भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

३४ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० ८ ---|---|---

पत्नीशाला मुने लक्ष्मीः प्राग्वंशो मधुसूदनः।<br>चितिर्लक्ष्मीर्हरियूप इध्मः श्रीभगवान्कुशः॥ २१हे मुने! मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं, श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं तथा भगवान् कुशा हैं और लक्ष्मीजी इध्मा हैं॥ २१॥
सामस्वरूपी भगवानुद्गीतिः कमलालया।<br>स्वाहा लक्ष्मीर्जगन्नाथो वासुदेवो हुताशनः॥ २२भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं, जगत्पति भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी स्वाहा हैं॥ २२॥
शङ्करो भगवाञ्छौरिर्गौरी लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>मैत्रेय केशवः सूर्यस्तत्प्रभा कमलालया॥ २३हे द्विजोत्तम! भगवान् विष्णु शंकर हैं और श्रीलक्ष्मीजी गौरी हैं तथा हे मैत्रेय! श्रीकेशव सूर्य हैं और कमलवासिनी श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रभा हैं॥ २३॥
विष्णुः पितृगणः पद्मा स्वधा शाश्वतपुष्टिदा।<br>द्यौः श्रीः सर्वात्मको विष्णुरवकाशोऽतिविस्तरः॥ २४श्रीविष्णु पितृगण हैं और श्रीकमला नित्य पुष्टिदायिनी स्वधा हैं, विष्णु अति विस्तीर्ण सर्वात्मक अवकाश हैं और लक्ष्मीजी स्वर्गलोक हैं॥ २४॥
शशाङ्कः श्रीधरः कान्तिः श्रीस्तथैवानपायिनी।<br>धृतिर्लक्ष्मीर्जगच्चेष्टा वायुः सर्वत्रगो हरिः॥ २५भगवान् श्रीधर चन्द्रमा हैं और श्रीलक्ष्मीजी उनकी अक्षय कान्ति हैं, हरि सर्वगामी वायु हैं और लक्ष्मीजी जगच्चेष्टा (जगत्की गति) और धृति (आधार) हैं॥ २५॥
जलधिर्द्विज गोविन्दस्तद्वेला श्रीर्महामुने।<br>लक्ष्मीस्वरूपमिन्द्राणी देवेन्द्रो मधुसूदनः॥ २६हे महामुने! श्रीगोविन्द समुद्र हैं और हे द्विज! लक्ष्मीजी उसकी तरंग हैं, भगवान् मधुसूदन देवराज इन्द्र हैं और लक्ष्मीजी इन्द्राणी हैं॥ २६॥
यमश्चक्रधरः साक्षाद्धूमोर्णा कमलालया।<br>ऋद्धिः श्रीः श्रीधरो देवः स्वयमेव धनेश्वरः॥ २७चक्रपाणि भगवान् यम हैं और श्रीकमला यमपत्नी धूमोर्णा हैं, देवाधिदेव श्रीविष्णु कुबेर हैं और श्रीलक्ष्मीजी साक्षात् ऋद्धि हैं॥ २७॥
गौरी लक्ष्मीर्महाभागा केशवो वरुणः स्वयम्।<br>श्रीर्देवसेना विप्रेन्द्र देवसेनापतिर्हरिः॥ २८श्रीकेशव स्वयं वरुण हैं और महाभागा लक्ष्मीजी गौरी हैं, हे द्विजराज! श्रीहरि देवसेनापति स्वामिकार्तिकेय हैं और श्रीलक्ष्मीजी देवसेना हैं॥ २८॥
अवष्टम्भो गदापाणिः शक्तिर्लक्ष्मीर्द्विजोत्तम।<br>काष्ठा लक्ष्मीर्निमेषोऽसौ मुहूर्त्तोऽसौ कला त्वियम्॥ २९हे द्विजोत्तम! भगवान् गदाधर आश्रय हैं और लक्ष्मीजी शक्ति हैं, भगवान् निमेष हैं और लक्ष्मीजी काष्ठा हैं, वे मुहूर्त हैं और ये कला हैं॥ २९॥
ज्योत्स्ना लक्ष्मीः प्रदीपोऽसौ सर्वः सर्वेश्वरो हरिः।<br>लताभूता जगन्माता श्रीविष्णुर्द्रुमसंज्ञितः॥ ३०सर्वेश्वर सर्वरूप श्रीहरि दीपक हैं और श्रीलक्ष्मीजी ज्योति हैं, श्रीविष्णु वृक्षरूप हैं और जगन्माता श्रीलक्ष्मीजी लता हैं॥ ३०॥
विभावरी श्रीर्दिवसो देवश्चक्रगदाधरः।<br>वरप्रदो वरो विष्णुर्वधूः पद्मवनालया॥ ३१चक्रगदाधरदेव श्रीविष्णु दिन हैं और लक्ष्मीजी रात्रि हैं, वरदायक श्रीहरि वर हैं और पद्मनिवासिनी श्रीलक्ष्मीजी वधू हैं॥ ३१॥
नदस्वरूपी भगवाञ्छ्रीनदीरूपसंस्थिता।<br>ध्वजश्च पुण्डरीकाक्षः पताका कमलालया॥ ३२भगवान् नद हैं और श्रीजी नदी हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा हैं और कमलालया लक्ष्मीजी पताका हैं॥ ३२॥
तृष्णा लक्ष्मीर्जगन्नाथो लोभो नारायणः परः।<br>रती रागश्च मैत्रेय लक्ष्मीर्गोविन्द एव च॥ ३३जगदीश्वर परमात्मा नारायण लोभ हैं और लक्ष्मीजी तृष्णा हैं तथा हे मैत्रेय! रति और राग भी साक्षात् श्रीलक्ष्मी और गोविन्दरूप ही हैं॥ ३३॥
किं चातिबहुनोक्तेन सङ्क्षेपेणेदमुच्यते॥ ३४<br>देवतिर्यङ्मनुष्यादौ पुन्नामा भगवान्हरिः।<br>स्त्रीनाम्नी श्रीश्च विज्ञेया नानयोर्विद्यते परम्॥ ३५अधिक क्या कहा जाय? संक्षेपमें, यह कहना चाहिये कि देव, तिर्यक् और मनुष्य आदिमें पुरुषवाची भगवान् हरि हैं और स्त्रीवाची श्रीलक्ष्मीजी, इनके परे और कोई नहीं है॥ ३४-३५॥

$$\Rule{60mm}{0.4pt}{0.4pt}$$

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

$$\Rule{30mm}{0.4pt}{0.4pt}$$

48 Visnupuran_Section_3_1_Back
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth