भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 47
३६* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ९
मां मन्यसे त्वं सदृशं नूनं शक्रेतरद्विजैः।<br>अतोऽवमानमस्मासु मानिना भवता कृतम्॥ १५इन्द्र! निश्चय ही तू मुझे और ब्राह्मणोंके समान ही समझता है, इसीलिये तुझ अति मानीने हमारा इस प्रकार अपमान किया है॥ १५॥
मद्दत्ता भवता यस्मात्क्षिप्ता माला महीतले।<br>तस्मात्प्रणष्टलक्ष्मीकं त्रैलोक्यं ते भविष्यति॥ १६अच्छा, तूने मेरी दी हुई मालाको पृथिवीपर फेंका है इसलिये तेरा यह त्रिभुवन भी शीघ्र ही श्रीहीन हो जायगा॥ १६॥
यस्य सञ्जातकोपस्य भयमेति चराचरम्।<br>तं त्वं मामतिगर्वेग देवराजावमन्यसे॥ १७रे देवराज! जिसके क्रुद्ध होनेपर सम्पूर्ण चराचर जगत् भयभीत हो जाता है उस मेरा ही तूने अति गर्वसे इस प्रकार अपमान किया!॥ १७॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
महेन्द्रो वारणस्कन्धादवतीर्य त्वरान्वितः।<br>प्रसादयामास मुनिं दुर्वाससमकल्मषम्॥ १८तब तो इन्द्रने तुरन्त ही ऐरावत हाथीसे उतरकर निष्पाप मुनिवर दुर्वासाजीको [अनुनय-विनय करके] प्रसन्न किया॥ १८॥
प्रसाद्यमानः स तदा प्रणिपातपुरःसरम्।<br>इत्युवाच सहस्राक्षं दुर्वासा मुनिसत्तमः॥ १९तब उसके प्रणामादि करनेसे प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाजी उससे इस प्रकार कहने लगे॥ १९॥
दुर्वासा उवाचदुर्वासाजी बोले—
नाहं कृपालुहृदयो न च मां भजते क्षमा।<br>अन्ये ते मुनयः शक्र दुर्वाससमवेहि माम्॥ २०इन्द्र! मैं कृपालु-चित्त नहीं हूँ, मेरे अन्तःकरणमें क्षमाको स्थान नहीं है। वे मुनिजन तो और ही हैं; तुम समझो, मैं तो दुर्वासा हूँ न?॥ २०॥
गौतमादिभिरन्यैस्त्वं गर्वमारोपितो मुधा।<br>अक्षान्तिसारसर्वस्वं दुर्वाससमवेहि माम्॥ २१गौतमादि अन्य मुनिजनोंने व्यर्थ ही तुझे इतना मुँह लगा लिया है; पर याद रख, मुझ दुर्वासाका सर्वस्व तो क्षमा न करना ही है॥ २१॥
वसिष्ठाद्यैर्दयासारेःस्तोत्रं कुर्वद्भिरुच्चकैः।<br>गर्वं गतोऽसि येनैवं मामप्यद्यावमन्यसे॥ २२दयामूर्ति वसिष्ठ आदिके बढ़-बढ़कर स्तुति करनेसे तू इतना गर्वीला हो गया कि आज मेरा भी अपमान करने चला है॥ २२॥
ज्वलज्जटाकलापस्य भृकुटीकुटिलं मुखम्।<br>निरीक्ष्य कस्त्रिभुवने मम यो न गतो भयम्॥ २३अरे! आज त्रिलोकीमें ऐसा कौन है जो मेरे प्रज्वलित जटाकलाप और टेढ़ी भृकुटिको देखकर भयभीत न हो जाय?॥ २३॥
नाहं क्षमिष्ये बहुना किमुक्तेन शतक्रतो।<br>विडम्बनामिमां भूयः करोष्यनुनयात्मिकाम्॥ २४रे शतक्रतो! तू बारम्बार अनुनय-विनय करनेका ढोंग क्यों करता है? तेरे इस कहने-सुननेसे क्या होगा? मैं क्षमा नहीं कर सकता॥ २४॥
श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।<br>आरुह्यैरावतं ब्रह्मन् प्रययावमरावतीम्॥ २५हे ब्रह्मन्! इस प्रकार कह वे विप्रवर वहाँसे चल दिये और इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर अमरावतीको चले गये॥ २५॥
ततः प्रभृति निःश्रीकं सशक्रं भुवनत्रयम्।<br>मैत्रेयासीदपध्वस्तं सङ्क्षीणौषधिवीरुधम्॥ २६हे मैत्रेय! तभीसे इन्द्रके सहित तीनों लोक वृक्ष-लता आदिके क्षीण हो जानेसे श्रीहीन और नष्ट-भ्रष्ट होने लगे॥ २६॥
न यज्ञाः समवर्त्तन्त न तपस्यन्ति तापसाः।<br>न च दानादिधर्मेषु मनश्चक्रे तदा जनः॥ २७तबसे यज्ञोंका होना बन्द हो गया, तपस्वियोंने तप करना छोड़ दिया तथा लोगोंका दान आदि धर्मोंमें चित्त नहीं रहा॥ २७॥
निःसत्त्वाः सकला लोका लोभाद्युपहतेन्द्रियाः।<br>स्वल्पेऽपि हि बभूवुस्ते साभिलाषा द्विजोत्तम॥ २८हे द्विजोत्तम! सम्पूर्ण लोक लोभादिके वशीभूत हो जानेसे सत्त्वशून्य (सामर्थ्यहीन) हो गये और तुच्छ वस्तुओंके लिये भी लालायित रहने लगे॥ २८॥
यतः सत्त्वं ततो लक्ष्मीः सत्त्वं भूत्यनुसारि च।<br>निःश्रीकाणां कुतः सत्त्वं विना तेन गुणाः कुतः॥ २९जहाँ सत्त्व होता है वहीं लक्ष्मी रहती है और सत्त्व भी लक्ष्मीका ही साथी है। श्रीहीनोंमें भला सत्त्व कहाँ? और बिना सत्त्वके गुण कैसे ठहर सकते हैं?॥ २९॥