विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| २० | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० ४ |
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परमार्थस्त्वमेवैको नान्योऽस्ति जगतः पते।
तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरम्॥ ३८
यदेतद् दृश्यते मूर्त्तमेतज्ज्ञानात्मनस्तव।
भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः॥ ३९
ज्ञानस्वरूपमखिलं जगदेतदबुद्धयः।
अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते मोहसम्प्लवे॥ ४०
ये तु ज्ञानविदः शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत्।
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं परमेश्वर॥ ४१
प्रसीद सर्व सर्वात्मन्वासाय जगतामिमाम्।
उद्धरोर्वीममेयात्मञ्छन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४२
सत्त्वोद्रिक्तोऽसि भगवन् गोविन्द पृथिवीमिमाम्।
समुद्धर भवायेश शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४३
सर्गप्रवृत्तिर्भवतो जगतामुपकारिणी।
भवत्वेषा नमस्तेऽस्तु शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४४
श्रीपराशर उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु परमात्मा महीधरः।
उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवांश्च महाम्भसि॥ ४५
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न मही याति सम्प्लवम्॥ ४६
ततः क्षितिं समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन्।
यथाविभागं भगवाननादिः परमेश्वरः॥ ४७
प्राक्सर्गदग्धानखिलान्पर्वतान्पृथिवीतले।
अमोघेन प्रभावेण ससर्जामोघवाञ्छितः॥ ४८
भूविभागं ततः कृत्वा सप्तद्वीपान्थातथम्।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पूर्ववत्समकल्पयत्॥ ४९
ब्रह्मरूपधरो देवस्ततोऽसौ रजसा वृतः।
चकार सृष्टिं भगवान्श्चतुर्वक्त्रधरो हरिः॥ ५०
निमित्तमात्रमेवाऽसौ सृज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः॥ ५१
निमित्तमात्रं मुक्त्वैवं नान्यत्किञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्॥ ५२
| हे जगत्पते ! परमार्थ (सत्य वस्तु) तो एकमात्र आप ही हैं, आपके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। यह आपकी ही महिमा (माया) है जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है॥ ३८॥ यह जो कुछ भी मूर्त्तिमान् जगत् दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपहीका रूप है। अजितेन्द्रिय लोग भ्रमसे इसे जगत्-रूप देखते हैं॥ ३९॥ इस सम्पूर्ण ज्ञान-स्वरूप जगत्को बुद्धिहीन लोग अर्थरूप देखते हैं, अतः वे निरन्तर मोहमय संसार-सागरमें भटका करते हैं॥ ४०॥ हे परमेश्वर! जो लोग शुद्धचित्त और विज्ञानवेत्ता हैं वे इस सम्पूर्ण संसारको आपका ज्ञानात्मक स्वरूप ही देखते हैं॥ ४१॥ हे सर्व! हे सर्वात्मन्! प्रसन्न होइये। हे अप्रमेयात्मन्! हे कमलनयन! संसारके निवासके लिये पृथिवीका उद्धार करके हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४२॥ हे भगवन्! हे गोविन्द! इस समय आप सत्त्वप्रधान हैं; अतः हे ईश! जगत्के उद्भवके लिये आप इस पृथिवीका उद्धार कीजिये और हे कमलनयन! हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४३॥ आपके द्वारा यह सर्गकी प्रवृत्ति संसारका उपकार करनेवाली हो। हे कमलनयन! आपको नमस्कार है, आप हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४४॥
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार स्तुति किये जानेपर पृथिवीको धारण करनेवाले परमात्मा वराहजीने उसे शीघ्र ही उठाकर अपार जलके ऊपर स्थापित कर दिया॥ ४५॥ उस जलसमूहके ऊपर वह एक बहुत बड़ी नौकाके समान स्थित है और बहुत विस्तृत आकार होनेके कारण उसमें डूबती नहीं है॥ ४६॥ फिर उन अनादि परमेश्वरने पृथिवीको समतल कर उसपर जहाँ-तहाँ पर्वतोंको विभाग करके स्थापित कर दिया॥ ४७॥ सत्यसंकल्प भगवान्ने अपने अमोघ प्रभावसे पूर्वकल्पके अन्तमें दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथिवी-तलपर यथास्थान रच दिया॥ ४८॥ तदनन्तर उन्होंने सप्तद्वीपादि-क्रमसे पृथिवीका यथायोग्य विभाग कर भूर्लोकादि चारों लोकोंकी पूर्ववत् कल्पना कर दी॥ ४९॥ फिर उन भगवान् हरिने रजोगुणसे युक्त हो चतुर्मुखधारी ब्रह्मारूप धारण कर सृष्टिकी रचना की॥ ५०॥ सृष्टिकी रचनामें भगवान् तो केवल निमित्तमात्र ही हैं, क्योंकि उसकी प्रधान कारण तो सृज्य पदार्थोंकी शक्तियाँ ही हैं॥ ५१॥ हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय! वस्तुओंकी रचनामें निमित्तमात्रको छोड़कर और किसी बातकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही [परिणाम] शक्तिसे वस्तुता (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है॥ ५२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥