द्धं च परार्द्धमभिधीयते॥ ५उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी कही जाती है। उस (सौ वर्ष)-का नाम पर है, उसका आधा परार्द्ध कहलाता है॥ ५॥
कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ।<br>तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ६<br>अन्येषां चैव जन्तूनां चराणामचराश्च ये।<br>भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ७हे अनघ! मैंने जो तुमसे विष्णुभगवान्का कालस्वरूप कहा था उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी तथा और भी जो पृथिवी, पर्वत, समुद्र आदि चराचर जीव हैं उनकी आयुका परिमाण किया जाता है॥ ६-७॥
काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम।<br>काष्ठा त्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः॥ ८हे मुनिश्रेष्ठ! पन्द्रह निमेषको काष्ठा कहते हैं, तीस काष्ठाकी एक कला तथा तीस कलाका एक मुहूर्त होता है॥ ८॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ९तीस मुहूर्तका मनुष्यका एक दिन-रात कहा जाता है और उतने ही दिन-रातका दो पक्षयुक्त एक मास होता है॥ ९॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ १०छः महीनोंका एक अयन और दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन मिलकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन॥ १०॥
दिव्यैर्वर्षसहस्त्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११देवताओंके बारह हजार वर्षोंके सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग नामक चार युग होते हैं। उनका अलग-अलग परिमाण मैं तुम्हें सुनाता हूँ॥ ११॥
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्।<br>दिव्याब्दानां सहस्त्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२पुरातत्त्वके जाननेवाले सत्युग आदिका परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष बतलाते हैं॥ १२॥
तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते।<br>सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ वर्षकी सन्ध्या बतायी जाती है और युगके पीछे उतने ही परिमाणवाले सन्ध्यांश होते हैं [अर्थात् सत्युग आदिके पूर्व क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ दिव्य वर्षकी सन्ध्याएँ और इतने ही वर्षके सन्ध्यांश होते हैं]॥ १३॥
सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम।<br>युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः॥ १४हे मुनिश्रेष्ठ! इन सन्ध्या और सन्ध्यांशोंके बीचका जितना काल होता है, उसे ही सत्युग आदि नामवाले युग जानना चाहिये॥ १४॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम्।<br>प्रोच्यते तत्सहस्त्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने॥ १५हे मुने! सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलि ये मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं; ऐसे हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ १५॥
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश।<br>भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनो॥ १६॥
सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः।<br>एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनुके पुत्र राजालोग [पूर्वकल्पानुसार] एक ही कालमें रचे जाते हैं और एक ही कालमें उनका संहार किया जाता है॥ १७॥