भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

२८ । श्रीविष्णुपुराण । [ अ० ६


व्रीहयस्सयवा माषा गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।<br>प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः ॥ २४<br>श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः।<br>तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मर्कटका मुने ॥ २५<br>ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश।<br>यज्ञनिष्पत्तये यज्ञस्तथासां हेतुरुत्तमः ॥ २६<br>एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम्।<br>परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥ २७<br>अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां मुनिसत्तम।<br>उपकारकं पुंसां क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥ २८<br>येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।<br>चेतःसु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम् ॥ २९<br>वेदवादांस्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यासेधकारिणः ॥ ३०<br>प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दकाः।<br>दुरात्मानो दुराचारा बभूवुः कुटिलाशयाः ॥ ३१<br>संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजाः सृष्टा प्रजापतिः।<br>मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥ ३२<br>वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतां वर।<br>लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥ ३३<br>प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ३४<br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ३५<br>अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ ३६<br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३७<br>योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम् ॥ ३८<br>एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनश्च ये।<br>तेषां तु परमं स्थानं यत्तत्पश्यन्ति सूरयः ॥ ३९उनके नाम ये हैं—धान, जौ, उड़द, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी और कुलथी—ये आठ तथा श्यामाक (समाँ), नीबार, वनतिल, गवेधु, वेणुयव और मर्कट (मक्का) ॥ २१–२५ ॥ ये चौदह ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ यज्ञानुष्ठानकी सामग्री हैं और यज्ञ इनकी उत्पत्तिका प्रधान हेतु है॥ २६॥ यज्ञोंके सहित ये ओषधियाँ प्रजाकी वृद्धिका परम कारण हैं इसलिये इहलोक-परलोकके ज्ञाता पुरुष यज्ञोंका अनुष्ठान किया करते हैं॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! नित्यप्रति किया जानेवाला यज्ञानुष्ठान मनुष्योंका परम उपकारक और उनके किये हुए पापोंको शान्त करनेवाला है॥ २८ ॥<br><br>हे महामुने ! जिनके चित्तमें कालकी गतिसे पापका बीज बढ़ता है उन्हीं लोगोंका चित्त यज्ञमें प्रवृत्त नहीं होता ॥ २९ ॥ उन यज्ञके विरोधियोंने वैदिक मत, वेद और यज्ञादि कर्म—सभीकी निन्दा की है॥ ३०॥ वे लोग दुरात्मा, दुराचारी, कुटिलमति, वेद-निन्दक और प्रवृत्तिमार्गका उच्छेद करनेवाले ही थे ॥ ३१॥<br><br>हे धर्मवानोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! इस प्रकार कृषि आदि जीविकाके साधनोंके निश्चित हो जानेपर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रजाकी रचना कर उनके स्थान और गुणोंके अनुसार मर्यादा, वर्ण और आश्रमोंके धर्म तथा अपने धर्मका भली प्रकार पालन करनेवाले समस्त वर्णोंके लोक आदिकी स्थापना की ॥ ३२-३३॥ कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक है, युद्ध-क्षेत्रसे कभी न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक है॥ ३४॥ तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्योंका वायुलोक और सेवाधर्मपरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक है ॥ ३५ ॥ अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि हैं; उनका जो स्थान बताया गया है वही गुरुकुलवासी ब्रह्मचारियोंका स्थान है॥ ३६ ॥ इसी प्रकार वनवासी वानप्रस्थोंका स्थान सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और संन्यासियोंका ब्रह्मलोक है तथा आत्मानुभवसे तृप्त योगियोंका स्थान अमरपद (मोक्ष) है॥ ३७-३८ ॥ जो निरन्तर एकान्तसेवी और ब्रह्मचिन्तनमें मग्न रहनेवाले योगिजन हैं उनका जो परमस्थान है उसे पण्डितजन ही देख पाते हैं ॥ ३९ ॥