भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ६ ] * प्रथम अंश * २७


अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५

ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रसोल्लासादयश्चान्याः सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति याः॥ १६

तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके।
द्वन्द्वाभिभवदुःखार्त्तास्ता भवन्ति ततः प्रजाः॥ १७

ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्धान्वं पार्वतमौदकम्।
कृत्रिमं च तथा दुर्गं पुरखर्वटकादिकम्॥ १८

गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु।
शीतातपादिबाधानां प्रशमाय महामते॥ १९

प्रतीकारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः।
वार्त्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्॥ २०

व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।
प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सतीनकाः॥ २१

माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुल्त्थकाः।
आढक्यश्चणकाश्चैव शणाः सप्तदश स्मृताः॥ २२

इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो मुने।
ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ २३

हिन्दी अनुवाद:

हे मैत्रेय! उससे प्रजामें पुरुषार्थका विघातक तथा अज्ञान और लोभको उत्पन्न करनेवाला रागादिरूप अधर्मका बीज उत्पन्न हो जाता है॥ १५॥ तभीसे उसे वह विष्णु-पद-प्राप्ति-रूप स्वाभाविक सिद्धि और रसोल्लास आदि अन्य अष्ट सिद्धियाँ १ नहीं मिलतीं॥ १६॥

उन समस्त सिद्धियोंके क्षीण हो जाने और पापके बढ़ जानेसे फिर सम्पूर्ण प्रजा द्वन्द्व, ह्रास और दुःखसे आतुर हो गयी॥ १७॥ तब उसने मरुभूमि, पर्वत और जल आदिके स्वाभाविक तथा कृत्रिम दुर्ग और पुर तथा खर्वट२ आदि स्थापित किये॥ १८॥ हे महामते! उन पुर आदिकोंमें शीत और घाम आदि बाधाओंसे बचनेके लिये उसने यथायोग्य घर बनाये॥ १९॥

इस प्रकार शीतोष्णादिसे बचनेका उपाय करके उस प्रजाने जीविकाके साधनरूप कृषि तथा कला-कौशल आदिकी रचना की॥ २०॥ हे मुने! धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी, ज्वार, कोदो, छोटी मटर, उड़द, मूँग, मसूर, बड़ी मटर, कुलथी, राई, चना और सन—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकारकी मिलाकर कुल चौदह ओषधियाँ याज्ञिक हैं।


१- रसोल्लासादि अष्ट-सिद्धियोंका वर्णन स्कन्दपुराणमें इस प्रकार किया है—
रसस्य स्वत एवान्तरुल्लासः स्यात्कृते युगे। रसोल्लासाख्यिका सिद्धिस्तया हन्ति क्षुधं नरः॥
स्त्र्यादीनां नैरपेक्ष्येण सदा तृप्ता प्रजास्तथा। द्वितीया सिद्धिरुद्दिष्टा सा तृप्तिर्मु निसत्तमैः॥
धर्मोत्तमश्च योऽस्त्यासां सा तृतीयाऽभिधीयते। चतुर्थी तुल्यता तासामायुषः सुखरूपयोः॥
ऐकान्त्यबलबाहुल्यं विशोका नाम पञ्चमी। परमात्मपरत्वेन तपोध्यानादिनिष्ठिता॥
षष्ठी च कामचारित्वं सप्तमी सिद्धिरुच्यते। अष्टमी च तथा प्रोक्ता यत्रक्वचनशायिता॥

**अर्थ—**सत्ययुगमें रसका स्वयं ही उल्लास होता था। यही रसोल्लास नामकी सिद्धि है, उसके प्रभावसे मनुष्य भूखको नष्ट कर देता है। उस समय प्रजा स्त्री आदि भोगोंकी अपेक्षाके बिना ही सदा तृप्त रहती थी; इसीको मुनिश्रेष्ठोंने 'तृप्ति' नामक दूसरी सिद्धि कहा है। उनका जो उत्तम धर्म था वही उनकी तीसरी सिद्धि कही जाती है। उस समय सम्पूर्ण प्रजाके रूप और आयु एक-से थे, यही उनकी चौथी सिद्धि थी। बलकी ऐकान्तिकी अधिकता—यह 'विशोका' नामकी पाँचवीं सिद्धि है। परमात्मपरायण रहते हुए तप-ध्यानादिमें तत्पर रहना छठी सिद्धि है। स्वेच्छानुसार विचरना सातवीं सिद्धि कही जाती है तथा जहाँ-तहाँ मनकी मौज पड़े रहना आठवीं सिद्धि कही गयी है।

२- पहाड़ या नदीके तटपर बसे हुए छोटे-छोटे टोलोंको 'खर्वट' कहते हैं।