भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० ९ ] * प्रथम अंश * ३७

बलशौर्याद्यभावश्च पुरुषाणां गुणैर्विना। लङ्घनीयः समस्तस्य बलशौर्यविवर्जितः॥ ३० भवत्यपध्वस्तमतिर्लङ्घितः प्रथितः पुमान् ॥ ३१ एवमत्यन्तनिःश्रीके त्रैलोक्ये सत्त्ववर्जिते। देवान् प्रति बलोद्योगं चक्रुर्दैतेयदानवाः ॥ ३२ लोभाभिभूता निःश्रीका दैत्याः सत्त्वविवर्जिताः। श्रिया विहीनैर्निःसत्त्वैर्देवैश्चक्रुस्ततो रणम् ॥ ३३ विजितास्त्रिदशा दैत्यैरिन्द्राद्याः शरणं ययुः। पितामहं महाभागं हुताशनपुरोगमाः ॥ ३४ यथावत्कथितो देवैर्ब्रह्मा प्राह ततः सुरान्। पराव रेशं शरणं व्रजध्वम सुरार्दनम् ॥ ३५ उत्पत्तिस्थितिनाशानामहेतुं हेतुमीश्वरम्। प्रजापतिपतिं विष्णुमनन्तमपराजितम् ॥ ३६ प्रधानपुंसोरजयोः कारणं कार्यभूतयोः। प्रणतार्त्तिहरं विष्णुं स वः श्रेयो विधास्यति ॥ ३७

श्रीपराशर उवाच एवमुक्त्वा सुरान्सर्वान् ब्रह्मा लोकपितामहः। क्षीरोदस्योत्तरं तीरं तैरेव सहितो ययौ ॥ ३८ स गत्वा त्रिदशैः सर्वैः समवेतः पितामहः। तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः परावरपतिं हरिम् ॥ ३९

ब्रह्मोवाच नमामि सर्वं सर्वेशमनन्तमजमव्ययम्। लोकधाम धराधारमप्रकाशमभेदिनम् ॥ ४० नारायणमणीयांसमशेषाणामणीयसाम्। समस्तानां गरिष्ठं च भूरादीनां गरीयसाम् ॥ ४१ यत्र सर्वं यतः सर्वमुत्पन्नं मत्पुरःसरम्। सर्वभूतश्च यो देवः पराणामपि यः परः ॥ ४२ परः परस्मात्पुरुषात्परमात्मस्वरूपधृक्। योगिभिश्चिन्त्यते योऽसौ मुक्तिहेतोर्मुमुक्षुभिः ॥ ४३ सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यः पुमानाद्यः प्रसीदतु ॥ ४४ कलाकाष्ठामुहूर्त्तादिकालसूत्रस्य गोचरे। यस्य शक्तिर्न शुद्धस्य स नो विष्णुः प्रसीदतु ॥ ४५

बिना गुणोंके पुरुषमें बल, शौर्य आदि सभीका अभाव हो जाता है और निर्बल तथा अशक्त पुरुष सभीसे अपमानित होता है॥ ३० ॥ अपमानित होनेपर प्रतिष्ठित पुरुषकी बुद्धि बिगड़ जाती है॥ ३१॥

इस प्रकार त्रिलोकीके श्रीहीन और सत्त्वरहित हो जानेपर दैत्य और दानवों ने देवताओंपर चढ़ाई कर दी॥ ३२॥ सत्त्व और वैभवसे शून्य होनेपर भी दैत्यों ने लोभवश निःसत्त्व और श्रीहीन देवताओं से घोर युद्ध ठाना ॥ ३३ ॥ अन्तमें दैत्योंद्वारा देवता लोग परास्त हुए। तब इन्द्रादि समस्त देवगण अग्निदेवको आगे कर महाभाग पितामह श्रीब्रह्माजीकी शरण गये ॥ ३४ ॥ देवताओं से सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर श्रीब्रह्माजीने उनसे कहा, 'हे देवगण ! तुम दैत्य-दलन परावरेश्वर भगवान् विष्णुकी शरण जाओ, जो [आरोपसे] संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कारण हैं किन्तु [वास्तवमें] कारण भी नहीं हैं और जो चराचरके ईश्वर, प्रजापतियोंके स्वामी, सर्वव्यापक, अनन्त और अजेय हैं तथा जो अजन्मा किन्तु कार्यरूपमें परिणत हुए प्रधान (मूलप्रकृति) और पुरुषके कारण हैं एवं शरणागतवत्सल हैं। [शरण जानेपर] वे अवश्य तुम्हारा मंगल करेंगे' ॥ ३५-३७॥

श्रीपराशरजी बोले- हे मैत्रेय ! सम्पूर्ण देवगणोंसे इस प्रकार कह लोकपितामह श्रीब्रह्माजी भी उनके साथ क्षीरसागरके उत्तरी तटपर गये ॥ ३८ ॥ वहाँ पहुँचकर पितामह ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ परावरनाथ श्रीविष्णुभगवान्‌की अति मंगलमय वाक्योंसे स्तुति की॥ ३९॥

ब्रह्माजी कहने लगे- जो समस्त अणुओंसे भी अणु और पृथिवी आदि समस्त गुरुओं (भारी पदार्थों)-से भी गुरु (भारी) हैं; उन निखिललोकविश्राम, पृथिवीके आधारस्वरूप, अप्रकाश्य, अभेद्य, सर्वरूप, सर्वेश्वर, अनन्त, अज और अव्यय नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४०-४१॥ मेरे सहित सम्पूर्ण जगत् जिसमें स्थित है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जो देव सर्वभूतमय है तथा जो पर (प्रधानादि) से भी पर है; जो पर पुरुषसे भी पर है, मुक्ति-लाभके लिये मोक्षकामी मुनिजन जिसका ध्यान धरते हैं तथा जिस ईश्वरमें सत्त्वादि प्राकृतिक गुणोंका सर्वथा अभाव है वह समस्त शुद्ध पदार्थोंसे भी परम शुद्ध परमात्मस्वरूप आदिपुरुष हमपर प्रसन्न हों॥ ४२-४४॥ जिस शुद्धस्वरूप भगवान्‌की शक्ति (विभूति) कला-काष्ठा और मुहूर्त आदि काल-क्रमका विषय नहीं है, वे भगवान् विष्णु हमपर प्रसन्न हों॥ ४५॥