विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ५ ] * प्रथम अंश * २१
पाँचवाँ अध्याय
अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे द्विजराज! सर्गके आदिमें भगवान् ब्रह्माजीने पृथिवी, आकाश और जल आदिमें रहनेवाले देव, ऋषि, पितृगण, दानव, मनुष्य, तिर्यक् और वृक्षादिको जिस प्रकार रचा तथा जैसे गुण, स्वभाव और रूपवाले जगत्की रचना की वह सब आप मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥ |
|---|---|
| यथा ससर्ज देवोऽसौ देवर्षिपितृदानवान्।<br>मनुष्यतिर्यग्वृक्षादीन्भूव्योमसलिलौकसः ॥ १ | |
| यदगुणं यत्स्वभावं च यद्रूपं च जगद्विज।<br>सर्गादौ सृष्टवान्ब्रह्मा तन्ममाचक्ष्व कृत्स्नशः ॥ २ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! भगवान् विभुने जिस प्रकार इस सर्गकी रचना की वह मैं तुमसे कहता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥ सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करनेपर पहले अबुद्धिपूर्वक [अर्थात् पहले-पहल असावधानी हो जानेसे] तमोगुणी सृष्टिका आविर्भाव हुआ ॥ ४ ॥ उस महात्मासे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पंचपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई ॥ ५ ॥ उसके ध्यान करनेपर ज्ञानशून्य, बाहर-भीतरसे तमोमय और जड नगादि (वृक्ष-गुल्म-लता-वीरुत्-तृण) रूप पाँच प्रकारका सर्ग हुआ ॥ ६ ॥ [वराहजीद्वारा सर्वप्रथम स्थापित होनेके कारण] नगादिको मुख्य कहा गया है, इसलिये यह सर्ग भी मुख्य सर्ग कहलाता है ॥ ७ ॥ |
| मैत्रेय कथयाम्येतच्छृणुष्व सुसमाहितः।<br>यथा ससर्ज देवोऽसौ देवादीन्निखिलान्विभुः ॥ ३ | |
| सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।<br>अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ ४ | |
| तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ५ | |
| पञ्चधाऽवस्थितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्।<br>बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः ॥ ६ | |
| मुख्या नगा यतः प्रोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयम् ॥ ७ | |
| तं दृष्ट्वाऽसाधकं सर्गममन्यदपरं पुनः ॥ ८ | उस सृष्टिको पुरुषार्थकी असाधिका देखकर उन्होंने फिर अन्य सर्गके लिये ध्यान किया तो तिर्यक्-स्रोत-सृष्टि उत्पन्न हुई। यह सर्ग [वायुके समान] तिरछा चलनेवाला है इसलिये तिर्यक्-स्रोत कहलाता है ॥ ८-९ ॥ ये पशु, पक्षी आदि नामसे प्रसिद्ध हैं—और प्रायः तमोमय (अज्ञानी), विवेकरहित अनुचित मार्गका अवलम्बन करनेवाले और विपरीत ज्ञानको ही यथार्थ ज्ञान माननेवाले होते हैं। ये सब अहंकारी, अभिमानी, अट्ठाईस वधोंसे युक्त* आन्तरिक सुख आदिको ही पूर्णतया समझनेवाले और परस्पर एक-दूसरेकी प्रवृत्तिको न जाननेवाले होते हैं ॥ १०-११ ॥ |
| तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोताभ्यवर्त्तत।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तिस्स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ ९ | |
| पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्राया ह्यवेदिनः।<br>उत्पथग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥ १० | |
| अहङ्कृता अहम्माना अष्टाविंशद्वधात्मकाः।<br>अन्तः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च परस्परम् ॥ ११ |
* सांख्य-कारिकामें अट्ठाईस वधोंका वर्णन इस प्रकार किया है—
एकादशेन्द्रियवधाः सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा। सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥
आध्यात्मिक्यश्चतस्रः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः। बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः। दानञ्च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधा ॥
(४९-५१)
ग्यारह इन्द्रियवध और तुष्टि तथा सिद्धिके विपर्ययसे सत्रह बुद्धि-वध—ये कुल अट्ठाईस वध अशक्ति कहलाते हैं। प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामक चार आध्यात्मिक और पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके बाह्य विषयोंके निवृत्त हो जानेसे पाँच बाह्य—इस प्रकार