विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| २० | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० ४ |
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परमार्थस्त्वमेवैको नान्योऽस्ति जगतः पते।
तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरम्॥ ३८
यदेतद् दृश्यते मूर्त्तमेतज्ज्ञानात्मनस्तव।
भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः॥ ३९
ज्ञानस्वरूपमखिलं जगदेतदबुद्धयः।
अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते मोहसम्प्लवे॥ ४०
ये तु ज्ञानविदः शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत्।
ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं परमेश्वर॥ ४१
प्रसीद सर्व सर्वात्मन्वासाय जगतामिमाम्।
उद्धरोर्वीममेयात्मञ्छन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४२
सत्त्वोद्रिक्तोऽसि भगवन् गोविन्द पृथिवीमिमाम्।
समुद्धर भवायेश शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४३
सर्गप्रवृत्तिर्भवतो जगतामुपकारिणी।
भवत्वेषा नमस्तेऽस्तु शन्नो देह्यब्जलोचन॥ ४४
श्रीपराशर उवाच
एवं संस्तूयमानस्तु परमात्मा महीधरः।
उज्जहार क्षितिं क्षिप्रं न्यस्तवांश्च महाम्भसि॥ ४५
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता।
विततत्वात्तु देहस्य न मही याति सम्प्लवम्॥ ४६
ततः क्षितिं समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद्गिरीन्।
यथाविभागं भगवाननादिः परमेश्वरः॥ ४७
प्राक्सर्गदग्धानखिलान्पर्वतान्पृथिवीतले।
अमोघेन प्रभावेण ससर्जामोघवाञ्छितः॥ ४८
भूविभागं ततः कृत्वा सप्तद्वीपान्थातथम्।
भूराद्यांश्चतुरो लोकान्पूर्ववत्समकल्पयत्॥ ४९
ब्रह्मरूपधरो देवस्ततोऽसौ रजसा वृतः।
चकार सृष्टिं भगवान्श्चतुर्वक्त्रधरो हरिः॥ ५०
निमित्तमात्रमेवाऽसौ सृज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः॥ ५१
निमित्तमात्रं मुक्त्वैवं नान्यत्किञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्॥ ५२
| हे जगत्पते ! परमार्थ (सत्य वस्तु) तो एकमात्र आप ही हैं, आपके अतिरिक्त और कोई भी नहीं है। यह आपकी ही महिमा (माया) है जिससे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है॥ ३८॥ यह जो कुछ भी मूर्त्तिमान् जगत् दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपहीका रूप है। अजितेन्द्रिय लोग भ्रमसे इसे जगत्-रूप देखते हैं॥ ३९॥ इस सम्पूर्ण ज्ञान-स्वरूप जगत्को बुद्धिहीन लोग अर्थरूप देखते हैं, अतः वे निरन्तर मोहमय संसार-सागरमें भटका करते हैं॥ ४०॥ हे परमेश्वर! जो लोग शुद्धचित्त और विज्ञानवेत्ता हैं वे इस सम्पूर्ण संसारको आपका ज्ञानात्मक स्वरूप ही देखते हैं॥ ४१॥ हे सर्व! हे सर्वात्मन्! प्रसन्न होइये। हे अप्रमेयात्मन्! हे कमलनयन! संसारके निवासके लिये पृथिवीका उद्धार करके हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४२॥ हे भगवन्! हे गोविन्द! इस समय आप सत्त्वप्रधान हैं; अतः हे ईश! जगत्के उद्भवके लिये आप इस पृथिवीका उद्धार कीजिये और हे कमलनयन! हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४३॥ आपके द्वारा यह सर्गकी प्रवृत्ति संसारका उपकार करनेवाली हो। हे कमलनयन! आपको नमस्कार है, आप हमको शान्ति प्रदान कीजिये॥ ४४॥
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार स्तुति किये जानेपर पृथिवीको धारण करनेवाले परमात्मा वराहजीने उसे शीघ्र ही उठाकर अपार जलके ऊपर स्थापित कर दिया॥ ४५॥ उस जलसमूहके ऊपर वह एक बहुत बड़ी नौकाके समान स्थित है और बहुत विस्तृत आकार होनेके कारण उसमें डूबती नहीं है॥ ४६॥ फिर उन अनादि परमेश्वरने पृथिवीको समतल कर उसपर जहाँ-तहाँ पर्वतोंको विभाग करके स्थापित कर दिया॥ ४७॥ सत्यसंकल्प भगवान्ने अपने अमोघ प्रभावसे पूर्वकल्पके अन्तमें दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथिवी-तलपर यथास्थान रच दिया॥ ४८॥ तदनन्तर उन्होंने सप्तद्वीपादि-क्रमसे पृथिवीका यथायोग्य विभाग कर भूर्लोकादि चारों लोकोंकी पूर्ववत् कल्पना कर दी॥ ४९॥ फिर उन भगवान् हरिने रजोगुणसे युक्त हो चतुर्मुखधारी ब्रह्मारूप धारण कर सृष्टिकी रचना की॥ ५०॥ सृष्टिकी रचनामें भगवान् तो केवल निमित्तमात्र ही हैं, क्योंकि उसकी प्रधान कारण तो सृज्य पदार्थोंकी शक्तियाँ ही हैं॥ ५१॥ हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय! वस्तुओंकी रचनामें निमित्तमात्रको छोड़कर और किसी बातकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही [परिणाम] शक्तिसे वस्तुता (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है॥ ५२॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽंशे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
अ० ५ ] * प्रथम अंश * २१
पाँचवाँ अध्याय
अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन
| श्रीमैत्रेय उवाच | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे द्विजराज! सर्गके आदिमें भगवान् ब्रह्माजीने पृथिवी, आकाश और जल आदिमें रहनेवाले देव, ऋषि, पितृगण, दानव, मनुष्य, तिर्यक् और वृक्षादिको जिस प्रकार रचा तथा जैसे गुण, स्वभाव और रूपवाले जगत्की रचना की वह सब आप मुझसे कहिये ॥ १-२ ॥ |
|---|---|
| यथा ससर्ज देवोऽसौ देवर्षिपितृदानवान्।<br>मनुष्यतिर्यग्वृक्षादीन्भूव्योमसलिलौकसः ॥ १ | |
| यदगुणं यत्स्वभावं च यद्रूपं च जगद्विज।<br>सर्गादौ सृष्टवान्ब्रह्मा तन्ममाचक्ष्व कृत्स्नशः ॥ २ | |
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! भगवान् विभुने जिस प्रकार इस सर्गकी रचना की वह मैं तुमसे कहता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥ सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करनेपर पहले अबुद्धिपूर्वक [अर्थात् पहले-पहल असावधानी हो जानेसे] तमोगुणी सृष्टिका आविर्भाव हुआ ॥ ४ ॥ उस महात्मासे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पंचपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई ॥ ५ ॥ उसके ध्यान करनेपर ज्ञानशून्य, बाहर-भीतरसे तमोमय और जड नगादि (वृक्ष-गुल्म-लता-वीरुत्-तृण) रूप पाँच प्रकारका सर्ग हुआ ॥ ६ ॥ [वराहजीद्वारा सर्वप्रथम स्थापित होनेके कारण] नगादिको मुख्य कहा गया है, इसलिये यह सर्ग भी मुख्य सर्ग कहलाता है ॥ ७ ॥ |
| मैत्रेय कथयाम्येतच्छृणुष्व सुसमाहितः।<br>यथा ससर्ज देवोऽसौ देवादीन्निखिलान्विभुः ॥ ३ | |
| सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।<br>अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ ४ | |
| तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ५ | |
| पञ्चधाऽवस्थितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्।<br>बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः ॥ ६ | |
| मुख्या नगा यतः प्रोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयम् ॥ ७ | |
| तं दृष्ट्वाऽसाधकं सर्गममन्यदपरं पुनः ॥ ८ | उस सृष्टिको पुरुषार्थकी असाधिका देखकर उन्होंने फिर अन्य सर्गके लिये ध्यान किया तो तिर्यक्-स्रोत-सृष्टि उत्पन्न हुई। यह सर्ग [वायुके समान] तिरछा चलनेवाला है इसलिये तिर्यक्-स्रोत कहलाता है ॥ ८-९ ॥ ये पशु, पक्षी आदि नामसे प्रसिद्ध हैं—और प्रायः तमोमय (अज्ञानी), विवेकरहित अनुचित मार्गका अवलम्बन करनेवाले और विपरीत ज्ञानको ही यथार्थ ज्ञान माननेवाले होते हैं। ये सब अहंकारी, अभिमानी, अट्ठाईस वधोंसे युक्त* आन्तरिक सुख आदिको ही पूर्णतया समझनेवाले और परस्पर एक-दूसरेकी प्रवृत्तिको न जाननेवाले होते हैं ॥ १०-११ ॥ |
| तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोताभ्यवर्त्तत।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तिस्स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ ९ | |
| पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्राया ह्यवेदिनः।<br>उत्पथग्राहिणश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः ॥ १० | |
| अहङ्कृता अहम्माना अष्टाविंशद्वधात्मकाः।<br>अन्तः प्रकाशास्ते सर्वे आवृताश्च परस्परम् ॥ ११ |
* सांख्य-कारिकामें अट्ठाईस वधोंका वर्णन इस प्रकार किया है—
एकादशेन्द्रियवधाः सह बुद्धिवधैरशक्तिरुद्दिष्टा। सप्तदश वधा बुद्धेर्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥
आध्यात्मिक्यश्चतस्रः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः। बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः। दानञ्च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधा ॥
(४९-५१)
ग्यारह इन्द्रियवध और तुष्टि तथा सिद्धिके विपर्ययसे सत्रह बुद्धि-वध—ये कुल अट्ठाईस वध अशक्ति कहलाते हैं। प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामक चार आध्यात्मिक और पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके बाह्य विषयोंके निवृत्त हो जानेसे पाँच बाह्य—इस प्रकार
२२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतोऽन्यस्ततोऽभवत्।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकोर्ध्वमवर्त्तत ॥ १२ | उस सर्गको भी पुरुषार्थका असाधक समझ पुनः चिन्तन करनेपर एक और सर्ग हुआ। वह ऊर्ध्व-स्रोतनामक तीसरा सात्त्विक सर्ग ऊपरके लोकोंमें रहने लगा॥ १२॥ |
| ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तस्तवावृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः ॥ १३ | वे ऊर्ध्व-स्रोत सृष्टिमें उत्पन्न हुए प्राणी विषय-सुखके प्रेमी, बाह्य और आन्तरिक दृष्टिसम्पन्न, तथा बाह्य और आन्तरिक ज्ञानयुक्त थे॥ १३॥ |
| तुष्टात्मनस्तृतीयस्तु देवसर्गस्तु स स्मृतः।<br>तस्मिन्सर्गेऽभवत्प्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा ॥ १४ | यह तीसरा देवसर्ग कहलाता है। इस सर्गके प्रादुर्भूत होनेसे सन्तुष्टचित्त ब्रह्माजीको अति प्रसन्नता हुई॥ १४॥ |
| ततोऽन्यं स तदा दध्यौ साधकं सर्गमुत्तमम्।<br>असाधकांस्तु तान् ज्ञात्वा मुख्यसर्गादिसम्भवान् ॥ १५ | फिर, इन मुख्य सर्ग आदि तीनों प्रकारकी सृष्टियोंमें उत्पन्न हुए प्राणियोंको पुरुषार्थका असाधक जान उन्होंने एक और उत्तम साधक सर्गके लिये चिन्तन किया॥ १५॥ |
| तथाभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्ततः।<br>प्रादुर्बभूव चाव्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः ॥ १६ | उन सत्यसंकल्प ब्रह्माजीके इस प्रकार चिन्तन करनेपर अव्यक्त (प्रकृति)-से पुरुषार्थका साधक अर्वाक्स्रोत नामक सर्ग प्रकट हुआ॥ १६॥ |
| यस्मादर्वाग्व्यवर्त्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते।<br>ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः ॥ १७ | इस सर्गके प्राणी नीचे (पृथिवीपर) रहते हैं इसलिये वे 'अर्वाक्स्रोत' कहलाते हैं। उनमें सत्त्व, रज और तम तीनोंहीकी अधिकता होती है॥ १७॥ |
| तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकास्तु ते ॥ १८ | इसलिये वे दुःखबहुल, अत्यन्त क्रियाशील एवं बाह्या-आभ्यन्तर ज्ञानसे युक्त और साधक हैं। इस सर्गके प्राणी मनुष्य हैं॥ १८॥ |
| इत्येते कथिताः सर्गाः षडत्र मुनिसत्तम।<br>प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः ॥ १९ | हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अबतक तुमसे छः सर्ग कहे। उनमें महत्तत्त्वको ब्रह्माका पहला सर्ग जानना चाहिये॥ १९॥ |
| तन्मात्राणां द्वितीयश्च भूतसर्गो हि स स्मृतः।<br>वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः ॥ २० | दूसरा सर्ग तन्मात्राओंका है, जिसे भूतसर्ग भी कहते हैं और तीसरा वैकारिक सर्ग है जो ऐन्द्रियक (इन्द्रिय-सम्बन्धी) कहलाता है॥ २०॥ |
| इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतो बुद्धिपूर्वकः।<br>मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः ॥ २१ | इस प्रकार बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुआ यह प्राकृत सर्ग हुआ। चौथा मुख्यसर्ग है। पर्वत-वृक्षादि स्थावर ही मुख्य सर्गके अन्तर्गत हैं॥ २१॥ |
कुल नौ तुष्टियाँ हैं तथा ऊहा, शब्द, अध्ययन, [आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक] तीन दुःखविघात, सुहृत्प्राप्ति और दान—ये आठ सिद्धियाँ हैं। ये [इन्द्रियाशक्ति, तुष्टि, सिद्धिरूप] तीनों वध मुक्तिसे पूर्व विघ्नरूप हैं।
अन्धत्व-वधिरत्वादिसे लेकर पागलपनतक मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंकी विपरीत अवस्थाएँ ग्यारह इन्द्रियवध हैं।
आठ प्रकारकी प्रकृतियोंमेंसे किसीमें चित्तका लय हो जानेसे अपनेको मुक्त मान लेना 'प्रकृति' नामवाली तुष्टि है। संन्याससे ही अपनेको कृतार्थ मान लेना 'उपादान' नामकी तुष्टि है। समय आनेपर स्वयं ही सिद्धि लाभ हो जायगी, ध्यानादि क्लेशकी क्या आवश्यकता है—ऐसा विचार करना 'काल' नामकी तुष्टि है और भाग्योदयसे सिद्धि हो जायगी—ऐसा विचार 'भाग्य' नामकी तुष्टि है। ये चारोंका आत्मासे सम्बन्ध है; अतः ये आध्यात्मिक तुष्टियाँ हैं। पदार्थके उपार्जन, रक्षण और व्यय आदिमें दोष देखकर उनसे उपराम हो जाना बाह्य तुष्टियाँ हैं। शब्दादि बाह्य विषय पाँच हैं, इसलिये बाह्य तुष्टियाँ भी पाँच ही हैं। इस प्रकार कुल नौ तुष्टियाँ हैं।
उपदेशकी अपेक्षा न करके स्वयं ही परमार्थका निश्चय कर लेना 'ऊहा' सिद्धि है। प्रसंगवश कहीं कुछ सुनकर उसीसे ज्ञानसिद्धि मान लेना 'शब्द' सिद्धि है। गुरुसे पढ़कर ही वस्तु प्राप्त हो गयी—ऐसा मान लेना 'अध्ययन' सिद्धि है। आध्यात्मिकादि त्रिविध दुःखोंका नाश हो जाना तीन प्रकारकी 'दुःखविघात' सिद्धि है। अभीष्ट पदार्थकी प्राप्ति हो जाना 'सुहृत्प्राप्ति' सिद्धि है। तथा विद्वान् या तपस्वियोंका संग प्राप्त हो जाना 'दान' नामिका सिद्धि है। इस प्रकार ये आठ सिद्धियाँ हैं।
अ० ५ ] * प्रथम अंश * २३
तिर्यक्स्रोतास्तु यः प्रोक्तस्तैर्यग्योन्यः स उच्यते। तदूर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु संस्मृतः॥ २२ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः॥ २३ अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः। पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः॥ २४ प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः। इत्येते वै समाख्याता नव सर्गाः प्रजापतेः॥ २५ प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः। सृजतो जगदीशस्य किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २६
श्रीमैत्रेय उवाच सङ्क्षेपात्कथितः सर्गो देवादीनां मुने त्वया। विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तो मुनिवरोत्तम॥ २७
श्रीपराशर उवाच कर्मभिर्भाविताः पूर्वैः कुशलाकुशलैस्तु ताः। ख्यात्या तया ह्यनिर्मुक्ताः संहारे ह्युपसंहृताः॥ २८ स्थावरान्ताः सुराद्यास्तु प्रजा ब्रह्मंश्चतुर्विधाः। ब्रह्मणः कुर्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसास्तु ताः॥ २९ ततो देवासुरपितृन्मनुष्यांश्च चतुष्टयम्। सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ ३० युक्तात्मनस्तमोमात्रा ह्युद्रिक्ताऽभूत्प्रजापतेः। सिसृक्षोर्जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे ततः॥ ३१ उत्ससर्ज ततस्तां तु तमोमात्रात्मिकां तनुम्। सा तु त्यक्ता तनुस्तेन मैत्रेयाभूद्विभावरी॥ ३२ सिसृक्षुरन्यदेहस्थः प्रीतिमाप ततः सुराः। सत्त्वोद्रिक्ताः समुद्भूता मुखतो ब्रह्मणो द्विज॥ ३३ त्यक्ता सापि तनुस्तेन सत्त्वप्रायमभूद्दिनम्। ततो हि बलिनो रात्रावसुरा देवता दिवा॥ ३४ सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्। पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे॥ ३५ उत्ससर्ज ततस्तां तु पितृन्सृष्ट्वापि स प्रभुः। सा चोत्सृष्टाभवत्सन्ध्या दिननक्तानन्तरस्थिता॥ ३६ रजोमात्रात्मिकामन्यां जगृहे स तनुं ततः। रजोमात्रोत्कटा जाता मनुष्या द्विजसत्तम॥ ३७
पाँचवाँ जो तिर्यक्स्रोत बतलाया उसे तिर्यक् (कीट-पतंगादि) योनि भी कहते हैं। फिर छठा सर्ग ऊर्ध्व-स्रोतोंका है जो 'देवसर्ग' कहलाता है। उसके पश्चात् सातवाँ सर्ग अर्वाक्-स्रोतोंका है, वह मनुष्य-सर्ग है॥ २२-२३॥ आठवाँ अनुग्रह सर्ग है। वह सात्त्विक और तामसिक है। ये पाँच वैकृत (विकारी) सर्ग हैं और पहले तीन 'प्राकृत सर्ग' कहलाते हैं॥ २४॥ नवाँ कौमार सर्ग है जो प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए जगदीश्वर प्रजापतिके प्राकृत और वैकृत नामक ये जगत्के मूलभूत नौ सर्ग तुम्हें सुनाये। अब और क्या सुनना चाहते हो?॥ २५-२६॥
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे मुने! आपने इन देवादिकोंके सर्गोंका संक्षेपसे वर्णन किया। अब, हे मुनिश्रेष्ठ! मैं इन्हें आपके मुखारविन्दसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ २७॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! सम्पूर्ण प्रजा अपने पूर्व-शुभाशुभ कर्मोंसे युक्त हैं; अतः प्रलयकालमें सबका लय होनेपर भी वह उनके संस्कारोंसे मुक्त नहीं होती॥ २८॥ हे ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके सृष्टि-कर्ममें प्रवृत्त होनेपर देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त चार प्रकारकी सृष्टि हुई। वह केवल मनोमयी थी॥ २९॥
फिर देवता, असुर, पितृगण और मनुष्य—इन चारोंकी तथा जलकी सृष्टि करनेकी इच्छासे उन्होंने अपने शरीरका उपयोग किया॥ ३०॥ सृष्टि-रचनाकी कामनासे प्रजापतिके युक्तचित्त होनेपर तमोगुणकी वृद्धि हुई। अतः सबसे पहले उनकी जंघासे असुर उत्पन्न हुए॥ ३१॥ तब, हे मैत्रेय! उन्होंने उस तमोमय शरीरको छोड़ दिया, वह छोड़ा हुआ तमोमय शरीर ही रात्रि हुआ॥ ३२॥ फिर अन्य देहमें स्थित होनेपर सृष्टिकी कामनावाले उन प्रजापतिको अति प्रसन्नता हुई, और हे द्विज! उनके मुखसे सत्त्वप्रधान देवगण उत्पन्न हुए॥ ३३॥ तदनन्तर उस शरीरको भी उन्होंने त्याग दिया। वह त्यागा हुआ शरीर ही सत्त्वस्वरूप दिन हुआ। इसीलिये रात्रिमें असुर बलवान् होते हैं और दिनमें देवगणोंका बल विशेष होता है॥ ३४॥ फिर उन्होंने आंशिक सत्त्वमय अन्य शरीर ग्रहण किया और अपनेको पितृवत् मानते हुए [अपने पार्श्व-भागसे] पितृगणकी रचना की॥ ३५॥ पितृगणकी रचना कर उन्होंने उस शरीरको भी छोड़ दिया। वह त्यागा हुआ शरीर ही दिन और रात्रिके बीचमें स्थित सन्ध्या हुई॥ ३६॥ तत्पश्चात् उन्होंने आंशिक रजोगमय अन्य शरीर धारण किया; हे द्विजश्रेष्ठ! उससे रजः-प्रधान मनुष्य उत्पन्न हुए॥ ३७॥
| २४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तामप्याशु स तत्याज तनुं सद्यः प्रजापतिः।<br>ज्योत्स्ना समभवत्सापि प्राक्सन्ध्या याऽभिधीयते॥ ३८ | फिर शीघ्र ही प्रजापतिने उस शरीरको भी त्याग दिया, वही ज्योत्स्ना हुआ, जिसे पूर्व-सन्ध्या अर्थात् प्रातःकाल कहते हैं॥ ३८॥ |
| ज्योत्स्नागमे तु बलिनो मनुष्याः पितरस्तथा।<br>मैत्रेय सन्ध्यासमये तस्मादेते भवन्ति वै॥ ३९ | इसीलिये, हे मैत्रेय! प्रातःकाल होनेपर मनुष्य और सायंकालके समय पितर बलवान् होते हैं॥ ३९॥ |
| ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै प्रभोः।<br>ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपाश्रयाणि तु॥ ४० | इस प्रकार रात्रि, दिन, प्रातःकाल और सायंकाल ये चारों प्रभु ब्रह्माजीके ही शरीर हैं और तीनों गुणोंके आश्रय हैं॥ ४०॥ |
| रजोमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम्।<br>ततः क्षुद् ब्रह्मणो जाता जज्ञे कामस्तया ततः॥ ४१ | फिर ब्रह्माजीने एक और रजोमात्रात्मक शरीर धारण किया। उसके द्वारा ब्रह्माजीसे क्षुधा उत्पन्न हुई और क्षुधासे कामकी उत्पत्ति हुई॥ ४१॥ |
| क्षुत्क्षामानान्धकारेऽथ सोऽसृजद्भगवांस्ततः।<br>विरूपाः श्मश्रुला जातास्तेऽभ्यधावन्तस्तः प्रभुम्॥ ४२ | तब भगवान् प्रजापतिने अन्धकारमें स्थित होकर क्षुधाग्रस्त सृष्टिकी रचना की। उसमें बड़े कुरूप और दाढ़ी-मूँछवाले व्यक्ति उत्पन्न हुए। वे स्वयं ब्रह्माजीकी ओर ही [उन्हें भक्षण करनेके लिये] दौड़े॥ ४२॥ |
| मैवं भो रक्ष्यतामेष यैरुक्तं राक्षसास्तु ते।<br>ऊचुः खादाम इत्यन्ये ये ते यक्षास्तु जक्षणात्॥ ४३ | उनमेंसे जिन्होंने यह कहा कि 'ऐसा मत करो, इनकी रक्षा करो' वे 'राक्षस' कहलाये और जिन्होंने कहा 'हम खायेंगे' वे खानेकी वासनावाले होनेसे 'यक्ष' कहे गये॥ ४३॥ |
| अप्रियेण तु तान्दृष्ट्वा केशाः शीर्यन्त वेधसः।<br>हीनाश्च शिरसो भूयः समारोहन्त तच्छिरः॥ ४४<br>सर्पणात्तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः।<br>ततः क्रुद्धो जगत्स्रष्टा क्रोधात्मानो विनिर्ममे।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रभूतास्ते पिशिताशनाः॥ ४५ | उनकी इस अनिष्ट प्रवृत्तिको देखकर ब्रह्माजीके केश सिरसे गिर गये और फिर पुनः उनके मस्तकपर आरूढ़ हुए। इस प्रकार ऊपर चढ़नेके कारण वे 'सर्प' कहलाये और नीचे गिरनेके कारण 'अहि' कहे गये। तदनन्तर जगत्-रचयिता ब्रह्माजीने क्रोधित होकर क्रोधयुक्त प्राणियोंकी रचना की; वे कपिश (कालापन लिये हुए पीले) वर्णके, अति उग्र स्वभाववाले तथा मांसाहारी हुए॥ ४४-४५॥ |
| गायतोऽङ्गात्समुत्पन्ना गन्धर्वास्तस्य तत्क्षणात्।<br>पिबन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते द्विज॥ ४६ | फिर गान करते समय उनके शरीरसे तुरन्त ही गन्धर्व उत्पन्न हुए। हे द्विज! वे वाणीका उच्चारण करते अर्थात् बोलते हुए उत्पन्न हुए थे, इसलिये 'गन्धर्व' कहलाये॥ ४६॥ |
| एतानि सृष्ट्वा भगवान्ब्रह्मा तच्छक्तिचोदितः।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसोऽसृजत्॥ ४७ | इन सबकी रचना करके भगवान् ब्रह्माजीने पक्षियोंको, उनके पूर्व-कर्मोंसे प्रेरित होकर स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे रचा॥ ४७॥ |
| अवयो वक्षसश्चक्रे मुखतोऽजाः स सृष्टवान्।<br>सृष्टवानुदराद्गाश्च पार्श्वाभ्यां च प्रजापतिः॥ ४८<br>पद्भ्यां चाश्वान्समातङ्गान्रासभानगवान्मृगान्।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव न्यङ्कूंननयाश्च जातयः॥ ४९ | तदनन्तर अपने वक्षःस्थलसे भेड़, मुखसे बकरी, उदर और पार्श्वभागसे गौ, पैरोंसे घोड़े, हाथी, गधे, वनगाय, मृग, ऊँट, खच्चर और न्यंकु आदि पशुओंकी रचना की॥ ४८-४९॥ |
| ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>त्रेतायुगमुखे ब्रह्मा कल्पस्यादौ द्विजोत्तम।<br>सृष्ट्वा पश्वोषधीः सम्यग्युयोज स तदाध्वरे॥ ५० | उनके रोमोंसे फल-मूलरूप ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। हे द्विजोत्तम! कल्पके आरम्भमें ही ब्रह्माजीने पशु और ओषधि आदिकी रचना करके फिर त्रेतायुगके आरम्भमें उन्हें यज्ञादि कर्मोंमें सम्मिलित किया॥ ५०॥ |
| गौरजः पुरुषो मेषश्चाश्वाश्वतरगर्दभाः।<br>एतान्ग्राम्यान्पशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे॥ ५१ | गौ, बकरी, पुरुष, भेड़, घोड़े, खच्चर और गधे ये सब गाँवोंमें |
अ० ५ ] * प्रथम अंश * २५
श्वापदा द्विखुरा हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः ।
औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः ॥ ५२
गायत्रं च ऋचश्चैव त्रिवृत्सोमं रथन्तरम् ।
अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ॥ ५३
यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पञ्चदशं तथा ।
बृहत्साम तथोक्थं च दक्षिणादसृजन्मुखात् ॥ ५४
सामानि जगतीछन्दः स्तोमं सप्तदशं तथा ।
वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात् ॥ ५५
एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।
अनुष्टुभं च वैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥ ५६
उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
देवासुरपितॄन् सृष्ट्वा मनुष्यांश्च प्रजापतिः ॥ ५७
ततः पुनः ससर्जादौ सङ्कल्पस्य पितामहः ।
यक्षान् पिशाचान्गन्धर्वान् तथैवाप्सरसां गणान् ॥ ५८
नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान् ।
अव्ययं च व्ययं चैव यदिदं स्थाणुजङ्गमम् ॥ ५९
तत्ससर्ज तदा ब्रह्मा भगवानादिकृत्प्रभुः ।
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ ६०
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ ६१
इन्द्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः ।
नानात्वं विनियोगं च धातैवं व्यसृजत्स्वयम् ॥ ६२
नाम रूपं च भूतानां कृत्यानां च प्रपञ्चनम् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः ॥ ६३
ऋषीणां नामधेयानि यथा वेदश्रुतानि वै ।
तथा नियोगयोग्यानि ह्यान्येषामपि सोऽकरोत् ॥ ६४
यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ६५
करोत्येवंविधां सृष्टिं कल्पादौ स पुनः पुनः ।
सिसृक्षाशक्तियुक्तोऽसौ सृज्यशक्तिप्रचोदितः ॥ ६६
रहनेवाले पशु हैं। जंगली पशु ये हैं—श्वापद (व्याघ्र आदि), दो खुरवाले (वनगाय आदि), हाथी, बन्दर और पाँचवें पक्षी, छठे जलके जीव तथा सातवें सरीसृप आदि ॥ ५१-५२ ॥ फिर अपने प्रथम (पूर्व) मुखसे ब्रह्माजीने गायत्री, ऋक्, त्रिवृत्सोम रथन्तर और अग्निष्टोम यज्ञोंको निर्मित किया ॥ ५३ ॥ दक्षिण-मुखसे यजु, त्रैष्टुप्छन्द, पंचदशस्तोम, बृहत्साम तथा उक्थकी रचना की ॥ ५४ ॥ पश्चिम-मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशस्तोम, वैरूप और अतिरात्रको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥ तथा उत्तर-मुखसे उन्होंने एकविंशतिस्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप्छन्द और वैराजकी सृष्टि की ॥ ५६ ॥
इस प्रकार उनके शरीरसे समस्त ऊँच-नीच प्राणी उत्पन्न हुए। उन आदिकर्ता प्रजापति भगवान् ब्रह्माजीने देव, असुर, पितृगण और मनुष्योंकी सृष्टि कर तदनन्तर कल्पका आरम्भ होनेपर फिर यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरागण, मनुष्य, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर-जंगम जगत्की रचना की। उनमेंसे जिनके जैसे-जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें थे पुनः-पुनः सृष्टि होनेपर उनकी उन्हींमें फिर प्रवृत्ति हो जाती है ॥ ५७–६० ॥ उस समय हिंसा-अहिंसा, मृदुता-कठोरता, धर्म-अधर्म, सत्य-मिथ्या—ये सब अपनी पूर्व-भावनाके अनुसार उन्हें प्राप्त हो जाते हैं, इसीसे ये उन्हें अच्छे लगने लगते हैं ॥ ६१ ॥
इस प्रकार प्रभु विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता और व्यवहारको उत्पन्न किया है ॥ ६२ ॥ उन्होंने कल्पके आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके वेदानुसार नाम और रूप तथा कार्य-विभागको निश्चित किया है ॥ ६३ ॥ ऋषियों तथा अन्य प्राणियोंके भी वेदानुकूल नाम और यथायोग्य कर्मोंको उन्होंने निर्दिष्ट किया है ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं उसी प्रकार युगादिमें भी उनके पूर्व-भाव ही देखे जाते हैं ॥ ६५ ॥ सिसृक्षा-शक्ति (सृष्टि-रचनाकी इच्छारूप शक्ति)-से युक्त वे ब्रह्माजी सृज्य-शक्ति (सृष्टिके प्रारब्ध)-की प्रेरणासे कल्पोंके आरम्भमें बारम्बार इसी प्रकार सृष्टिकी रचना किया करते हैं ॥ ६६ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
२६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ६
छठा अध्याय
चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन
श्रीमैत्रेय उवाच अर्वाक्स्रोतास्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः। ब्रह्मन्विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा तमस्सृजद्यथा ॥ १ यथा च वर्णानसृजद्यद्गुणांश्च प्रजापतिः। यच्च तेषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां तदुच्यताम् ॥ २
श्रीपराशर उवाच सत्याभिध्यायिनः पूर्वं सिसृक्षोर्ब्रह्मणो जगत्। अजायन्त द्विजश्रेष्ठ सत्त्वोद्रिक्ता मुखात्प्रजाः ॥ ३ वक्षसो रजसोद्रिक्तास्तथा वै ब्रह्मणोऽभवन्। रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ॥ ४ पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम। तमः प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वर्ण्यमिदं तत ॥ ५ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। पादोरुवक्षःस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः ॥ ६ यज्ञनिष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार वै। चातुर्वर्ण्यं महाभाग यज्ञसाधनमुत्तमम् ॥ ७ यज्ञैराप्यायिता देवा वृष्ट्युत्सर्गेण वै प्रजाः। आप्याययन्ते धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याणहेतवः ॥ ८ निष्पाद्यन्ते नरैस्तैस्तु स्वधर्माभिरतैस्सदा। विशुद्धाचरणोपेतैः सद्भिः सन्मार्गगामिभिः ॥ ९ स्वर्गापवर्गौ मानुष्यात्प्राप्नुवन्ति नरा मुने। यच्चाभिरुचितं स्थानं तद्यान्ति मनुजा द्विज ॥ १० प्रजास्ता ब्रह्मणा सृष्टाश्चातुर्वर्ण्यव्यवस्थिताः। सम्यक्श्रद्धासमाचारप्रवणा मुनिसत्तम ॥ ११ यथेच्छावासनिरताः सर्वबाधाविवर्जिताः। शुद्धान्तःकरणाः शुद्धाः कर्मानुष्ठाननिर्मलाः ॥ १२ शुद्धे च तासां मनसि शुद्धेऽन्तः संस्थिते हरौ। शुद्धज्ञानं प्रपश्यन्ति विष्ण्वाख्यं येन तत्पदम् ॥ १३ ततः कालात्मको योऽसौ स चांशः कथितो हरेः। स पातयत्यघं घोरमल्पमल्पाल्यसारवत् ॥ १४
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! आपने जो अर्वाक्स्रोता मनुष्योंके विषयमें कहा उनकी सृष्टि ब्रह्माजीने किस प्रकार की—यह विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ श्रीप्रजापतिने ब्राह्मणादि वर्णोंको जिन-जिन गुणोंसे युक्त और जिस प्रकार रचा तथा उनके जो-जो कर्तव्य-कर्म निर्धारित किये वह सब वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठ! जगत्-रचनाकी इच्छासे युक्त सत्यसंकल्प श्रीब्रह्माजीके मुखसे पहले सत्त्वप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई ॥ ३ ॥ तदनन्तर उनके वक्षःस्थलसे रजःप्रधान तथा जंघाओंसे रज और तमविशिष्ट सृष्टि हुई ॥ ४ ॥ हे द्विजोत्तम! चरणोंसे ब्रह्माजीने एक और प्रकारकी प्रजा उत्पन्न की, वह तमःप्रधान थी। ये ही सब चारों वर्ण हुए ॥ ५ ॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तम! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों क्रमशः ब्रह्माजीके मुख, वक्षःस्थल, जानु और चरणोंसे उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥
हे महाभाग! ब्रह्माजीने यज्ञानुष्ठानके लिये ही यज्ञके उत्तम साधनरूप इस सम्पूर्ण चातुर्वर्ण्यकी रचना की थी ॥ ७ ॥ हे धर्मज्ञ! यज्ञसे तृप्त होकर देवगण जल बरसाकर प्रजाको तृप्त करते हैं; अतः यज्ञ सर्वथा कल्याणका हेतु है ॥ ८ ॥ जो मनुष्य सदा स्वधर्मपरायण, सदाचारी, सज्जन और सुमार्गगामी होते हैं उन्हींसे यज्ञका यथावत् अनुष्ठान हो सकता है ॥ ९ ॥ हे मुने! [यज्ञके द्वारा] मनुष्य इस मनुष्य-शरीरसे ही स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं; तथा और भी जिस स्थानकी उन्हें इच्छा हो उसीको जा सकते हैं ॥ १० ॥
हे मुनिसत्तम! ब्रह्माजीद्वारा रची हुई वह चातुर्वर्ण्य-विभागमें स्थित प्रजा अति श्रद्धायुक्त आचरणवाली, स्वेच्छानुसार रहनेवाली, सम्पूर्ण बाधाओंसे रहित, शुद्ध अन्तःकरणवाली, सत्कुलोत्पन्न और पुण्य कर्मोंके अनुष्ठानसे परम पवित्र थी ॥ ११-१२ ॥ उसका चित्त शुद्ध होनेके कारण उसमें निरन्तर शुद्धस्वरूप श्रीहरिके विराजमान रहनेसे उन्हें शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता था जिससे वे भगवान्के उस 'विष्णु' नामक परम पदको देख पाते थे ॥ १३ ॥ फिर (त्रेतायुगके आरम्भमें), हमने तुमसे भगवान्के जिस काल नामक अंशका पहले वर्णन किया है, वह अति अल्प सारवाले (सुखवाले) तुच्छ और घोर (दुःखमय) पापोंको प्रजामें प्रवृत्त कर देता है ॥ १४ ॥
अ० ६ ] * प्रथम अंश * २७
अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५
ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रसोल्लासादयश्चान्याः सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति याः॥ १६
तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके।
द्वन्द्वाभिभवदुःखार्त्तास्ता भवन्ति ततः प्रजाः॥ १७
ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्धान्वं पार्वतमौदकम्।
कृत्रिमं च तथा दुर्गं पुरखर्वटकादिकम्॥ १८
गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु।
शीतातपादिबाधानां प्रशमाय महामते॥ १९
प्रतीकारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः।
वार्त्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्॥ २०
व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।
प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सतीनकाः॥ २१
माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुल्त्थकाः।
आढक्यश्चणकाश्चैव शणाः सप्तदश स्मृताः॥ २२
इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो मुने।
ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ २३
हिन्दी अनुवाद:
हे मैत्रेय! उससे प्रजामें पुरुषार्थका विघातक तथा अज्ञान और लोभको उत्पन्न करनेवाला रागादिरूप अधर्मका बीज उत्पन्न हो जाता है॥ १५॥ तभीसे उसे वह विष्णु-पद-प्राप्ति-रूप स्वाभाविक सिद्धि और रसोल्लास आदि अन्य अष्ट सिद्धियाँ १ नहीं मिलतीं॥ १६॥
उन समस्त सिद्धियोंके क्षीण हो जाने और पापके बढ़ जानेसे फिर सम्पूर्ण प्रजा द्वन्द्व, ह्रास और दुःखसे आतुर हो गयी॥ १७॥ तब उसने मरुभूमि, पर्वत और जल आदिके स्वाभाविक तथा कृत्रिम दुर्ग और पुर तथा खर्वट२ आदि स्थापित किये॥ १८॥ हे महामते! उन पुर आदिकोंमें शीत और घाम आदि बाधाओंसे बचनेके लिये उसने यथायोग्य घर बनाये॥ १९॥
इस प्रकार शीतोष्णादिसे बचनेका उपाय करके उस प्रजाने जीविकाके साधनरूप कृषि तथा कला-कौशल आदिकी रचना की॥ २०॥ हे मुने! धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी, ज्वार, कोदो, छोटी मटर, उड़द, मूँग, मसूर, बड़ी मटर, कुलथी, राई, चना और सन—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकारकी मिलाकर कुल चौदह ओषधियाँ याज्ञिक हैं।
१- रसोल्लासादि अष्ट-सिद्धियोंका वर्णन स्कन्दपुराणमें इस प्रकार किया है—
रसस्य स्वत एवान्तरुल्लासः स्यात्कृते युगे। रसोल्लासाख्यिका सिद्धिस्तया हन्ति क्षुधं नरः॥
स्त्र्यादीनां नैरपेक्ष्येण सदा तृप्ता प्रजास्तथा। द्वितीया सिद्धिरुद्दिष्टा सा तृप्तिर्मु निसत्तमैः॥
धर्मोत्तमश्च योऽस्त्यासां सा तृतीयाऽभिधीयते। चतुर्थी तुल्यता तासामायुषः सुखरूपयोः॥
ऐकान्त्यबलबाहुल्यं विशोका नाम पञ्चमी। परमात्मपरत्वेन तपोध्यानादिनिष्ठिता॥
षष्ठी च कामचारित्वं सप्तमी सिद्धिरुच्यते। अष्टमी च तथा प्रोक्ता यत्रक्वचनशायिता॥
**अर्थ—**सत्ययुगमें रसका स्वयं ही उल्लास होता था। यही रसोल्लास नामकी सिद्धि है, उसके प्रभावसे मनुष्य भूखको नष्ट कर देता है। उस समय प्रजा स्त्री आदि भोगोंकी अपेक्षाके बिना ही सदा तृप्त रहती थी; इसीको मुनिश्रेष्ठोंने 'तृप्ति' नामक दूसरी सिद्धि कहा है। उनका जो उत्तम धर्म था वही उनकी तीसरी सिद्धि कही जाती है। उस समय सम्पूर्ण प्रजाके रूप और आयु एक-से थे, यही उनकी चौथी सिद्धि थी। बलकी ऐकान्तिकी अधिकता—यह 'विशोका' नामकी पाँचवीं सिद्धि है। परमात्मपरायण रहते हुए तप-ध्यानादिमें तत्पर रहना छठी सिद्धि है। स्वेच्छानुसार विचरना सातवीं सिद्धि कही जाती है तथा जहाँ-तहाँ मनकी मौज पड़े रहना आठवीं सिद्धि कही गयी है।
२- पहाड़ या नदीके तटपर बसे हुए छोटे-छोटे टोलोंको 'खर्वट' कहते हैं।
२८ । श्रीविष्णुपुराण । [ अ० ६
| व्रीहयस्सयवा माषा गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।<br>प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः ॥ २४<br>श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः।<br>तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मर्कटका मुने ॥ २५<br>ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश।<br>यज्ञनिष्पत्तये यज्ञस्तथासां हेतुरुत्तमः ॥ २६<br>एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम्।<br>परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥ २७<br>अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां मुनिसत्तम।<br>उपकारकं पुंसां क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥ २८<br>येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।<br>चेतःसु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम् ॥ २९<br>वेदवादांस्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यासेधकारिणः ॥ ३०<br>प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दकाः।<br>दुरात्मानो दुराचारा बभूवुः कुटिलाशयाः ॥ ३१<br>संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजाः सृष्टा प्रजापतिः।<br>मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥ ३२<br>वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतां वर।<br>लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥ ३३<br>प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ३४<br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ३५<br>अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ ३६<br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३७<br>योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम् ॥ ३८<br>एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनश्च ये।<br>तेषां तु परमं स्थानं यत्तत्पश्यन्ति सूरयः ॥ ३९ | उनके नाम ये हैं—धान, जौ, उड़द, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी और कुलथी—ये आठ तथा श्यामाक (समाँ), नीबार, वनतिल, गवेधु, वेणुयव और मर्कट (मक्का) ॥ २१–२५ ॥ ये चौदह ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ यज्ञानुष्ठानकी सामग्री हैं और यज्ञ इनकी उत्पत्तिका प्रधान हेतु है॥ २६॥ यज्ञोंके सहित ये ओषधियाँ प्रजाकी वृद्धिका परम कारण हैं इसलिये इहलोक-परलोकके ज्ञाता पुरुष यज्ञोंका अनुष्ठान किया करते हैं॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! नित्यप्रति किया जानेवाला यज्ञानुष्ठान मनुष्योंका परम उपकारक और उनके किये हुए पापोंको शान्त करनेवाला है॥ २८ ॥<br><br>हे महामुने ! जिनके चित्तमें कालकी गतिसे पापका बीज बढ़ता है उन्हीं लोगोंका चित्त यज्ञमें प्रवृत्त नहीं होता ॥ २९ ॥ उन यज्ञके विरोधियोंने वैदिक मत, वेद और यज्ञादि कर्म—सभीकी निन्दा की है॥ ३०॥ वे लोग दुरात्मा, दुराचारी, कुटिलमति, वेद-निन्दक और प्रवृत्तिमार्गका उच्छेद करनेवाले ही थे ॥ ३१॥<br><br>हे धर्मवानोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! इस प्रकार कृषि आदि जीविकाके साधनोंके निश्चित हो जानेपर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रजाकी रचना कर उनके स्थान और गुणोंके अनुसार मर्यादा, वर्ण और आश्रमोंके धर्म तथा अपने धर्मका भली प्रकार पालन करनेवाले समस्त वर्णोंके लोक आदिकी स्थापना की ॥ ३२-३३॥ कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक है, युद्ध-क्षेत्रसे कभी न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक है॥ ३४॥ तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्योंका वायुलोक और सेवाधर्मपरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक है ॥ ३५ ॥ अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि हैं; उनका जो स्थान बताया गया है वही गुरुकुलवासी ब्रह्मचारियोंका स्थान है॥ ३६ ॥ इसी प्रकार वनवासी वानप्रस्थोंका स्थान सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और संन्यासियोंका ब्रह्मलोक है तथा आत्मानुभवसे तृप्त योगियोंका स्थान अमरपद (मोक्ष) है॥ ३७-३८ ॥ जो निरन्तर एकान्तसेवी और ब्रह्मचिन्तनमें मग्न रहनेवाले योगिजन हैं उनका जो परमस्थान है उसे पण्डितजन ही देख पाते हैं ॥ ३९ ॥ |
अ० ७ ] * प्रथम अंश * २९
| गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।<br>अद्यापि न निवर्त्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ ४०<br>तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम्॥ ४१<br>विनिन्दकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्।<br>स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये॥ ४२ | चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह भी अपने-अपने लोकोंमें जाकर फिर लौट आते हैं, किन्तु द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का चिन्तन करनेवाले अभीतक मोक्षपदसे नहीं लौटे॥ ४०॥ तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, घोर, कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदोंकी निन्दा और यज्ञोंका उच्छेद करनेवाले तथा स्वधर्म-विमुख पुरुषोंके स्थान कहे गये हैं॥ ४१-४२॥ |
|---|
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच<br>ततोऽभिध्यायंतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः।<br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १<br>ते सर्वे समवर्त्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः।<br>देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषये स्थिताः॥ २<br>एवंभूतानि सृष्टानि चराणि स्थावराणि च॥ ३ | श्रीपराशरजी बोले— फिर उन प्रजापतिके ध्यान करनेपर उनके देहस्वरूप भूतोंसे उत्पन्न हुए शरीर और इन्द्रियोंके सहित मानस प्रजा उत्पन्न हुई। उस समय मतिमान् ब्रह्माजीके जड शरीरसे ही चेतन जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ॥ १॥ मैंने पहले जिनका वर्णन किया है, देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त वे सभी त्रिगुणात्मक चर और अचर जीव इसी प्रकार उत्पन्न हुए॥ २-३॥ |
|---|---|
| यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः।<br>अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ ४<br>भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा।<br>मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान्॥ ५<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ ६ | जब महाबुद्धिमान् प्रजापतिकी वह प्रजा पुत्र-पौत्रादि-क्रमसे और न बढ़ी तब उन्होंने भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—इन अपने ही सदृश अन्य मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं॥ ४—६॥ |
| ख्यातिं भूतिं च सम्भूतिं क्षमां प्रीतिं तथैव च।<br>सन्नतिं च तथैवोर्ज्रामनसूयां तथैव च॥ ७<br>प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा ददौ तेषां महात्मनाम्।<br>पत्न्यो भवध्वमित्युक्त्वा तेषामेव तु दत्तवान्॥ ८ | फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्ज्जा, अनसूया तथा प्रसूति इन नौ कन्याओंको उत्पन्न कर, इन्हें उन महात्माओंको 'तुम इनकी पत्नी हो' ऐसा कहकर सौंप दिया॥ ७-८॥ |
| सनन्दनादयो ये च पूर्वसृष्टास्तु वेधसा।<br>न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षाः प्रजासु ते॥ ९<br>सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः।<br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः॥ १० | ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दनादिको उत्पन्न किया था वे निरपेक्ष होनेके कारण सन्तान और संसार आदिमें प्रवृत्त नहीं हुए॥ ९॥ वे सभी ज्ञानसम्पन्न, विरक्त और मत्सरादि दोषोंसे रहित थे। उन महात्माओंको संसार-रचनासे |
| ३० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणोऽभून्महान् क्रोधस्त्रैलोक्यदहनक्षमः।<br>तस्य क्रोधात्समुद्भूतज्वालामालातिदीपितम्।<br>ब्रह्मणोऽभूत्तदा सर्वं त्रैलोक्यमखिलं मुने॥ ११ | ब्रह्माजीको त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला महान् क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुने! उन ब्रह्माजीके क्रोधके कारण सम्पूर्ण त्रिलोकी ज्वाला-मालाओंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो गयी॥ १०-११॥ |
| भ्रुकुटीकुटिलात्तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात्।<br>समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नार्कसमप्रभः॥ १२ | उस समय उनकी टेढ़ी भृकुटि और क्रोध-सन्तप्त ललाटसे दोपहरके सूर्यके समान प्रकाशमान रुद्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२॥ |
| अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा तं ब्रह्मान्तर्दधे ततः॥ १३ | उसका अति प्रचण्ड शरीर आधा नर और आधा नारीरूप था। तब ब्रह्माजी 'अपने शरीरका विभाग कर' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ १३॥ |
| तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाऽकरोत्।<br>विभेदपुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ १४ | ऐसा कहे जानेपर उस रुद्रने अपने शरीरस्थ स्त्री और पुरुष दोनों भागोंको अलग-अलग कर दिया और फिर पुरुष-भागको ग्यारह भागोंमें विभक्त किया॥ १४॥ |
| सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ताऽशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>विभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ १५ | तथा स्त्री-भागको भी सौम्य, क्रूर, शान्त-अशान्त और श्याम-गौर आदि कई रूपोंमें विभक्त कर दिया॥ १५॥ |
| ततो ब्रह्माऽऽत्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः।<br>आत्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनुं द्विज॥ १६ | तदनन्तर, हे द्विज! अपनेसे उत्पन्न अपने ही स्वरूप स्वायम्भुवको ब्रह्माजीने प्रजा-पालनके लिये प्रथम मनु बनाया॥ १६॥ |
| शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्धूतकल्मषाम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः॥ १७ | उन स्वायम्भुव मनुने [अपने ही साथ उत्पन्न हुई] तपके कारण निष्पाप शतरूपा नामकी स्त्रीको अपनी पत्नीरूपसे ग्रहण किया॥ १७॥ |
| तस्मात्तु पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतिसंज्ञितम्॥ १८ | हे धर्मज्ञ! उन स्वायम्भुव मनुसे शतरूपा देवीने प्रियव्रत और उत्तानपादनामक दो पुत्र |
| कन्याद्वयं च धर्मज्ञ रूपौदार्यगुणान्वितम्।<br>ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा॥ १९ | तथा उदार, रूप और गुणोंसे सम्पन्न प्रसूति और आकूति नामकी दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे प्रसूतिको दक्षके साथ तथा आकूतिको रुचि प्रजापतिके साथ विवाह दिया॥ १८-१९॥ |
| प्रजापतिः स जग्राह तयोर्जज्ञे सदक्षिणः।<br>पुत्रो यज्ञो महाभाग दम्पत्योर्मिथुनं ततः॥ २० | हे महाभाग! रुचि प्रजापतिने उसे ग्रहण कर लिया। तब उन दम्पतीके यज्ञ और दक्षिणा—ये युगल (जुड़वाँ) सन्तान उत्पन्न हुईं॥ २०॥ |
| यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवे मनौ॥ २१ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें याम नामके देवता कहलाये॥ २१॥ |
| प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिस्तथा।<br>ससर्ज कन्यास्तासां च सम्यङ् नामानि मे शृणु॥ २२ | तथा दक्षने प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। मुझसे उनके शुभ नाम सुनो॥ २२॥ |
| श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिर्मेधा पुष्टिस्तथा क्रिया।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी॥ २३ | श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मेधा, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और तेरहवीं कीर्ति—इन दक्ष-कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपसे ग्रहण किया। |
| पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः।<br>ताभ्यः शिष्टाः यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २४ | इनसे छोटी शेष ग्यारह कन्याएँ |
| ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्ततिश्चानसूया च ऊर्ज्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २५ | ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्तति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा थीं॥ २३—२५॥ |
| भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा॥ २६ | हे मुनिसत्तम! इन ख्याति आदि कन्याओंको क्रमशः भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, |
अ० ७] * प्रथम अंश * ३१
| अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तम ॥ २७<br>श्रद्धा कामं चला दर्पं नियमं धृतिरात्मजम्।<br>सन्तोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूत ॥ २८<br>मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेव च ॥ २९<br>बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्।<br>व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत ॥ ३०<br>सुखं सिद्धिर्र्यशः कीर्त्तिरित्येते धर्मसूनवः।<br>कामाद्रतिः सुतं हर्षं धर्मपौत्रमसूत ॥ ३१<br>हिंसा भार्या त्वधर्मस्य ततो जज्ञे तथानृतम्।<br>कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयं नरकमेव च ॥ ३२<br>माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः।<br>तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ ३३<br>वेदना स्वसुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।<br>मृत्योर्व्याधिजराशोक तृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ ३४<br>दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।<br>नैषां पुत्रोऽस्ति वै भार्या ते सर्वे ह्यूर्ध्वरेतसः॥ ३५<br>रौद्राण्येतानि रूपाणि विष्णोर्मुनिवरात्मज।<br>नित्यप्रलयहेतुत्वं जगतोऽस्य प्रयान्ति वै॥ ३६<br>दक्षो मरीचिरत्रिश्च भृग्वाद्याश्च प्रजेश्वराः।<br>जगत्यत्र महाभाग नित्यसर्गस्य हेतवः ॥ ३७<br>मनवो मनुपुत्राश्च भूपा वीर्यधराश्च ये।<br>सन्मार्गनिरताः शूरास्ते सर्वे स्थितिकारिणः ॥ ३८<br>श्रीमैत्रेय उवाच<br>येयं नित्या स्थितिर्ब्रह्मन्नित्यसर्गस्तथेरितः।<br>नित्याभावश्च तेषां वै स्वरूपं मम कथ्यताम् ॥ ३९<br>श्रीपराशर उवाच<br>सर्गस्थितिविनाशांश्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तैस्तै रूपैरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभुः ॥ ४०<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विज।<br>नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥ ४१ | पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ—इन मुनियों तथा अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया॥ २६-२७॥<br>श्रद्धासे काम, चला (लक्ष्मी) से दर्प, धृतिसे नियम, तुष्टिसे सन्तोष और पुष्टिसे लोभकी उत्पत्ति हुई॥ २८॥ तथा मेधासे श्रुत, क्रियासे दण्ड, नय और विनय, बुद्धिसे बोध, लज्जासे विनय, वपुसे उसका पुत्र व्यवसाय, शान्तिसे क्षेम, सिद्धिसे सुख और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ; ये ही धर्मके पुत्र हैं। रतिने कामसे धर्मके पौत्र हर्षको उत्पन्न किया॥ २९—३१॥<br>अधर्मकी स्त्री हिंसा थी, उससे अनृत नामक पुत्र और निकृति नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उन दोनोंसे भय और नरक नामके पुत्र तथा उनकी पत्नियां माया और वेदना नामकी कन्याएँ हुईं। उनमेंसे मायाने समस्त प्राणियोंका संहारकर्ता मृत्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३२-३३॥ वेदनाने भी रौरव (नरक)-के द्वारा अपने पुत्र दुःखको जन्म दिया और मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोधकी उत्पत्ति हुई ॥ ३४॥ ये सब अधर्मरूप हैं और 'दुःखोत्तर' नामसे प्रसिद्ध हैं, [क्योंकि इनसे परिणाममें दुःख ही प्राप्त होता है] इनके न कोई स्त्री है और न सन्तान। ये सब ऊर्ध्वरेता हैं॥ ३५॥ हे मुनिकुमार! ये भगवान् विष्णुके बड़े भयंकर रूप हैं और ये ही संसारके नित्य-प्रलयके कारण होते हैं॥ ३६॥ हे महाभाग! दक्ष, मरीचि, अत्रि और भृगु आदि प्रजापतिगण इस जगत्के नित्य-सर्गके कारण हैं॥ ३७॥ तथा मनु और मनुके पराक्रमी, सन्मार्गपरायण और शूर-वीर पुत्र राजागण इस संसारकी नित्य-स्थितिके कारण हैं॥ ३८॥<br>श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! आपने जो नित्य-स्थिति, नित्य-सर्ग और नित्य-प्रलयका उल्लेख किया सो कृपा करके मुझसे इनका स्वरूप वर्णन कीजिये॥ ३९॥<br>श्रीपराशरजी बोले—जिनकी गति कहीं नहीं रुकती वे अचिन्त्यात्मा सर्वव्यापक भगवान् मधुसूदन निरन्तर इन मनु आदि रूपोंसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करते रहते हैं॥४०॥ हे द्विज! समस्त भूतोंका चार प्रकारका प्रलय है—नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यन्तिक और नित्य॥ ४१ ॥ |
३२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र शेतेऽयं जगतीपतिः।
प्रयाति प्राकृते चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतौ लयम्॥ ४२
ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।
नित्यः सदैव भूतानां यो विनाशो दिवानिशम्॥ ४३
प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु सा सृष्टिः प्राकृता स्मृता।
दैनन्दिनी तथा प्रोक्ता यान्तरप्रलयादनु॥ ४४
भूतान्यनुदिनं यत्र जायन्ते मुनिसत्तम।
नित्यसर्गो हि स प्रोक्तः पुराणार्थविचक्षणैः॥ ४५
एवं सर्वशरीरेषु भगवान्भूतभावनः।
संस्थितः कुरुते विष्णुरुत्पत्तिस्थितिसंयमान्॥ ४६
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तयः सर्वदेहिषु।
वैष्णव्यः परिवर्त्तन्ते मैत्रेयाहर्निशं समाः॥ ४७
गुणत्रयमयं ह्येतद्ब्रह्मन् शक्तित्रयं महत्।
योऽतियाति स यात्येव परं नावत्तंते पुनः॥ ४८
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
उनमेंसे नैमित्तिक प्रलय ही ब्राह्म-प्रलय है, जिसमें जगत्पति ब्रह्माजी कल्पान्तमें शयन करते हैं; तथा प्राकृतिक प्रलयमें ब्रह्माण्ड प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ४२॥ ज्ञानके द्वारा योगीका परमात्मामें लीन हो जाना आत्यन्तिक प्रलय है और रात-दिन जो भूतोंका क्षय होता है वही नित्य-प्रलय है॥ ४३॥ प्रकृतिसे महत्तत्वादिक्रमसे जो सृष्टि होती है वह प्राकृतिक सृष्टि कहलाती है और अवान्तर-प्रलयके अनन्तर जो [ब्रह्माके द्वारा] चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है वह दैनन्दिनी सृष्टि कही जाती है॥ ४४॥ और हे मुनिश्रेष्ठ! जिसमें प्रतिदिन प्राणियोंकी उत्पत्ति होती रहती है उसे पुराणार्थमें कुशल महानुभावोंने नित्य-सृष्टि कहा है॥ ४५॥
इस प्रकार समस्त शरीरमें स्थित भूतभावन भगवान् विष्णु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ४६॥ हे मैत्रेय! सृष्टि, स्थिति और विनाशकी इन वैष्णवी शक्तियोंका समस्त शरीरोंमें समान भावसे अहर्निश संचार होता रहता है॥ ४७॥ हे ब्रह्मन्! ये तीनों महती शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; अतः जो उन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है वह परमपदको ही प्राप्त कर लेता है, फिर जन्म-मरणादिके चक्रमें नहीं पड़ता॥ ४८॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन
श्रीपराशर उवाच
कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्ते महामुने।
रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्र-सर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो॥ १॥
कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः।
प्रादुरासीत्प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ २
कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ॥ २॥
रुरोद सुस्वरं सोऽथ प्राद्रवद्विजसत्तम।
किं त्वं रोदिषि तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह॥ ३
हे द्विजोत्तम! जन्मके अनन्तर ही वह जोर-जोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा। उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा—"तू क्यों रोता है?"॥ ३॥
नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिः।
रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि मा रोदीर्धैर्यमावह।
एवमुक्तः पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै॥ ४
उसने कहा—"मेरा नाम रखो।" तब ब्रह्माजी बोले—'हे देव! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर।' ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया॥ ४॥
जगन्नाथ
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् श्रीविष्णु
48
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परमेश।
गीताप्रेस, गोरखपुर
लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
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गीताप्रेस, गोरखपुर
अकृरको प्रथम दर्शन
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कालयवन और श्रीकुष्ण
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कंसकी मल्लशालामें श्रीबलराम
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कंसकी मल्लशालामें श्रीकृष्ण
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A vibrant, full-page illustration of Lord Shiva. He is depicted in a powerful, dynamic pose, standing on a rocky, uneven ground. He holds a golden mace (Gada) high above his head with his right hand, and a golden trident (Trishula) with a white tip in his left hand. He is wearing a golden crown (Kiritam) with a red gem, a blue and gold patterned upper garment (Kiritam), and a red and yellow dhoti (Dhoti). He is adorned with various golden jewelry, including necklaces, armlets, and a belt with a heart-shaped pendant. A quiver of arrows is visible on his back. The background is a swirling, colorful sky with shades of blue, yellow, and purple, suggesting a divine or cosmic setting. The overall style is that of a traditional Indian religious painting.
गीताप्रेस, मीरजापुर
श्रीबलरामजीकी लातसे धरती फट गयी
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