भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ९] * प्रथम अंश * ३५

नवाँ अध्याय

दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्‌का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय ! तुमने इस समय मुझसे जिसके विषयमें पूछा है वह श्रीसम्बन्ध (लक्ष्मीजीका इतिहास) मैंने भी मरीचि ऋषिसे सुना था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ, [सावधान होकर] सुनो॥ १॥ एक बार शंकरके अंशावतार श्रीदुर्वासाजी पृथिवीतलमें विचर रहे थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विद्याधरीके हाथोंमें सन्तानक पुष्पोंकी एक दिव्य माला देखी। हे ब्रह्मन्! उसकी गन्धसे सुवासित होकर वह वन वनवासियोंके लिये अति सेवनीय हो रहा था॥ २-३॥ तब उन उन्मत्तवृत्तिवाले विप्रवरने वह सुन्दर माला देखकर उसे उस विद्याधर-सुन्दरीसे माँगा॥ ४॥ उनके माँगनेपर उस बड़े-बड़े नेत्रोंवाली कृशांगी विद्याधरीने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम कर वह माला दे दी॥ ५॥
इदं च शृणु मैत्रेय यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।<br>श्रीसम्बन्धं मयाप्येतच्छ्रुतमासीन्मरीचितः॥ १
दुर्वासाः शङ्करास्यांशश्चचार पृथिवीमिमाम्।<br>स ददर्श स्त्रजं दिव्यांमृषिर्विद्याधरीकरे॥ २
सन्तानकानांमखिलं यस्या गन्धेन वासितम्।<br>अतिसेव्यमभूद्ब्रह्मन् तद्वनं वनचारिणाम्॥ ३
उन्मत्तव्रतधृग्विप्रस्तां दृष्ट्वा शोभनां स्त्रजम्।<br>तां ययाचे वरारोहां विद्याधरवधूं ततः॥ ४
याचिता तेन तन्वङ्गी मालां विद्याधराङ्गना।<br>ददौ तस्मै विशालाक्षी सादरं प्रणिपत्य तम्॥ ५
तामादायात्मनो मूर्ध्नि स्त्रजमुन्मत्तरूपधृक्।<br>कृत्वा स विप्रो मैत्रेय परिबभ्राम मेदिनीम्॥ ६हे मैत्रेय! उन उन्मत्तवेषधारी विप्रवरने उसे लेकर अपने मस्तकपर डाल लिया और पृथिवीपर विचरने लगे॥ ६॥ इसी समय उन्होंने उन्मत्त ऐरावतपर चढ़कर देवताओंके साथ आते हुए त्रैलोक्याधिपति शचीपति इन्द्रको देखा॥ ७॥ उन्हें देखकर मुनिवर दुर्वासाने उन्मत्तके समान वह मतवाले भौरोंसे गुंजायमान माला अपने सिरपरसे उतारकर देवराज इन्द्रके ऊपर फेंक दी॥ ८॥ देवराजने उसे लेकर ऐरावतके मस्तकपर डाल दी; उस समय वह ऐसी सुशोभित हुई मानो कैलास पर्वतके शिखरपर श्रीगंगाजी विराजमान हों॥ ९॥ उस मदोन्मत्त हाथीने भी उसकी गन्धसे आकर्षित हो उसे सूँडसे सूंघकर पृथिवीपर फेंक दिया॥ १०॥ हे मैत्रेय! यह देखकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् दुर्वासाजी अति क्रोधित हुए और देवराज इन्द्रसे इस प्रकार बोले॥ ११॥
स ददर्श तमायान्तमुन्मत्तैरावते स्थितम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं देवं सह देवैः शचीपतिम्॥ ७
तामात्मनः स शिरसः स्त्रजमुन्मत्तषट्पदाम्।<br>आदायामरराजाय चिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः॥ ८
गृहीत्वाऽमरराजेन स्त्रगैरावतमूर्द्धनि।<br>न्यस्ता रराज कैलासशिखरे जाह्नवी यथा॥ ९
मदान्धकारिताक्षोऽसौ गन्धाकृष्टेन वारणः।<br>करेणाघ्राय चिक्षेप तां स्त्रजं धरणीतले॥ १०
ततश्चुक्रोध भगवान्दुर्वासा मुनिसत्तमः।<br>मैत्रेय देवराजं तं क्रुद्धश्चैतदुवाच ह॥ ११
दुर्वासा उवाचदुर्वासाजीने कहा—अरे ऐश्वर्यके मदसे दूषितचित्त इन्द्र! तू बड़ा ढीठ है, तूने मेरी दी हुई सम्पूर्ण शोभाकी धाम मालाका कुछ भी आदर नहीं किया!॥ १२॥ अरे ! तूने न तो प्रणाम करके ‘बड़ी कृपा की’ ऐसा ही कहा और न हर्षसे प्रसन्नवदन होकर उसे अपने सिरपर ही रखा॥ १३॥ रे मूढ़! तूने मेरी दी हुई मालाका कुछ भी मूल्य नहीं किया, इसलिये तेरा त्रिलोकीका वैभव नष्ट हो जायगा॥ १४॥
ऐश्वर्यमददुष्टात्मन्नतिस्तब्धोऽसि वासव।<br>श्रीयो धाम स्त्रजं यस्त्वं मदत्तां नाभिनन्दसि॥ १२
प्रसाद इति नोक्तं ते प्रणिपातपुरःसरम्।<br>हर्षोत्फुल्लकपोलेन न चापि शिरसा धृता॥ १३
मया दत्तामिमां मालां यस्मान्न बहु मन्यसे।<br>त्रैलोक्यश्रीरतो मूढ विनाशमुपयास्यति॥ १४

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