विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ७ ] * प्रथम अंश * २९
| गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।<br>अद्यापि न निवर्त्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ ४०<br>तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम्॥ ४१<br>विनिन्दकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्।<br>स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये॥ ४२ | चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह भी अपने-अपने लोकोंमें जाकर फिर लौट आते हैं, किन्तु द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का चिन्तन करनेवाले अभीतक मोक्षपदसे नहीं लौटे॥ ४०॥ तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, घोर, कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदोंकी निन्दा और यज्ञोंका उच्छेद करनेवाले तथा स्वधर्म-विमुख पुरुषोंके स्थान कहे गये हैं॥ ४१-४२॥ |
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इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच<br>ततोऽभिध्यायंतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः।<br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १<br>ते सर्वे समवर्त्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः।<br>देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषये स्थिताः॥ २<br>एवंभूतानि सृष्टानि चराणि स्थावराणि च॥ ३ | श्रीपराशरजी बोले— फिर उन प्रजापतिके ध्यान करनेपर उनके देहस्वरूप भूतोंसे उत्पन्न हुए शरीर और इन्द्रियोंके सहित मानस प्रजा उत्पन्न हुई। उस समय मतिमान् ब्रह्माजीके जड शरीरसे ही चेतन जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ॥ १॥ मैंने पहले जिनका वर्णन किया है, देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त वे सभी त्रिगुणात्मक चर और अचर जीव इसी प्रकार उत्पन्न हुए॥ २-३॥ |
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| यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः।<br>अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ ४<br>भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा।<br>मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान्॥ ५<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ ६ | जब महाबुद्धिमान् प्रजापतिकी वह प्रजा पुत्र-पौत्रादि-क्रमसे और न बढ़ी तब उन्होंने भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—इन अपने ही सदृश अन्य मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं॥ ४—६॥ |
| ख्यातिं भूतिं च सम्भूतिं क्षमां प्रीतिं तथैव च।<br>सन्नतिं च तथैवोर्ज्रामनसूयां तथैव च॥ ७<br>प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा ददौ तेषां महात्मनाम्।<br>पत्न्यो भवध्वमित्युक्त्वा तेषामेव तु दत्तवान्॥ ८ | फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्ज्जा, अनसूया तथा प्रसूति इन नौ कन्याओंको उत्पन्न कर, इन्हें उन महात्माओंको 'तुम इनकी पत्नी हो' ऐसा कहकर सौंप दिया॥ ७-८॥ |
| सनन्दनादयो ये च पूर्वसृष्टास्तु वेधसा।<br>न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षाः प्रजासु ते॥ ९<br>सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः।<br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः॥ १० | ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दनादिको उत्पन्न किया था वे निरपेक्ष होनेके कारण सन्तान और संसार आदिमें प्रवृत्त नहीं हुए॥ ९॥ वे सभी ज्ञानसम्पन्न, विरक्त और मत्सरादि दोषोंसे रहित थे। उन महात्माओंको संसार-रचनासे |