विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ६ ] * प्रथम अंश * २७
अधर्मबीजसमुद्भूतं तमोलोभसमुद्भवम्।
प्रजासु तासु मैत्रेय रागादिकमसाधकम्॥ १५
ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रसोल्लासादयश्चान्याः सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति याः॥ १६
तासु क्षीणास्वशेषासु वर्द्धमाने च पातके।
द्वन्द्वाभिभवदुःखार्त्तास्ता भवन्ति ततः प्रजाः॥ १७
ततो दुर्गाणि ताश्चक्रुर्धान्वं पार्वतमौदकम्।
कृत्रिमं च तथा दुर्गं पुरखर्वटकादिकम्॥ १८
गृहाणि च यथान्यायं तेषु चक्रुः पुरादिषु।
शीतातपादिबाधानां प्रशमाय महामते॥ १९
प्रतीकारमिमं कृत्वा शीतादेस्ताः प्रजाः पुनः।
वार्त्तोपायं ततश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्॥ २०
व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।
प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सतीनकाः॥ २१
माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुल्त्थकाः।
आढक्यश्चणकाश्चैव शणाः सप्तदश स्मृताः॥ २२
इत्येता ओषधीनां तु ग्राम्याणां जातयो मुने।
ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश॥ २३
हिन्दी अनुवाद:
हे मैत्रेय! उससे प्रजामें पुरुषार्थका विघातक तथा अज्ञान और लोभको उत्पन्न करनेवाला रागादिरूप अधर्मका बीज उत्पन्न हो जाता है॥ १५॥ तभीसे उसे वह विष्णु-पद-प्राप्ति-रूप स्वाभाविक सिद्धि और रसोल्लास आदि अन्य अष्ट सिद्धियाँ १ नहीं मिलतीं॥ १६॥
उन समस्त सिद्धियोंके क्षीण हो जाने और पापके बढ़ जानेसे फिर सम्पूर्ण प्रजा द्वन्द्व, ह्रास और दुःखसे आतुर हो गयी॥ १७॥ तब उसने मरुभूमि, पर्वत और जल आदिके स्वाभाविक तथा कृत्रिम दुर्ग और पुर तथा खर्वट२ आदि स्थापित किये॥ १८॥ हे महामते! उन पुर आदिकोंमें शीत और घाम आदि बाधाओंसे बचनेके लिये उसने यथायोग्य घर बनाये॥ १९॥
इस प्रकार शीतोष्णादिसे बचनेका उपाय करके उस प्रजाने जीविकाके साधनरूप कृषि तथा कला-कौशल आदिकी रचना की॥ २०॥ हे मुने! धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी, ज्वार, कोदो, छोटी मटर, उड़द, मूँग, मसूर, बड़ी मटर, कुलथी, राई, चना और सन—ये सत्रह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। ग्राम्य और वन्य दोनों प्रकारकी मिलाकर कुल चौदह ओषधियाँ याज्ञिक हैं।
१- रसोल्लासादि अष्ट-सिद्धियोंका वर्णन स्कन्दपुराणमें इस प्रकार किया है—
रसस्य स्वत एवान्तरुल्लासः स्यात्कृते युगे। रसोल्लासाख्यिका सिद्धिस्तया हन्ति क्षुधं नरः॥
स्त्र्यादीनां नैरपेक्ष्येण सदा तृप्ता प्रजास्तथा। द्वितीया सिद्धिरुद्दिष्टा सा तृप्तिर्मु निसत्तमैः॥
धर्मोत्तमश्च योऽस्त्यासां सा तृतीयाऽभिधीयते। चतुर्थी तुल्यता तासामायुषः सुखरूपयोः॥
ऐकान्त्यबलबाहुल्यं विशोका नाम पञ्चमी। परमात्मपरत्वेन तपोध्यानादिनिष्ठिता॥
षष्ठी च कामचारित्वं सप्तमी सिद्धिरुच्यते। अष्टमी च तथा प्रोक्ता यत्रक्वचनशायिता॥
**अर्थ—**सत्ययुगमें रसका स्वयं ही उल्लास होता था। यही रसोल्लास नामकी सिद्धि है, उसके प्रभावसे मनुष्य भूखको नष्ट कर देता है। उस समय प्रजा स्त्री आदि भोगोंकी अपेक्षाके बिना ही सदा तृप्त रहती थी; इसीको मुनिश्रेष्ठोंने 'तृप्ति' नामक दूसरी सिद्धि कहा है। उनका जो उत्तम धर्म था वही उनकी तीसरी सिद्धि कही जाती है। उस समय सम्पूर्ण प्रजाके रूप और आयु एक-से थे, यही उनकी चौथी सिद्धि थी। बलकी ऐकान्तिकी अधिकता—यह 'विशोका' नामकी पाँचवीं सिद्धि है। परमात्मपरायण रहते हुए तप-ध्यानादिमें तत्पर रहना छठी सिद्धि है। स्वेच्छानुसार विचरना सातवीं सिद्धि कही जाती है तथा जहाँ-तहाँ मनकी मौज पड़े रहना आठवीं सिद्धि कही गयी है।
२- पहाड़ या नदीके तटपर बसे हुए छोटे-छोटे टोलोंको 'खर्वट' कहते हैं।
२८ । श्रीविष्णुपुराण । [ अ० ६
| व्रीहयस्सयवा माषा गोधूमाश्चाणवस्तिलाः।<br>प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः ॥ २४<br>श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः।<br>तथा वेणुयवाः प्रोक्तास्तथा मर्कटका मुने ॥ २५<br>ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश।<br>यज्ञनिष्पत्तये यज्ञस्तथासां हेतुरुत्तमः ॥ २६<br>एताश्च सह यज्ञेन प्रजानां कारणं परम्।<br>परावरविदः प्राज्ञास्ततो यज्ञान्वितन्वते ॥ २७<br>अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां मुनिसत्तम।<br>उपकारकं पुंसां क्रियमाणाघशान्तिदम् ॥ २८<br>येषां तु कालसृष्टोऽसौ पापबिन्दुर्महामुने।<br>चेतःसु ववृधे चक्रुस्ते न यज्ञेषु मानसम् ॥ २९<br>वेदवादांस्तथा वेदान्यज्ञकर्मादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं निन्दयामासुर्यज्ञव्यासेधकारिणः ॥ ३०<br>प्रवृत्तिमार्गव्युच्छित्तिकारिणो वेदनिन्दकाः।<br>दुरात्मानो दुराचारा बभूवुः कुटिलाशयाः ॥ ३१<br>संसिद्धायां तु वार्तायां प्रजाः सृष्टा प्रजापतिः।<br>मर्यादां स्थापयामास यथास्थानं यथागुणम् ॥ ३२<br>वर्णानामाश्रमाणां च धर्मान्धर्मभृतां वर।<br>लोकांश्च सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ॥ ३३<br>प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ३४<br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ३५<br>अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ ३६<br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ३७<br>योगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम् ॥ ३८<br>एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनश्च ये।<br>तेषां तु परमं स्थानं यत्तत्पश्यन्ति सूरयः ॥ ३९ | उनके नाम ये हैं—धान, जौ, उड़द, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, काँगनी और कुलथी—ये आठ तथा श्यामाक (समाँ), नीबार, वनतिल, गवेधु, वेणुयव और मर्कट (मक्का) ॥ २१–२५ ॥ ये चौदह ग्राम्य और वन्य ओषधियाँ यज्ञानुष्ठानकी सामग्री हैं और यज्ञ इनकी उत्पत्तिका प्रधान हेतु है॥ २६॥ यज्ञोंके सहित ये ओषधियाँ प्रजाकी वृद्धिका परम कारण हैं इसलिये इहलोक-परलोकके ज्ञाता पुरुष यज्ञोंका अनुष्ठान किया करते हैं॥ २७ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! नित्यप्रति किया जानेवाला यज्ञानुष्ठान मनुष्योंका परम उपकारक और उनके किये हुए पापोंको शान्त करनेवाला है॥ २८ ॥<br><br>हे महामुने ! जिनके चित्तमें कालकी गतिसे पापका बीज बढ़ता है उन्हीं लोगोंका चित्त यज्ञमें प्रवृत्त नहीं होता ॥ २९ ॥ उन यज्ञके विरोधियोंने वैदिक मत, वेद और यज्ञादि कर्म—सभीकी निन्दा की है॥ ३०॥ वे लोग दुरात्मा, दुराचारी, कुटिलमति, वेद-निन्दक और प्रवृत्तिमार्गका उच्छेद करनेवाले ही थे ॥ ३१॥<br><br>हे धर्मवानोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! इस प्रकार कृषि आदि जीविकाके साधनोंके निश्चित हो जानेपर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रजाकी रचना कर उनके स्थान और गुणोंके अनुसार मर्यादा, वर्ण और आश्रमोंके धर्म तथा अपने धर्मका भली प्रकार पालन करनेवाले समस्त वर्णोंके लोक आदिकी स्थापना की ॥ ३२-३३॥ कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंका स्थान पितृलोक है, युद्ध-क्षेत्रसे कभी न हटनेवाले क्षत्रियोंका इन्द्रलोक है॥ ३४॥ तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्योंका वायुलोक और सेवाधर्मपरायण शूद्रोंका गन्धर्वलोक है ॥ ३५ ॥ अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि हैं; उनका जो स्थान बताया गया है वही गुरुकुलवासी ब्रह्मचारियोंका स्थान है॥ ३६ ॥ इसी प्रकार वनवासी वानप्रस्थोंका स्थान सप्तर्षिलोक, गृहस्थोंका पितृलोक और संन्यासियोंका ब्रह्मलोक है तथा आत्मानुभवसे तृप्त योगियोंका स्थान अमरपद (मोक्ष) है॥ ३७-३८ ॥ जो निरन्तर एकान्तसेवी और ब्रह्मचिन्तनमें मग्न रहनेवाले योगिजन हैं उनका जो परमस्थान है उसे पण्डितजन ही देख पाते हैं ॥ ३९ ॥ |
अ० ७ ] * प्रथम अंश * २९
| गत्वा गत्वा निवर्त्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।<br>अद्यापि न निवर्त्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ ४०<br>तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम्॥ ४१<br>विनिन्दकानां वेदस्य यज्ञव्याघातकारिणाम्।<br>स्थानमेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये॥ ४२ | चन्द्र और सूर्य आदि ग्रह भी अपने-अपने लोकोंमें जाकर फिर लौट आते हैं, किन्तु द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का चिन्तन करनेवाले अभीतक मोक्षपदसे नहीं लौटे॥ ४०॥ तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असिपत्रवन, घोर, कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदोंकी निन्दा और यज्ञोंका उच्छेद करनेवाले तथा स्वधर्म-विमुख पुरुषोंके स्थान कहे गये हैं॥ ४१-४२॥ |
|---|
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच<br>ततोऽभिध्यायंतस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः।<br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्त्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १<br>ते सर्वे समवर्त्तन्त ये मया प्रागुदाहृताः।<br>देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषये स्थिताः॥ २<br>एवंभूतानि सृष्टानि चराणि स्थावराणि च॥ ३ | श्रीपराशरजी बोले— फिर उन प्रजापतिके ध्यान करनेपर उनके देहस्वरूप भूतोंसे उत्पन्न हुए शरीर और इन्द्रियोंके सहित मानस प्रजा उत्पन्न हुई। उस समय मतिमान् ब्रह्माजीके जड शरीरसे ही चेतन जीवोंका प्रादुर्भाव हुआ॥ १॥ मैंने पहले जिनका वर्णन किया है, देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त वे सभी त्रिगुणात्मक चर और अचर जीव इसी प्रकार उत्पन्न हुए॥ २-३॥ |
|---|---|
| यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः।<br>अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ ४<br>भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसं तथा।<br>मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसान्॥ ५<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ ६ | जब महाबुद्धिमान् प्रजापतिकी वह प्रजा पुत्र-पौत्रादि-क्रमसे और न बढ़ी तब उन्होंने भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—इन अपने ही सदृश अन्य मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं॥ ४—६॥ |
| ख्यातिं भूतिं च सम्भूतिं क्षमां प्रीतिं तथैव च।<br>सन्नतिं च तथैवोर्ज्रामनसूयां तथैव च॥ ७<br>प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा ददौ तेषां महात्मनाम्।<br>पत्न्यो भवध्वमित्युक्त्वा तेषामेव तु दत्तवान्॥ ८ | फिर ख्याति, भूति, सम्भूति, क्षमा, प्रीति, सन्नति, ऊर्ज्जा, अनसूया तथा प्रसूति इन नौ कन्याओंको उत्पन्न कर, इन्हें उन महात्माओंको 'तुम इनकी पत्नी हो' ऐसा कहकर सौंप दिया॥ ७-८॥ |
| सनन्दनादयो ये च पूर्वसृष्टास्तु वेधसा।<br>न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षाः प्रजासु ते॥ ९<br>सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः।<br>तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः॥ १० | ब्रह्माजीने पहले जिन सनन्दनादिको उत्पन्न किया था वे निरपेक्ष होनेके कारण सन्तान और संसार आदिमें प्रवृत्त नहीं हुए॥ ९॥ वे सभी ज्ञानसम्पन्न, विरक्त और मत्सरादि दोषोंसे रहित थे। उन महात्माओंको संसार-रचनासे |
| ३० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणोऽभून्महान् क्रोधस्त्रैलोक्यदहनक्षमः।<br>तस्य क्रोधात्समुद्भूतज्वालामालातिदीपितम्।<br>ब्रह्मणोऽभूत्तदा सर्वं त्रैलोक्यमखिलं मुने॥ ११ | ब्रह्माजीको त्रिलोकीको भस्म कर देनेवाला महान् क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुने! उन ब्रह्माजीके क्रोधके कारण सम्पूर्ण त्रिलोकी ज्वाला-मालाओंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो गयी॥ १०-११॥ |
| भ्रुकुटीकुटिलात्तस्य ललाटात्क्रोधदीपितात्।<br>समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नार्कसमप्रभः॥ १२ | उस समय उनकी टेढ़ी भृकुटि और क्रोध-सन्तप्त ललाटसे दोपहरके सूर्यके समान प्रकाशमान रुद्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२॥ |
| अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्।<br>विभजात्मानमित्युक्त्वा तं ब्रह्मान्तर्दधे ततः॥ १३ | उसका अति प्रचण्ड शरीर आधा नर और आधा नारीरूप था। तब ब्रह्माजी 'अपने शरीरका विभाग कर' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ १३॥ |
| तथोक्तोऽसौ द्विधा स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाऽकरोत्।<br>विभेदपुरुषत्वं च दशधा चैकधा पुनः॥ १४ | ऐसा कहे जानेपर उस रुद्रने अपने शरीरस्थ स्त्री और पुरुष दोनों भागोंको अलग-अलग कर दिया और फिर पुरुष-भागको ग्यारह भागोंमें विभक्त किया॥ १४॥ |
| सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ताऽशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः।<br>विभेद बहुधा देवः स्वरूपैरसितैः सितैः॥ १५ | तथा स्त्री-भागको भी सौम्य, क्रूर, शान्त-अशान्त और श्याम-गौर आदि कई रूपोंमें विभक्त कर दिया॥ १५॥ |
| ततो ब्रह्माऽऽत्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः।<br>आत्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनुं द्विज॥ १६ | तदनन्तर, हे द्विज! अपनेसे उत्पन्न अपने ही स्वरूप स्वायम्भुवको ब्रह्माजीने प्रजा-पालनके लिये प्रथम मनु बनाया॥ १६॥ |
| शतरूपां च तां नारीं तपोनिर्धूतकल्मषाम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्देवः पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः॥ १७ | उन स्वायम्भुव मनुने [अपने ही साथ उत्पन्न हुई] तपके कारण निष्पाप शतरूपा नामकी स्त्रीको अपनी पत्नीरूपसे ग्रहण किया॥ १७॥ |
| तस्मात्तु पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत।<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतिसंज्ञितम्॥ १८ | हे धर्मज्ञ! उन स्वायम्भुव मनुसे शतरूपा देवीने प्रियव्रत और उत्तानपादनामक दो पुत्र |
| कन्याद्वयं च धर्मज्ञ रूपौदार्यगुणान्वितम्।<br>ददौ प्रसूतिं दक्षाय आकूतिं रुचये पुरा॥ १९ | तथा उदार, रूप और गुणोंसे सम्पन्न प्रसूति और आकूति नामकी दो कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे प्रसूतिको दक्षके साथ तथा आकूतिको रुचि प्रजापतिके साथ विवाह दिया॥ १८-१९॥ |
| प्रजापतिः स जग्राह तयोर्जज्ञे सदक्षिणः।<br>पुत्रो यज्ञो महाभाग दम्पत्योर्मिथुनं ततः॥ २० | हे महाभाग! रुचि प्रजापतिने उसे ग्रहण कर लिया। तब उन दम्पतीके यज्ञ और दक्षिणा—ये युगल (जुड़वाँ) सन्तान उत्पन्न हुईं॥ २०॥ |
| यज्ञस्य दक्षिणायां तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे।<br>यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवे मनौ॥ २१ | यज्ञके दक्षिणासे बारह पुत्र हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तरमें याम नामके देवता कहलाये॥ २१॥ |
| प्रसूत्यां च तथा दक्षश्चतस्रो विंशतिस्तथा।<br>ससर्ज कन्यास्तासां च सम्यङ् नामानि मे शृणु॥ २२ | तथा दक्षने प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। मुझसे उनके शुभ नाम सुनो॥ २२॥ |
| श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिर्मेधा पुष्टिस्तथा क्रिया।<br>बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी॥ २३ | श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मेधा, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और तेरहवीं कीर्ति—इन दक्ष-कन्याओंको धर्मने पत्नीरूपसे ग्रहण किया। |
| पत्न्यर्थं प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः।<br>ताभ्यः शिष्टाः यवीयस्य एकादश सुलोचनाः॥ २४ | इनसे छोटी शेष ग्यारह कन्याएँ |
| ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा।<br>सन्ततिश्चानसूया च ऊर्ज्जा स्वाहा स्वधा तथा॥ २५ | ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्तति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा थीं॥ २३—२५॥ |
| भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः।<br>पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा॥ २६ | हे मुनिसत्तम! इन ख्याति आदि कन्याओंको क्रमशः भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य, |
अ० ७] * प्रथम अंश * ३१
| अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम्।<br>ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तम ॥ २७<br>श्रद्धा कामं चला दर्पं नियमं धृतिरात्मजम्।<br>सन्तोषं च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरसूत ॥ २८<br>मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेव च ॥ २९<br>बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम्।<br>व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत ॥ ३०<br>सुखं सिद्धिर्र्यशः कीर्त्तिरित्येते धर्मसूनवः।<br>कामाद्रतिः सुतं हर्षं धर्मपौत्रमसूत ॥ ३१<br>हिंसा भार्या त्वधर्मस्य ततो जज्ञे तथानृतम्।<br>कन्या च निकृतिस्ताभ्यां भयं नरकमेव च ॥ ३२<br>माया च वेदना चैव मिथुनं त्विदमेतयोः।<br>तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ ३३<br>वेदना स्वसुतं चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात्।<br>मृत्योर्व्याधिजराशोक तृष्णाक्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ ३४<br>दुःखोत्तराः स्मृता ह्येते सर्वे चाधर्मलक्षणाः।<br>नैषां पुत्रोऽस्ति वै भार्या ते सर्वे ह्यूर्ध्वरेतसः॥ ३५<br>रौद्राण्येतानि रूपाणि विष्णोर्मुनिवरात्मज।<br>नित्यप्रलयहेतुत्वं जगतोऽस्य प्रयान्ति वै॥ ३६<br>दक्षो मरीचिरत्रिश्च भृग्वाद्याश्च प्रजेश्वराः।<br>जगत्यत्र महाभाग नित्यसर्गस्य हेतवः ॥ ३७<br>मनवो मनुपुत्राश्च भूपा वीर्यधराश्च ये।<br>सन्मार्गनिरताः शूरास्ते सर्वे स्थितिकारिणः ॥ ३८<br>श्रीमैत्रेय उवाच<br>येयं नित्या स्थितिर्ब्रह्मन्नित्यसर्गस्तथेरितः।<br>नित्याभावश्च तेषां वै स्वरूपं मम कथ्यताम् ॥ ३९<br>श्रीपराशर उवाच<br>सर्गस्थितिविनाशांश्च भगवान्मधुसूदनः।<br>तैस्तै रूपैरचिन्त्यात्मा करोत्यव्याहतो विभुः ॥ ४०<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विज।<br>नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥ ४१ | पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ—इन मुनियों तथा अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया॥ २६-२७॥<br>श्रद्धासे काम, चला (लक्ष्मी) से दर्प, धृतिसे नियम, तुष्टिसे सन्तोष और पुष्टिसे लोभकी उत्पत्ति हुई॥ २८॥ तथा मेधासे श्रुत, क्रियासे दण्ड, नय और विनय, बुद्धिसे बोध, लज्जासे विनय, वपुसे उसका पुत्र व्यवसाय, शान्तिसे क्षेम, सिद्धिसे सुख और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ; ये ही धर्मके पुत्र हैं। रतिने कामसे धर्मके पौत्र हर्षको उत्पन्न किया॥ २९—३१॥<br>अधर्मकी स्त्री हिंसा थी, उससे अनृत नामक पुत्र और निकृति नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उन दोनोंसे भय और नरक नामके पुत्र तथा उनकी पत्नियां माया और वेदना नामकी कन्याएँ हुईं। उनमेंसे मायाने समस्त प्राणियोंका संहारकर्ता मृत्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ ३२-३३॥ वेदनाने भी रौरव (नरक)-के द्वारा अपने पुत्र दुःखको जन्म दिया और मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोधकी उत्पत्ति हुई ॥ ३४॥ ये सब अधर्मरूप हैं और 'दुःखोत्तर' नामसे प्रसिद्ध हैं, [क्योंकि इनसे परिणाममें दुःख ही प्राप्त होता है] इनके न कोई स्त्री है और न सन्तान। ये सब ऊर्ध्वरेता हैं॥ ३५॥ हे मुनिकुमार! ये भगवान् विष्णुके बड़े भयंकर रूप हैं और ये ही संसारके नित्य-प्रलयके कारण होते हैं॥ ३६॥ हे महाभाग! दक्ष, मरीचि, अत्रि और भृगु आदि प्रजापतिगण इस जगत्के नित्य-सर्गके कारण हैं॥ ३७॥ तथा मनु और मनुके पराक्रमी, सन्मार्गपरायण और शूर-वीर पुत्र राजागण इस संसारकी नित्य-स्थितिके कारण हैं॥ ३८॥<br>श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! आपने जो नित्य-स्थिति, नित्य-सर्ग और नित्य-प्रलयका उल्लेख किया सो कृपा करके मुझसे इनका स्वरूप वर्णन कीजिये॥ ३९॥<br>श्रीपराशरजी बोले—जिनकी गति कहीं नहीं रुकती वे अचिन्त्यात्मा सर्वव्यापक भगवान् मधुसूदन निरन्तर इन मनु आदि रूपोंसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश करते रहते हैं॥४०॥ हे द्विज! समस्त भूतोंका चार प्रकारका प्रलय है—नैमित्तिक, प्राकृतिक, आत्यन्तिक और नित्य॥ ४१ ॥ |
३२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ८
ब्राह्मो नैमित्तिकस्तत्र शेतेऽयं जगतीपतिः।
प्रयाति प्राकृते चैव ब्रह्माण्डं प्रकृतौ लयम्॥ ४२
ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।
नित्यः सदैव भूतानां यो विनाशो दिवानिशम्॥ ४३
प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु सा सृष्टिः प्राकृता स्मृता।
दैनन्दिनी तथा प्रोक्ता यान्तरप्रलयादनु॥ ४४
भूतान्यनुदिनं यत्र जायन्ते मुनिसत्तम।
नित्यसर्गो हि स प्रोक्तः पुराणार्थविचक्षणैः॥ ४५
एवं सर्वशरीरेषु भगवान्भूतभावनः।
संस्थितः कुरुते विष्णुरुत्पत्तिस्थितिसंयमान्॥ ४६
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तयः सर्वदेहिषु।
वैष्णव्यः परिवर्त्तन्ते मैत्रेयाहर्निशं समाः॥ ४७
गुणत्रयमयं ह्येतद्ब्रह्मन् शक्तित्रयं महत्।
योऽतियाति स यात्येव परं नावत्तंते पुनः॥ ४८
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमंशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
उनमेंसे नैमित्तिक प्रलय ही ब्राह्म-प्रलय है, जिसमें जगत्पति ब्रह्माजी कल्पान्तमें शयन करते हैं; तथा प्राकृतिक प्रलयमें ब्रह्माण्ड प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ४२॥ ज्ञानके द्वारा योगीका परमात्मामें लीन हो जाना आत्यन्तिक प्रलय है और रात-दिन जो भूतोंका क्षय होता है वही नित्य-प्रलय है॥ ४३॥ प्रकृतिसे महत्तत्वादिक्रमसे जो सृष्टि होती है वह प्राकृतिक सृष्टि कहलाती है और अवान्तर-प्रलयके अनन्तर जो [ब्रह्माके द्वारा] चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है वह दैनन्दिनी सृष्टि कही जाती है॥ ४४॥ और हे मुनिश्रेष्ठ! जिसमें प्रतिदिन प्राणियोंकी उत्पत्ति होती रहती है उसे पुराणार्थमें कुशल महानुभावोंने नित्य-सृष्टि कहा है॥ ४५॥
इस प्रकार समस्त शरीरमें स्थित भूतभावन भगवान् विष्णु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते रहते हैं॥ ४६॥ हे मैत्रेय! सृष्टि, स्थिति और विनाशकी इन वैष्णवी शक्तियोंका समस्त शरीरोंमें समान भावसे अहर्निश संचार होता रहता है॥ ४७॥ हे ब्रह्मन्! ये तीनों महती शक्तियाँ त्रिगुणमयी हैं; अतः जो उन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है वह परमपदको ही प्राप्त कर लेता है, फिर जन्म-मरणादिके चक्रमें नहीं पड़ता॥ ४८॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन
श्रीपराशर उवाच
कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्ते महामुने।
रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे महामुने! मैंने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका वर्णन किया, अब मैं रुद्र-सर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो॥ १॥
कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः।
प्रादुरासीत्प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ २
कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहित वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ॥ २॥
रुरोद सुस्वरं सोऽथ प्राद्रवद्विजसत्तम।
किं त्वं रोदिषि तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह॥ ३
हे द्विजोत्तम! जन्मके अनन्तर ही वह जोर-जोरसे रोने और इधर-उधर दौड़ने लगा। उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे पूछा—"तू क्यों रोता है?"॥ ३॥
नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिः।
रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि मा रोदीर्धैर्यमावह।
एवमुक्तः पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै॥ ४
उसने कहा—"मेरा नाम रखो।" तब ब्रह्माजी बोले—'हे देव! तेरा नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर।' ऐसा कहनेपर भी वह सात बार और रोया॥ ४॥
जगन्नाथ
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् श्रीविष्णु
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परमेश।
गीताप्रेस, गोरखपुर
लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
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गीताप्रेस, गोरखपुर
अकृरको प्रथम दर्शन
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कालयवन और श्रीकुष्ण
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कंसकी मल्लशालामें श्रीबलराम
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कंसकी मल्लशालामें श्रीकृष्ण
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A vibrant, full-page illustration of Lord Shiva. He is depicted in a powerful, dynamic pose, standing on a rocky, uneven ground. He holds a golden mace (Gada) high above his head with his right hand, and a golden trident (Trishula) with a white tip in his left hand. He is wearing a golden crown (Kiritam) with a red gem, a blue and gold patterned upper garment (Kiritam), and a red and yellow dhoti (Dhoti). He is adorned with various golden jewelry, including necklaces, armlets, and a belt with a heart-shaped pendant. A quiver of arrows is visible on his back. The background is a swirling, colorful sky with shades of blue, yellow, and purple, suggesting a divine or cosmic setting. The overall style is that of a traditional Indian religious painting.
गीताप्रेस, मीरजापुर
श्रीबलरामजीकी लातसे धरती फट गयी
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गीताप्रेस, गोरखपुर
पौण्ड्रकपर श्रीकृष्णाका प्रहार
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अ० ८ ] * प्रथम अंश * ३३
ततोऽन्यानि ददौ तस्मै सप्त नामानि वै प्रभुः । स्थानानि चैषामष्टानां पत्नीः पुत्रांश्च स प्रभुः ॥ ५ भवं शर्वमथेशानं तथा पशुपतिं द्विज । भीममुग्रं महादेवमुवाच स पितामहः ॥ ६ चक्रे नामान्यथैतानि स्थानान्येषां चकार सः । सूर्यो जलं मही वायुर्वह्निराकाशमेव च । दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येतास्तनवः क्रमात् ॥ ७ सुवर्चला तथैवोषा विकेशी चापरा शिवा । स्वाहा दिशस्तथा दीक्षा रोहिणी च यथाक्रमम् ॥ ८ सूर्यादीनां द्विजश्रेष्ठ रुद्राद्यैर्नामभिः सह । पत्न्यः स्मृता महाभाग तदपत्यानि मे शृणु ॥ ९ एषां सूतिप्रसूतिभ्यामिदमापूरितं जगत् ॥ १० शनैश्चरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः । स्कन्दः सर्गोऽथ सन्तानो बुधश्चानुक्रमात्सुताः ॥ ११ एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ सतीं भार्यामनिन्दिताम् । उपयेमे दुहितरं दक्षस्यैव प्रजापतेः ॥ १२ दक्षकोपाच्च तत्याज सा सती स्वकलेवरम् । हिमवद्दुहिता साऽभून्मेनायां द्विजसत्तम ॥ १३ उपयेमे पुनश्चोमामनन्यां भगवान्हरः ॥ १४ देवौ धातुविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूत । श्रियं च देवदेवस्य पत्नी नारायणस्य या ॥ १५
श्रीमैत्रेय उवाच
क्षीराब्धौ श्रीः समुत्पन्ना श्रूयतेऽमृतमन्थने । भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्नेत्येतदाह कथं भवान् ॥ १६
श्रीपराशर उवाच
नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी । यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम ॥ १७ अर्थो विष्णुरियं वाणी नीतिरेषा नयो हरिः । बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धर्मोऽसौ सत्क्रिया त्वियम् ॥ १८ स्रष्टा विष्णुरियं सृष्टिः श्रीर्भूमिर्भूधरो हरिः । सन्तोषो भगवाँल्लक्ष्मीस्तुष्टिर्मैत्रेय शाश्वती ॥ १९ इच्छा श्रीर्भगवान्कामो यज्ञोऽसौ दक्षिणा त्वियम् । आज्याहुतिरसौ देवी पुरोडाशो जनार्दनः ॥ २०
तब भगवान् ब्रह्माजीने उसके सात नाम और रखे; तथा उन आठोंके स्थान, स्त्री और पुत्र भी निश्चित किये ॥ ५ ॥ हे द्विज ! प्रजापतिने उसे भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव कहकर सम्बोधन किया ॥ ६ ॥ यही उसके नाम रखे और इनके स्थान भी निश्चित किये । सूर्य, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश, [यज्ञमें] दीक्षित ब्राह्मण और चन्द्रमा—ये क्रमशः उनकी मूर्तियाँ हैं ॥ ७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! रुद्र आदि नामोंके साथ उन सूर्य आदि मूर्तियोंकी क्रमशः सुवर्चला, ऊषा, विकेशी, अपरा, शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा और रोहिणी नामकी पत्नियाँ हैं । हे महाभाग ! अब उनके पुत्रोंके नाम सुनो; उन्हींके पुत्र-पौत्रादिकोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है ॥ ८–१० ॥ शनैश्चर, शुक्र, लोहितांग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान और बुध—ये क्रमशः उनके पुत्र हैं ॥ ११ ॥ ऐसे भगवान् रुद्रने प्रजापति दक्षकी अनिन्दिता पुत्री सतीको अपनी भार्यारूपसे ग्रहण किया ॥ १२ ॥ हे द्विजसत्तम ! उस सतीने दक्षपर कुपित होनेके कारण अपना शरीर त्याग दिया था । फिर वह मेनाके गर्भसे हिमाचलकी पुत्री (उमा) हुई । भगवान् शंकरने उस अनन्यपरायणा उमासे फिर भी विवाह किया ॥ १३-१४ ॥ भृगुके द्वारा ख्यातिने धाता और विधातानामक दो देवताओंको तथा लक्ष्मीजीको जन्म दिया जो भगवान् विष्णुकी पत्नी हुईं ॥ १५ ॥
श्रीमैत्रेयजी बोले—भगवन् ! सुना जाता है कि लक्ष्मीजी तो अमृत-मन्थनके समय क्षीर-सागरसे उत्पन्न हुई थीं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि वे भृगुके द्वारा ख्यातिसे उत्पन्न हुईं ॥ १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे द्विजोत्तम ! भगवान्का कभी संग न छोड़नेवाली जगज्जननी लक्ष्मीजी तो नित्य ही हैं और जिस प्रकार श्रीविष्णुभगवान् सर्वव्यापक हैं वैसे ही ये भी हैं ॥ १७ ॥ विष्णु अर्थ हैं और ये वाणी हैं, हरि नियम हैं और ये नीति हैं, भगवान् विष्णु बोध हैं और ये बुद्धि हैं तथा वे धर्म हैं और ये सत्क्रिया हैं ॥ १८ ॥ हे मैत्रेय ! भगवान् जगत्के स्रष्टा हैं और लक्ष्मीजी सृष्टि हैं, श्रीहरि भूधर (पर्वत अथवा राजा) हैं और लक्ष्मीजी भूमि हैं तथा भगवान् सन्तोष हैं और लक्ष्मीजी नित्य-तुष्टि हैं ॥ १९ ॥ भगवान् काम हैं और लक्ष्मीजी इच्छा हैं, वे यज्ञ हैं और ये दक्षिणा हैं, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं और देवी लक्ष्मीजी आज्याहुति (घृतकी आहुति) हैं ॥ २० ॥
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३४ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० ८ ---|---|---
| पत्नीशाला मुने लक्ष्मीः प्राग्वंशो मधुसूदनः।<br>चितिर्लक्ष्मीर्हरियूप इध्मः श्रीभगवान्कुशः॥ २१ | हे मुने! मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं, श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं तथा भगवान् कुशा हैं और लक्ष्मीजी इध्मा हैं॥ २१॥ |
| सामस्वरूपी भगवानुद्गीतिः कमलालया।<br>स्वाहा लक्ष्मीर्जगन्नाथो वासुदेवो हुताशनः॥ २२ | भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं, जगत्पति भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी स्वाहा हैं॥ २२॥ |
| शङ्करो भगवाञ्छौरिर्गौरी लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>मैत्रेय केशवः सूर्यस्तत्प्रभा कमलालया॥ २३ | हे द्विजोत्तम! भगवान् विष्णु शंकर हैं और श्रीलक्ष्मीजी गौरी हैं तथा हे मैत्रेय! श्रीकेशव सूर्य हैं और कमलवासिनी श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रभा हैं॥ २३॥ |
| विष्णुः पितृगणः पद्मा स्वधा शाश्वतपुष्टिदा।<br>द्यौः श्रीः सर्वात्मको विष्णुरवकाशोऽतिविस्तरः॥ २४ | श्रीविष्णु पितृगण हैं और श्रीकमला नित्य पुष्टिदायिनी स्वधा हैं, विष्णु अति विस्तीर्ण सर्वात्मक अवकाश हैं और लक्ष्मीजी स्वर्गलोक हैं॥ २४॥ |
| शशाङ्कः श्रीधरः कान्तिः श्रीस्तथैवानपायिनी।<br>धृतिर्लक्ष्मीर्जगच्चेष्टा वायुः सर्वत्रगो हरिः॥ २५ | भगवान् श्रीधर चन्द्रमा हैं और श्रीलक्ष्मीजी उनकी अक्षय कान्ति हैं, हरि सर्वगामी वायु हैं और लक्ष्मीजी जगच्चेष्टा (जगत्की गति) और धृति (आधार) हैं॥ २५॥ |
| जलधिर्द्विज गोविन्दस्तद्वेला श्रीर्महामुने।<br>लक्ष्मीस्वरूपमिन्द्राणी देवेन्द्रो मधुसूदनः॥ २६ | हे महामुने! श्रीगोविन्द समुद्र हैं और हे द्विज! लक्ष्मीजी उसकी तरंग हैं, भगवान् मधुसूदन देवराज इन्द्र हैं और लक्ष्मीजी इन्द्राणी हैं॥ २६॥ |
| यमश्चक्रधरः साक्षाद्धूमोर्णा कमलालया।<br>ऋद्धिः श्रीः श्रीधरो देवः स्वयमेव धनेश्वरः॥ २७ | चक्रपाणि भगवान् यम हैं और श्रीकमला यमपत्नी धूमोर्णा हैं, देवाधिदेव श्रीविष्णु कुबेर हैं और श्रीलक्ष्मीजी साक्षात् ऋद्धि हैं॥ २७॥ |
| गौरी लक्ष्मीर्महाभागा केशवो वरुणः स्वयम्।<br>श्रीर्देवसेना विप्रेन्द्र देवसेनापतिर्हरिः॥ २८ | श्रीकेशव स्वयं वरुण हैं और महाभागा लक्ष्मीजी गौरी हैं, हे द्विजराज! श्रीहरि देवसेनापति स्वामिकार्तिकेय हैं और श्रीलक्ष्मीजी देवसेना हैं॥ २८॥ |
| अवष्टम्भो गदापाणिः शक्तिर्लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>काष्ठा लक्ष्मीर्निमेषोऽसौ मुहूर्त्तोऽसौ कला त्वियम्॥ २९ | हे द्विजोत्तम! भगवान् गदाधर आश्रय हैं और लक्ष्मीजी शक्ति हैं, भगवान् निमेष हैं और लक्ष्मीजी काष्ठा हैं, वे मुहूर्त हैं और ये कला हैं॥ २९॥ |
| ज्योत्स्ना लक्ष्मीः प्रदीपोऽसौ सर्वः सर्वेश्वरो हरिः।<br>लताभूता जगन्माता श्रीविष्णुर्द्रुमसंज्ञितः॥ ३० | सर्वेश्वर सर्वरूप श्रीहरि दीपक हैं और श्रीलक्ष्मीजी ज्योति हैं, श्रीविष्णु वृक्षरूप हैं और जगन्माता श्रीलक्ष्मीजी लता हैं॥ ३०॥ |
| विभावरी श्रीर्दिवसो देवश्चक्रगदाधरः।<br>वरप्रदो वरो विष्णुर्वधूः पद्मवनालया॥ ३१ | चक्रगदाधरदेव श्रीविष्णु दिन हैं और लक्ष्मीजी रात्रि हैं, वरदायक श्रीहरि वर हैं और पद्मनिवासिनी श्रीलक्ष्मीजी वधू हैं॥ ३१॥ |
| नदस्वरूपी भगवाञ्छ्रीनदीरूपसंस्थिता।<br>ध्वजश्च पुण्डरीकाक्षः पताका कमलालया॥ ३२ | भगवान् नद हैं और श्रीजी नदी हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा हैं और कमलालया लक्ष्मीजी पताका हैं॥ ३२॥ |
| तृष्णा लक्ष्मीर्जगन्नाथो लोभो नारायणः परः।<br>रती रागश्च मैत्रेय लक्ष्मीर्गोविन्द एव च॥ ३३ | जगदीश्वर परमात्मा नारायण लोभ हैं और लक्ष्मीजी तृष्णा हैं तथा हे मैत्रेय! रति और राग भी साक्षात् श्रीलक्ष्मी और गोविन्दरूप ही हैं॥ ३३॥ |
| किं चातिबहुनोक्तेन सङ्क्षेपेणेदमुच्यते॥ ३४<br>देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुन्नामा भगवान्हरिः।<br>स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम्॥ ३५ | अधिक क्या कहा जाय? संक्षेपमें, यह कहना चाहिये कि देव, तिर्यक् और मनुष्य आदिमें पुरुषवाची भगवान् हरि हैं और स्त्रीवाची श्रीलक्ष्मीजी, इनके परे और कोई नहीं है॥ ३४-३५॥ |
$$\Rule{60mm}{0.4pt}{0.4pt}$$
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
$$\Rule{30mm}{0.4pt}{0.4pt}$$
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अ० ९] * प्रथम अंश * ३५
नवाँ अध्याय
दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय ! तुमने इस समय मुझसे जिसके विषयमें पूछा है वह श्रीसम्बन्ध (लक्ष्मीजीका इतिहास) मैंने भी मरीचि ऋषिसे सुना था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ, [सावधान होकर] सुनो॥ १॥ एक बार शंकरके अंशावतार श्रीदुर्वासाजी पृथिवीतलमें विचर रहे थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरीके हाथोंमें सन्तानक पुष्पोंकी एक दिव्य माला देखी। हे ब्रह्मन्! उसकी गन्धसे सुवासित होकर वह वन वनवासियोंके लिये अति सेवनीय हो रहा था॥ २-३॥ तब उन उन्मत्तवृत्तिवाले विप्रवरने वह सुन्दर माला देखकर उसे उस विद्याधर-सुन्दरीसे माँगा॥ ४॥ उनके माँगनेपर उस बड़े-बड़े नेत्रोंवाली कृशांगी विद्याधरीने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम कर वह माला दे दी॥ ५॥ |
|---|---|
| इदं च शृणु मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>श्रीसम्बन्धं मयाप्येतच्छ्रुतमासीन्मरीचितः॥ १ | |
| दुर्वासाः शङ्करास्यांशश्चचार पृथिवीमिमाम्।<br>स ददर्श स्त्रजं दिव्यांमृषिर्विद्याधरीकरे॥ २ | |
| सन्तानकानांमखिलं यस्या गन्धेन वासितम्।<br>अतिसेव्यमभूद्ब्रह्मन् तद्वनं वनचारिणाम्॥ ३ | |
| उन्मत्तव्रतधृग्विप्रस्तां दृष्ट्वा शोभनां स्त्रजम्।<br>तां ययाचे वरारोहां विद्याधरवधूं ततः॥ ४ | |
| याचिता तेन तन्वङ्गी मालां विद्याधराङ्गना।<br>ददौ तस्मै विशालाक्षी सादरं प्रणिपत्य तम्॥ ५ | |
| तामादायात्मनो मूर्ध्नि स्त्रजमुन्मत्तरूपधृक्।<br>कृत्वा स विप्रो मैत्रेय परिबभ्राम मेदिनीम्॥ ६ | हे मैत्रेय! उन उन्मत्तवेषधारी विप्रवरने उसे लेकर अपने मस्तकपर डाल लिया और पृथिवीपर विचरने लगे॥ ६॥ इसी समय उन्होंने उन्मत्त ऐरावतपर चढ़कर देवताओंके साथ आते हुए त्रैलोक्याधिपति शचीपति इन्द्रको देखा॥ ७॥ उन्हें देखकर मुनिवर दुर्वासाने उन्मत्तके समान वह मतवाले भौरोंसे गुंजायमान माला अपने सिरपरसे उतारकर देवराज इन्द्रके ऊपर फेंक दी॥ ८॥ देवराजने उसे लेकर ऐरावतके मस्तकपर डाल दी; उस समय वह ऐसी सुशोभित हुई मानो कैलास पर्वतके शिखरपर श्रीगंगाजी विराजमान हों॥ ९॥ उस मदोन्मत्त हाथीने भी उसकी गन्धसे आकर्षित हो उसे सूँडसे सूंघकर पृथिवीपर फेंक दिया॥ १०॥ हे मैत्रेय! यह देखकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् दुर्वासाजी अति क्रोधित हुए और देवराज इन्द्रसे इस प्रकार बोले॥ ११॥ |
| स ददर्श तमायान्तमुन्मत्तैरावते स्थितम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं देवं सह देवैः शचीपतिम्॥ ७ | |
| तामात्मनः स शिरसः स्त्रजमुन्मत्तषट्पदाम्।<br>आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः॥ ८ | |
| गृहीत्वाऽमरराजेन स्त्रगैरावतमूर्द्धनि।<br>न्यस्ता रराज कैलासशिखरे जाह्नवी यथा॥ ९ | |
| मदान्धकारिताक्षोऽसौ गन्धाकृष्टेन वारणः।<br>करेणाघ्राय चिक्षेप तां स्त्रजं धरणीतले॥ १० | |
| ततश्चुक्रोध भगवान्दुर्वासा मुनिसत्तमः।<br>मैत्रेय देवराजं तं क्रुद्धश्चैतदुवाच ह॥ ११ | |
| दुर्वासा उवाच | दुर्वासाजीने कहा—अरे ऐश्वर्यके मदसे दूषितचित्त इन्द्र! तू बड़ा ढीठ है, तूने मेरी दी हुई सम्पूर्ण शोभाकी धाम मालाका कुछ भी आदर नहीं किया!॥ १२॥ अरे ! तूने न तो प्रणाम करके ‘बड़ी कृपा की’ ऐसा ही कहा और न हर्षसे प्रसन्नवदन होकर उसे अपने सिरपर ही रखा॥ १३॥ रे मूढ़! तूने मेरी दी हुई मालाका कुछ भी मूल्य नहीं किया, इसलिये तेरा त्रिलोकीका वैभव नष्ट हो जायगा॥ १४॥ |
| ऐश्वर्यमददुष्टात्मन्नतिस्तब्धोऽसि वासव।<br>श्रीयो धाम स्त्रजं यस्त्वं मदत्तां नाभिनन्दसि॥ १२ | |
| प्रसाद इति नोक्तं ते प्रणिपातपुरःसरम्।<br>हर्षोत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धृता॥ १३ | |
| मया दत्तामिमां मालां यस्मान्न बहु मन्यसे।<br>त्रैलोक्यश्रीरतो मूढ विनाशमुपयास्यति॥ १४ |
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| ३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
|---|
| मां मन्यसे त्वं सदृशं नूनं शक्रेतरद्विजैः।<br>अतोऽवमानमस्मासु मानिना भवता कृतम्॥ १५ | इन्द्र! निश्चय ही तू मुझे और ब्राह्मणोंके समान ही समझता है, इसीलिये तुझ अति मानीने हमारा इस प्रकार अपमान किया है॥ १५॥ |
| मद्दत्ता भवता यस्मात्क्षिप्ता माला महीतले।<br>तस्मात्प्रणष्टलक्ष्मीकं त्रैलोक्यं ते भविष्यति॥ १६ | अच्छा, तूने मेरी दी हुई मालाको पृथिवीपर फेंका है इसलिये तेरा यह त्रिभुवन भी शीघ्र ही श्रीहीन हो जायगा॥ १६॥ |
| यस्य सञ्जातकोपस्य भयमेति चराचरम्।<br>तं त्वं मामतिगर्वेग देवराजावमन्यसे॥ १७ | रे देवराज! जिसके क्रुद्ध होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् भयभीत हो जाता है उस मेरा ही तूने अति गर्वसे इस प्रकार अपमान किया!॥ १७॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| महेन्द्रो वारणस्कन्धादवतीर्य त्वरान्वितः।<br>प्रसादयामास मुनिं दुर्वाससमकल्मषम्॥ १८ | तब तो इन्द्रने तुरन्त ही ऐरावत हाथीसे उतरकर निष्पाप मुनिवर दुर्वासाजीको [अनुनय-विनय करके] प्रसन्न किया॥ १८॥ |
| प्रसाद्यमानः स तदा प्रणिपातपुरःसरम्।<br>इत्युवाच सहस्राक्षं दुर्वासा मुनिसत्तमः॥ १९ | तब उसके प्रणामादि करनेसे प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाजी उससे इस प्रकार कहने लगे॥ १९॥ |
| दुर्वासा उवाच | दुर्वासाजी बोले— |
| नाहं कृपालुहृदयो न च मां भजते क्षमा।<br>अन्ये ते मुनयः शक्र दुर्वाससमवेहि माम्॥ २० | इन्द्र! मैं कृपालु-चित्त नहीं हूँ, मेरे अन्तःकरणमें क्षमाको स्थान नहीं है। वे मुनिजन तो और ही हैं; तुम समझो, मैं तो दुर्वासा हूँ न?॥ २०॥ |
| गौतमादिभिरन्यैस्त्वं गर्वमारोपितो मुधा।<br>अक्षान्तिसारसर्वस्वं दुर्वाससमवेहि माम्॥ २१ | गौतमादि अन्य मुनिजनोंने व्यर्थ ही तुझे इतना मुँह लगा लिया है; पर याद रख, मुझ दुर्वासाका सर्वस्व तो क्षमा न करना ही है॥ २१॥ |
| वसिष्ठाद्यैर्दयासारेःस्तोत्रं कुर्वद्भिरुच्चकैः।<br>गर्वं गतोऽसि येनैवं मामप्यद्यावमन्यसे॥ २२ | दयामूर्ति वसिष्ठ आदिके बढ़-बढ़कर स्तुति करनेसे तू इतना गर्वीला हो गया कि आज मेरा भी अपमान करने चला है॥ २२॥ |
| ज्वलज्जटाकलापस्य भृकुटीकुटिलं मुखम्।<br>निरीक्ष्य कस्त्रिभुवने मम यो न गतो भयम्॥ २३ | अरे! आज त्रिलोकीमें ऐसा कौन है जो मेरे प्रज्वलित जटाकलाप और टेढ़ी भृकुटिको देखकर भयभीत न हो जाय?॥ २३॥ |
| नाहं क्षमिष्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो।<br>विडम्बनामिमां भूयः करोष्यनुनयात्मिकाम्॥ २४ | रे शतक्रतो! तू बारम्बार अनुनय-विनय करनेका ढोंग क्यों करता है? तेरे इस कहने-सुननेसे क्या होगा? मैं क्षमा नहीं कर सकता॥ २४॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।<br>आरुह्यैरावतं ब्रह्मन् प्रययावमरावतीम्॥ २५ | हे ब्रह्मन्! इस प्रकार कह वे विप्रवर वहाँसे चल दिये और इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर अमरावतीको चले गये॥ २५॥ |
| ततः प्रभृति निःश्रीकं सशक्रं भुवनत्रयम्।<br>मैत्रेयासीदपध्वस्तं सङ्क्षीणौषधिवीरुधम्॥ २६ | हे मैत्रेय! तभीसे इन्द्रके सहित तीनों लोक वृक्ष-लता आदिके क्षीण हो जानेसे श्रीहीन और नष्ट-भ्रष्ट होने लगे॥ २६॥ |
| न यज्ञाः समवर्त्तन्त न तपस्यन्ति तापसाः।<br>न च दानादिधर्मेषु मनश्चक्रे तदा जनः॥ २७ | तबसे यज्ञोंका होना बन्द हो गया, तपस्वियोंने तप करना छोड़ दिया तथा लोगोंका दान आदि धर्मोंमें चित्त नहीं रहा॥ २७॥ |
| निःसत्त्वाः सकला लोका लोभाद्युपहतेन्द्रियाः।<br>स्वल्पेऽपि हि बभूवुस्ते साभिलाषा द्विजोत्तम॥ २८ | हे द्विजोत्तम! सम्पूर्ण लोक लोभादिके वशीभूत हो जानेसे सत्त्वशून्य (सामर्थ्यहीन) हो गये और तुच्छ वस्तुओंके लिये भी लालायित रहने लगे॥ २८॥ |
| यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः सत्त्वं भूत्यनुसारि च।<br>निःश्रीकाणां कुतः सत्त्वं विना तेन गुणाः कुतः॥ २९ | जहाँ सत्त्व होता है वहीं लक्ष्मी रहती है और सत्त्व भी लक्ष्मीका ही साथी है। श्रीहीनोंमें भला सत्त्व कहाँ? और बिना सत्त्वके गुण कैसे ठहर सकते हैं?॥ २९॥ |
अ० ९ ] * प्रथम अंश * ३७
बलशौर्याद्यभावश्च पुरुषाणां गुणैर्विना। लङ्घनीयः समस्तस्य बलशौर्यविवर्जितः॥ ३० भवत्यपध्वस्तमतिर्लङ्घितः प्रथितः पुमान् ॥ ३१ एवमत्यन्तनिःश्रीके त्रैलोक्ये सत्त्ववर्जिते। देवान् प्रति बलोद्योगं चक्रुर्दैतेयदानवाः ॥ ३२ लोभाभिभूता निःश्रीका दैत्याः सत्त्वविवर्जिताः। श्रिया विहीनैर्निःसत्त्वैर्देवैश्चक्रुस्ततो रणम् ॥ ३३ विजितास्त्रिदशा दैत्यैरिन्द्राद्याः शरणं ययुः। पितामहं महाभागं हुताशनपुरोगमाः ॥ ३४ यथावत्कथितो देवैर्ब्रह्मा प्राह ततः सुरान्। पराव रेशं शरणं व्रजध्वम सुरार्दनम् ॥ ३५ उत्पत्तिस्थितिनाशानामहेतुं हेतुमीश्वरम्। प्रजापतिपतिं विष्णुमनन्तमपराजितम् ॥ ३६ प्रधानपुंसोरजयोः कारणं कार्यभूतयोः। प्रणतार्त्तिहरं विष्णुं स वः श्रेयो विधास्यति ॥ ३७
श्रीपराशर उवाच एवमुक्त्वा सुरान्सर्वान् ब्रह्मा लोकपितामहः। क्षीरोदस्योत्तरं तीरं तैरेव सहितो ययौ ॥ ३८ स गत्वा त्रिदशैः सर्वैः समवेतः पितामहः। तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः परावरपतिं हरिम् ॥ ३९
ब्रह्मोवाच नमामि सर्वं सर्वेशमनन्तमजमव्ययम्। लोकधाम धराधारमप्रकाशमभेदिनम् ॥ ४० नारायणमणीयांसमशेषाणामणीयसाम्। समस्तानां गरिष्ठं च भूरादीनां गरीयसाम् ॥ ४१ यत्र सर्वं यतः सर्वमुत्पन्नं मत्पुरःसरम्। सर्वभूतश्च यो देवः पराणामपि यः परः ॥ ४२ परः परस्मात्पुरुषात्परमात्मस्वरूपधृक्। योगिभिश्चिन्त्यते योऽसौ मुक्तिहेतोर्मुमुक्षुभिः ॥ ४३ सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यः पुमानाद्यः प्रसीदतु ॥ ४४ कलाकाष्ठामुहूर्त्तादिकालसूत्रस्य गोचरे। यस्य शक्तिर्न शुद्धस्य स नो विष्णुः प्रसीदतु ॥ ४५
बिना गुणोंके पुरुषमें बल, शौर्य आदि सभीका अभाव हो जाता है और निर्बल तथा अशक्त पुरुष सभीसे अपमानित होता है॥ ३० ॥ अपमानित होनेपर प्रतिष्ठित पुरुषकी बुद्धि बिगड़ जाती है॥ ३१॥
इस प्रकार त्रिलोकीके श्रीहीन और सत्त्वरहित हो जानेपर दैत्य और दानवों ने देवताओंपर चढ़ाई कर दी॥ ३२॥ सत्त्व और वैभवसे शून्य होनेपर भी दैत्यों ने लोभवश निःसत्त्व और श्रीहीन देवताओं से घोर युद्ध ठाना ॥ ३३ ॥ अन्तमें दैत्योंद्वारा देवता लोग परास्त हुए। तब इन्द्रादि समस्त देवगण अग्निदेवको आगे कर महाभाग पितामह श्रीब्रह्माजीकी शरण गये ॥ ३४ ॥ देवताओं से सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर श्रीब्रह्माजीने उनसे कहा, 'हे देवगण ! तुम दैत्य-दलन परावरेश्वर भगवान् विष्णुकी शरण जाओ, जो [आरोपसे] संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कारण हैं किन्तु [वास्तवमें] कारण भी नहीं हैं और जो चराचरके ईश्वर, प्रजापतियोंके स्वामी, सर्वव्यापक, अनन्त और अजेय हैं तथा जो अजन्मा किन्तु कार्यरूपमें परिणत हुए प्रधान (मूलप्रकृति) और पुरुषके कारण हैं एवं शरणागतवत्सल हैं। [शरण जानेपर] वे अवश्य तुम्हारा मंगल करेंगे' ॥ ३५-३७॥
श्रीपराशरजी बोले- हे मैत्रेय ! सम्पूर्ण देवगणोंसे इस प्रकार कह लोकपितामह श्रीब्रह्माजी भी उनके साथ क्षीरसागरके उत्तरी तटपर गये ॥ ३८ ॥ वहाँ पहुँचकर पितामह ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ परावरनाथ श्रीविष्णुभगवान्की अति मंगलमय वाक्योंसे स्तुति की॥ ३९॥
ब्रह्माजी कहने लगे- जो समस्त अणुओंसे भी अणु और पृथिवी आदि समस्त गुरुओं (भारी पदार्थों)-से भी गुरु (भारी) हैं; उन निखिललोकविश्राम, पृथिवीके आधारस्वरूप, अप्रकाश्य, अभेद्य, सर्वरूप, सर्वेश्वर, अनन्त, अज और अव्यय नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४०-४१॥ मेरे सहित सम्पूर्ण जगत् जिसमें स्थित है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जो देव सर्वभूतमय है तथा जो पर (प्रधानादि) से भी पर है; जो पर पुरुषसे भी पर है, मुक्ति-लाभके लिये मोक्षकामी मुनिजन जिसका ध्यान धरते हैं तथा जिस ईश्वरमें सत्त्वादि प्राकृतिक गुणोंका सर्वथा अभाव है वह समस्त शुद्ध पदार्थोंसे भी परम शुद्ध परमात्मस्वरूप आदिपुरुष हमपर प्रसन्न हों॥ ४२-४४॥ जिस शुद्धस्वरूप भगवान्की शक्ति (विभूति) कला-काष्ठा और मुहूर्त आदि काल-क्रमका विषय नहीं है, वे भगवान् विष्णु हमपर प्रसन्न हों॥ ४५॥
| ३८ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ९ |
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प्रोच्यते परमेशो हि यः शुद्धोऽप्युपचारतः ।
प्रसीदतु स नो विष्णुरात्मा यः सर्वदेहिनाम् ॥ ४६
जो शुद्धस्वरूप होकर भी उपचारसे परमेश्वर (परमा=महालक्ष्मी+ईश्वर=पति) अर्थात् लक्ष्मीपति कहलाते हैं और जो समस्त देहधारियोंके आत्मा हैं वे श्रीविष्णुभगवान् हमपर प्रसन्न हों ॥ ४६ ॥
यः कारणं च कार्यं च कारणस्यापि कारणम् ।
कार्यस्यापि च यः कार्यं प्रसीदतु स नो हरिः ॥ ४७
जो कारण और कार्यरूप हैं तथा कारणके भी कारण और कार्यके भी कार्य हैं वे श्रीहरि हमपर प्रसन्न हों ॥ ४७ ॥
कार्यकार्यस्य यत्कार्यं तत्कार्यस्यापि यः स्वयम् ।
तत्कार्यकार्यभूतो यस्ततश्च प्रणताः स्म तम् ॥ ४८
जो कार्य (महत्तत्त्व)-के कार्य (अहंकार)-का भी कार्य (तन्मात्रपंचक) है उसके कार्य (भूतपंचक)-का भी कार्य (ब्रह्माण्ड) जो स्वयं है और जो उसके कार्य (ब्रह्मा-दक्षादि)-का भी कार्यभूत (प्रजापतियोंके पुत्र-पौत्रादि) है उसे हम प्रणाम करते हैं ॥ ४८ ॥
कारणं कारणस्यापि तस्य कारणकारणम् ।
तत्कारणानां हेतुं तं प्रणताः स्म परेश्वरम् ॥ ४९
तथा जो जगत्के कारण (ब्रह्मादि)-का कारण (ब्रह्माण्ड) और उसके कारण (भूतपंचक)-के कारण (पंचतन्मात्रा)-के कारणों (अहंकार-महत्तत्त्वादि)-का भी हेतु (मूलप्रकृति) है उस परमेश्वरको हम प्रणाम करते हैं ॥ ४९ ॥
भोक्तारं भोग्यभूतं च स्रष्टारं सृज्यमेव च ।
कार्यकर्तृस्वरूपं तं प्रणताः स्म परं पदम् ॥ ५०
जो भोक्ता और भोग्य, स्रष्टा और सृज्य तथा कर्ता और कार्यरूप स्वयं ही है उस परमपदको हम प्रणाम करते हैं ॥ ५० ॥
विशुद्धबोधवन्नित्यमजमक्षयमव्ययम् ।
अव्यक्तमविकारं यत्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ५१
जो विशुद्ध बोधस्वरूप, नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, अव्यक्त और अविकारी है वही विष्णुका परमपद (परस्वरूप) है ॥ ५१ ॥
न स्थूलं न च सूक्ष्मं यन्न विशेषणगोचरम् ।
तत्पदं परमं विष्णोः प्रणमामः सदाऽमलम् ॥ ५२
जो न स्थूल है न सूक्ष्म और न किसी अन्य विशेषणका विषय है वही भगवान् विष्णुका नित्य-निर्मल परमपद है, हम उसको प्रणाम करते हैं ॥ ५२ ॥
यस्यायुतायुतांशांशे विश्वशक्तिरियं स्थिता ।
परब्रह्मस्वरूपं यत्प्रणमामस्तमव्ययम् ॥ ५३
जिसके अयुतांश (दस हजारवें अंश) के अयुतांशमें यह विश्वरचनाकी शक्ति स्थित है तथा जो परब्रह्मस्वरूप है उस अव्ययको हम प्रणाम करते हैं ॥ ५३ ॥
यद्योगिनः सदोद्युक्ताः पुण्यपापक्षयेऽक्षयम् ।
पश्यन्ति प्रणवे चिन्त्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ५४
नित्य-युक्त योगिगण अपने पुण्य-पापादिका क्षय हो जानेपर ॐकारद्वारा चिन्तनीय जिस अविनाशी पदका साक्षात्कार करते हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है ॥ ५४ ॥
यन्न देवा न मुनयो न चाहं न च शङ्करः ।
जानन्ति परमेशस्य तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ५५
जिसको देवगण, मुनिगण, शंकर और मैं—कोई भी नहीं जान सकते वही परमेश्वर श्रीविष्णुका परमपद है ॥ ५५ ॥
शक्तयो यस्य देवस्य ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाः ।
भवन्त्यभूतपूर्वस्य तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ५६
जिस अभूतपूर्व देवकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप शक्तियाँ हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है ॥ ५६ ॥
सर्वेश सर्वभूतात्मन्सर्व सर्वाश्रयाच्युत ।
प्रसीद विष्णो भक्तानां व्रज नो दृष्टिगोचरम् ॥ ५७
हे सर्वेश्वर ! हे सर्वभूतात्मन् ! हे सर्वरूप ! हे सर्वाधार ! हे अच्युत ! हे विष्णो ! हम भक्तोंपर प्रसन्न होकर हमें दर्शन दीजिये ॥ ५७ ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युदीरितमाकर्ण्य ब्रह्मणस्त्रिदशास्ततः ।
प्रणम्योचुः प्रसीदेति व्रज नो दृष्टिगोचरम् ॥ ५८
श्रीपराशरजी बोले—ब्रह्माजीके इन उद्गारोंको सुनकर देवगण भी प्रणाम करके बोले—'प्रभो ! हमपर प्रसन्न होकर हमें दर्शन दीजिये ॥ ५८ ॥
यन्नायं भगवान् ब्रह्मा जानाति परमं पदम् ।
तन्नताः स्म जगद्धाम तव सर्वगताच्युत ॥ ५९
हे जगद्धाम सर्वगत अच्युत ! जिसे ये भगवान् ब्रह्माजी भी नहीं जानते, आपके उस परमपदको हम प्रणाम करते हैं' ॥ ५९ ॥