भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 21

१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

भवतो यत्परं तत्त्वं तन्न जानाति कश्चन। अवतारtargetेषु यद्रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः ॥ १७ त्वामाराध्य परं ब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः। वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्स्यति ॥ १८ यत्किञ्चिन्मनसा ग्राह्यं यद्ग्राह्यं चक्षुरादिभिः। बुद्ध्या च यत्परिच्छेद्यं तद्रूपमखिलं तव ॥ १९ तन्मयाहं त्वदाधारा त्वत्सृष्टा त्वत्समाश्रया। माधवीमिति लोकोऽयमभिधत्ते ततो हि माम् ॥ २० जयाखिलज्ञानमय जय स्थूलमयाव्यय। जयाऽनन्त जयाव्यक्त जय व्यक्तमय प्रभो ॥ २१ परापरात्मन्विश्वात्मञ्जय यज्ञपतेऽनघ। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारस्त्वमग्नयः ॥ २२ त्वं वेदास्त्वं तदङ्गानि त्वं यज्ञपुरुषो हरे। सूर्यादयो ग्रहास्तारा नक्षत्राण्यखिलं जगत् ॥ २३ मूर्त्तामूर्त्तमदृश्यं च दृश्यं च पुरुषोत्तम। यच्चोक्तं यच्च नैवोक्तं मयात्र परमेश्वर। तत्सर्वं त्वं नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥ २४

श्रीपराशर उवाच

एवं संस्तूयमानस्तु पृथिव्या धरणीधरः। सामस्वरध्वनिः श्रीमाञ्जगर्ज परिघर्घरम् ॥ २५ ततः समुत्क्षिप्य धरां स्वदंष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः। रसातलादुत्पलपत्रसन्निभः समुत्थितो नील इवाचलो महान् ॥ २६ उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतं तत्सम्भवाम्भो जनलोकसंश्रयान्। प्रक्षालयामास हि तान्महाद्युतीन् सनन्दनादीनपकल्मषान् मुनीन् ॥ २७ प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षत- रसातलेऽधः कृतशब्दसन्तति। श्वासानिलास्ताः परितः प्रयान्ति सिद्धा जने ये नियता वसन्ति ॥ २८

हे प्रभो! आपका जो परतत्त्व है उसे तो कोई भी नहीं जानता; अतः आपका जो रूप अवतारोंमें प्रकट होता है उसीकी देवगण पूजा करते हैं ॥ १७ ॥ आप परब्रह्मकी ही आराधना करके मुमुक्षुजन मुक्त होते हैं। भला वासुदेवकी आराधना किये बिना कौन मोक्ष प्राप्त कर सकता है? ॥ १८ ॥ मनसे जो कुछ ग्रहण (संकल्प) किया जाता है, चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण (विषय) करनेयोग्य है, बुद्धिद्वारा जो कुछ विचारणीय है वह सब आपहीका रूप है ॥ १९ ॥ हे प्रभो! मैं आपहीका रूप हूँ, आपहीके आश्रित हूँ और आपहीके द्वारा रची गयी हूँ तथा आपहीकी शरणमें हूँ। इसीलिये लोकमें मुझे 'माधवी' भी कहते हैं ॥ २० ॥ हे सम्पूर्ण ज्ञानमय! हे स्थूलमय! हे अव्यय! आपकी जय हो। हे अनन्त! हे अव्यक्त! हे व्यक्तमय प्रभो! आपकी जय हो ॥ २१ ॥ हे परापर-स्वरूप! हे विश्वात्मन्! हे यज्ञपते! हे अनघ! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही ओंकार हैं और आप ही (आहवनीयादि) अग्नयाँ हैं ॥ २२ ॥ हे हरे! आप ही वेद, वेदांग और यज्ञपुरुष हैं तथा सूर्य आदि ग्रह, तारे, नक्षत्र और सम्पूर्ण जगत् भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ हे पुरुषोत्तम! हे परमेश्वर! मूर्त्त-अमूर्त्त, दृश्य-अदृश्य तथा जो कुछ मैंने कहा है और जो नहीं कहा, वह सब आप ही हैं। अतः आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है ॥ २४ ॥

श्रीपराशरजी बोले-पृथिवीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सामस्वर ही जिनकी ध्वनि है उन भगवान् धरणीधरने घर्घर शब्दसे गर्जना की ॥ २५ ॥ फिर विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले उन महावराहने अपनी डाढ़ोंसे पृथिवीको उठा लिया और वे कमल-दलके समान श्याम तथा नीलाचलके सदृश विशालकाय भगवान् रसातलसे बाहर निकले ॥ २६ ॥ निकलते समय उनके मुखके श्वाससे उछलते हुए जलने जनलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी और निष्पाप सनन्दनादि मुनीश्वरोंको भिगो दिया ॥ २७ ॥ जल बड़ा शब्द करता हुआ उनके खुरोंसे विदीर्ण हुए रसातलमें नीचेकी ओर जाने लगा और जनलोकमें रहनेवाले सिद्धगण उनके श्वास-वायुसे विक्षिप्त होकर इधर-उधर भागने लगे ॥ २८ ॥