भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 558 में से

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पृष्ठ 20

अ० ४ ] * प्रथम अंश * १७

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—प्रजापतियोंके स्वामी नारायणस्वरूप भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाकी सृष्टि की थी वह मुझसे सुनो॥ २॥ पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें सोकर उठनेपर सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त भगवान् ब्रह्माजीने सम्पूर्ण लोकोंको शून्यमय देखा॥ ३॥ वे भगवान् नारायण पर हैं, अचिन्त्य हैं, ब्रह्मा, शिव आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके स्थान हैं॥ ४॥ [मनु आदि स्मृतिकार] उन ब्रह्मस्वरूप श्रीनारायणदेवके विषयमें जो इस जगत्की उत्पत्ति और लयके स्थान हैं, यह श्लोक कहते हैं॥ ५॥ नर [अर्थात् पुरुष—भगवान् पुरुषोत्तम]—से उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहते हैं; वह नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (निवास-स्थान) है। इसलिये भगवान्‌को 'नारायण' कहा है॥ ६॥
प्रजाः ससर्ज भगवान्ब्रह्मा नारायणात्मकः।<br>प्रजापतिपतिर्देवो यथा तन्मे निशामय॥ २
अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः।<br>सत्त्वोद्रिक्तस्तथा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत॥ ३
नारायणः परोऽचिन्त्यः परेषामपि स प्रभुः।<br>ब्रह्मस्वरूपी भगवाननादिः सर्वसम्भवः॥ ४
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति।<br>ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवोप्ययम्॥ ५
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ ६
तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते।<br>अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः॥ ७सम्पूर्ण जगत् जलमय हो रहा था। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीने अनुमानसे पृथिवीको जलके भीतर जान उसे बाहर निकालनेकी इच्छासे एक दूसरा शरीर धारण किया। उन्होंने पूर्व-कल्पोंके आदिमें जैसे मत्स्य, कूर्म आदि रूप धारण किये थे वैसे ही इस वाराह कल्पके आरम्भमें वेदयज्ञमय वाराह शरीर ग्रहण किया और सम्पूर्ण जगत्की स्थितिमें तत्पर हो सबके अन्तरात्मा और अविचल रूप वे परमात्मा प्रजापति ब्रह्माजी, जो पृथिवीको धारण करनेवाले और अपने ही आश्रयसे स्थित हैं, जन-लोकस्थित सनकादि सिद्धेश्वरोंसे स्तुति किये जाते हुए जलमें प्रविष्ट हुए॥ ७–१०॥ तब उन्हें पाताललोकमें आये देख देवी वसुन्धरा अति भक्तिविनम्रा हो उनकी स्तुति करने लगी॥ ११॥
अकरोत्स्वतनुमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा।<br>मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः॥ ८
वेदयज्ञमयं रूपमशेषजगतः स्थितौ।<br>स्थितः स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः॥ ९
जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>प्रविवेश तदा तोयमात्माधारो धराधरः॥ १०
निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम्।<br>तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुन्धरा॥ ११
पृथिव्युवाचपृथिवी बोली—हे शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करनेवाले कमलनयन भगवन्! आपको नमस्कार है। आज आप इस पातालतलसे मेरा उद्धार कीजिये। पूर्वकालमें आपहीसे मैं उत्पन्न हुई थी॥ १२॥ हे जनार्दन! पहले भी आपहीने मेरा उद्धार किया था। और हे प्रभो! मेरे तथा आकाशादि अन्य सब भूतोंके भी आप ही उपादान-कारण हैं॥ १३॥ हे परमात्मस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुरुषात्मन्! आपको नमस्कार है। हे प्रधान (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप! आपको नमस्कार है। हे कालस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १४॥ हे प्रभो! जगत्की सृष्टि आदिके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप धारण करनेवाले आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, पालन और नाश करनेवाले हैं॥ १५॥ और जगत्के एकार्णवरूप (जलमय) हो जानेपर, हे गोविन्द! सबको भक्षणकर अन्तमें आप ही मनीषिजनोंद्वारा चिन्तित होते हुए जलमें शयन करते हैं॥ १६॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष शङ्खचक्रगदाधर।<br>मामुद्धरास्मादद्य त्वं त्वत्तोऽहं पूर्वमुत्थिता॥ १२
त्वयाहमुद्धृता पूर्वं तन्मयाहं जनार्दन।<br>तथान्यानि च भूतानि गगनादीन्यशेषतः॥ १३
नमस्ते परमात्मन्पुरुषात्मन्नमोऽस्तु ते।<br>प्रधानव्यक्तभूताय कालभूताय ते नमः॥ १४
त्वं कर्ता सर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत्।<br>सर्गादिषु प्रभो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मरूपधृक्॥ १५
सम्भक्षयित्वा सकलं जगत्येकार्णवीकृते।<br>शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः॥ १६
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