भारतकोश
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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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48

॥ ॐ ॥

श्रीविष्णुपुराण

( सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित )


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


अनुवादक
श्रीमुनिलाल गुप्त

सं० २०७६ छप्पनवाँ पुनर्मुद्रण ५,०००
कुल मुद्रण ३,२५,२५०

मूल्य—₹ १५०
(एक सौ पचास रुपये)

प्रकाशक एवं मुद्रक—
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निवेदन

अष्टादश महापुराणोंमें श्रीविष्णुपुराणका स्थान बहुत ऊँचा है। इसके रचयिता श्रीपराशरजी हैं। इसमें अन्य विषयोंके साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रसंगोंका बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है। भक्ति और ज्ञानकी प्रशान्त धारा तो इसमें सर्वत्र ही प्रच्छन्नरूपसे बह रही है। यद्यपि यह पुराण विष्णुपरक है तो भी भगवान् शंकरके लिये इसमें कहीं भी अनुदार भाव प्रकट नहीं किया गया। सम्पूर्ण ग्रन्थमें शिवजीका प्रसंग सम्भवतः श्रीकृष्ण-बाणासुर-संग्राममें ही आता है, सो वहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजीके साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं—

त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया। मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रष्टुमर्हसि शङ्कर॥ ४७॥
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्। मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि॥ ४८॥
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः। वदन्ति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर ॥ ४९॥

<p align="right">(अंश ५ अध्याय ३३)</p>

हाँ, तृतीय अंशमें मायामोहके प्रसंगमें बौद्ध और जैनियोंके प्रति कुछ कटाक्ष अवश्य किये गये हैं। परन्तु इसका उत्तरदायित्व भी ग्रन्थकारकी अपेक्षा उस प्रसंगको ही अधिक है। वहाँ कर्मकाण्डका प्रसंग है और उक्त दोनों सम्प्रदाय वैदिक कर्मके विरोधी हैं, इसलिये उनके प्रति कुछ व्यंग-वृत्ति हो जाना स्वाभाविक ही है। अस्तु!

आज सर्वान्तर्यामी सर्वेश्वरकी असीम कृपासे मैं इस ग्रन्थरत्नका हिन्दी-अनुवाद पाठकोंके सम्मुख रखनेमें सफल हो सका हूँ—इससे मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है। अभीतक हिन्दीमें इसका कोई भी अविकल अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ था। गीताप्रेसने इसे प्रकाशित करनेका उद्योग करके हिन्दी-साहित्यका बड़ा उपकार किया है। संस्कृतमें इसके ऊपर विष्णुचित्ति और श्रीधरी दो टीकाएँ हैं, जो वेंकटेश्वर स्टीमप्रेस बम्बईसे प्रकाशित हुई हैं। प्रस्तुत अनुवाद भी उन्हींके आधारपर किया गया है; तथा इसमें पूज्यपाद महामहोपाध्याय पं० श्रीपंचाननजी तर्करत्नद्वारा सम्पादित बंगला-अनुवादसे भी अच्छी सहायता ली गयी है। इसके लिये मैं श्रीपण्डितजीका अत्यन्त आभारी हूँ।

अनुवादमें यथासम्भव मूलका ही भावार्थ दिया गया है। जहाँ स्पष्ट करनेके लिये कोई बात ऊपरसे लिखी गयी है वहाँ [ ] ऐसा तथा जहाँ किसी शब्दका भाव व्यक्त करनेके लिये कुछ लिखा गया है वहाँ ( ) ऐसा कोष्ठ दिया गया है।

अन्तमें, जिन चराचरनियन्ता श्रीहरिकी प्रेरणासे मैंने, योग्यता न होते हुए भी, इस ओर बढ़नेका दुःसाहस किया है उनसे क्षमा माँगता हुआ उन लीलामयकी यह लीला उन्हींके चरणकमलोंमें समर्पित करता हूँ।

$\left.\begin{array}{l}\text{खुर्जा} \ \text{मार्ग० शु० २ सं० १९९०}\end{array}\right}$

<p align="right">विनीत<br><b>अनुवादक</b></p>

॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
प्रथम अंश२०-प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति और भगवान्‌का आविर्भाव..... ९९
१-ग्रन्थका उपोद्घात..... ७२१-कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन..... १०२
२-चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्के उत्पत्ति-क्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा..... ९२२-विष्णुभगवान्‌की विभूति और जगत्की व्यवस्थाका वर्णन..... १०५
३-ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप..... १४द्वितीय अंश
४-ब्रह्माजीकी उत्पत्ति, वराहभगवान्‌द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना..... १६१-प्रियव्रतके वंशका वर्णन..... १११
५-अविद्यादि विविध सर्गोंका वर्णन..... २१२-भूगोलका विवरण..... ११४
६-चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, पृथिवी-विभाग और अन्नादिकी उत्पत्तिका वर्णन..... २६३-भारतादि नौ खण्डोंका विभाग..... १
७-मरीचि आदि प्रजापतिगण, तामसिक सर्ग, स्वायम्भुवमनु और शतरूपा तथा उनकी सन्तानका वर्णन..... २९४-प्लक्ष तथा शाल्मल आदि द्वीपोंका विशेष वर्णन..... १
८-रौद्र-सृष्टि और भगवान् तथा लक्ष्मीजीकी सर्वव्यापकताका वर्णन..... ३२५-सात पाताललोकोंका वर्णन..... १२६
९-दुर्वासाजीके शापसे इन्द्रका पराजय, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए भगवान्‌का प्रकट होकर देवताओंको समुद्र-मन्थनका उपदेश करना तथा देवता और दैत्योंका समुद्र-मन्थन..... ३५६-भिन्न-भिन्न नरकोंका तथा भगवन्नामके माहात्म्यका वर्णन..... १२८
१०-भृगु, अग्नि और अग्निष्वात्तादि पितरोंकी सन्तानका वर्णन..... ४५७-भुर्भुवः आदि सात ऊर्ध्वलोकोंका वृत्तान्त..... १३२
११-ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट..... ४६८-सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन..... १३५
१२-ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान्‌का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान..... ५१९-ज्योतिष्चक्र और शिशुमारचक्र..... १४३
१३-राजा वेन और पृथुका चरित्र..... ५८१०-द्वादश सूर्योंके नाम एवं अधिकारियोंका वर्णन..... १४५
१४-प्राचीनबर्हिका जन्म और प्रचेताओंका भगवदाराधन..... ६५११-सूर्यशक्ति एवं वैष्णवी शक्तिका वर्णन..... १४७
१५-प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी साठ कन्याओंके वंशका वर्णन..... ६८१२-नवग्रहोंका वर्णन तथा लोकान्तर-सम्बन्धी व्याख्यानका उपसंहार..... १४९
१६-नृसिंहावतारविषयक प्रश्न..... ८०१३-भरत-चरित्र..... १५३
१७-हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित..... ८११४-जडभरत और सौवीरनरेशका संवाद..... १६०
१८-प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति..... ८९१५-ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानोपदेश..... १६३
१९-प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्‌का सुदर्शनचक्रको भेजना..... ९२१६-ऋभुकी आज्ञासे निदाघका अपने घरको लौटना..... १६५
तृतीय अंश
१-पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन..... १६९
२-सावर्णिमनुकी उत्पत्ति तथा आगामी सात मन्वन्तरोंके मनु, मनुपुत्र, देवता, इन्द्र और सप्तर्षियोंका वर्णन..... १७२
३-चतुर्युगानुसार भिन्न-भिन्न व्यासोंके नाम तथा ब्रह्मज्ञानके माहात्म्यका वर्णन..... १७६
४-ऋग्वेदकी शाखाओंका विस्तार..... १७८

[ ५ ]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
५-शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजुः-शाखाओंका वर्णन१८०१३-सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा२७६
६-सामवेदकी शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओंके विभागका वर्णन१८२१४-अनमित्र और अन्धकके वंशका वर्णन२८७
७-यमगीता१८५१५-शिशुपालके पूर्व-जन्मान्तरोंका तथा वसुदेवजीकी सन्ततिका वर्णन२८९
८-विष्णुभगवान्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन१८९१६-तुर्वसुके वंशका वर्णन२९३
९-ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका वर्णन१९२१७-द्रुह्युवंश२९३
१०-जातकर्म, नामकरण और विवाह-संस्कारकी विधि१९४१८-अनुवंश२९३
११-गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन१९६१९-पुरुवंश२९५
१२-गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन२०६२०-कुरुके वंशका वर्णन२९८
१३-आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार२०९२१-भविष्यमें होनेवाले राजाओंका वर्णन३०१
१४-श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार२१२२२-भविष्यमें होनेवाले इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका वर्णन३०२
१५-श्राद्ध-विधि२१५२३-मगधवंशका वर्णन३०३
१६-श्राद्ध-कर्ममें विहित और अविहित वस्तुओंका विचार२१९२४-कलियुगी राजाओं और कलिधर्मोंका वर्णन तथा राजवंश-वर्णनका उपसंहार३०३
१७-नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान्की शरणमें जाना और भगवान्का मायामोहको प्रकट करना२२१पंचम अंश
१८-मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा२२४१-वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान्का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम३१३
चतुर्थ अंश२-भगवान्का गर्भ-प्रवेश तथा देवगणद्वारा देवकीकी स्तुति३२०
१-वैवस्वतमनुके वंशका विवरण२३३३-भगवान्का आविर्भाव तथा योगमाया-द्वारा कंसकी वंचना३२१
२-इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरि-चरित्र२३८४-वसुदेव-देवकीका कारागारसे मोक्ष३२४
३-मान्धाताकी सन्तति, त्रिशंकुका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उत्पत्ति और विजय२४८५-पूतना-वध३२५
४-सगर, सौदासा, खट्वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन२५१६-शकटभंजन, यमलार्जुन-उद्धार, व्रज-वासियोंका गोकुलसे वृन्दावनमें जाना और वर्षा-वर्णन३२७
५-निमि-चरित्र और निमिवंशका वर्णन२५८७-कालिय-दमन३३१
६-सोमवंशका वर्णन; चन्द्रमा, बुध और पुरूरवाका चरित्र२६०८-धेनुकासुर-वध३३७
७-जह्नुका गंगापान तथा जमदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति२६५९-प्रलम्ब-वध३३८
८-काश्यपवंशका वर्णन२६७१०-शरद्वर्णन तथा गोवर्धनकी पूजा३४१
९-महाराज रजि और उनके पुत्रोंका चरित्र२६८११-इन्द्रका कोप और श्रीकृष्णका गोवर्धन-धारण३४५
१०-ययातिका चरित्र२७०१२-शक्र-कृष्ण-संवाद, कृष्ण-स्तुति३४७
११-यदुवंशका वर्णन और सहस्रार्जुनका चरित्र२७२१३-गोपीद्वारा भगवान्का प्रभाववर्णन तथा भगवान्का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना३४९
१२-यदुपुत्र क्रोष्टुका वंश२७४१४-वृषभासुर-वध३५३
१५-कंसका श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरको भेजना३५५

[ ६ ]

अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
१६-केशि-वध३५७३१-भगवान्‌का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना४००
१७-अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा३५९३२-उषा-चरित्र४०१
१८-भगवान्‌का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह३६२३३-श्रीकृष्ण और बाणासुरका युद्ध४०४
१९-भगवान्‌का मथुरा-प्रवेश, रजक-वध तथा मालीपर कृपा३६६३४-पौण्ड्रक-वध तथा काशीदहन४०८
२०-कुब्जापर कृपा, धनुर्भंग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध३६८३५-साम्बका विवाह४११
२१-उग्रसेनका राज्याभिषेक तथा भगवान्‌का विद्याध्ययन३७६३६-द्विविद-वध४१४
२२-जरासन्धकी पराजय३७८३७-ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान्‌का स्वधाम सिधारना४१५
२३-द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति३७९३८-यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित्‌का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण४२१
२४-मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी ब्रजयात्रा३८३षष्ठ अंश
२५-बलभद्रजीका ब्रज-विहार तथा यमुनाकर्षण३८४१-कलिधर्मनिरूपण४२९
२६-रुक्मिणी-हरण३८६२-श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन४३३
२७-प्रद्युम्न-हरण तथा शम्बर-वध३८७३-निमेषादि काल-मान तथा नैमित्तिक प्रलयका वर्णन४३६
२८-रुक्मीका वध३८९४-प्राकृत प्रलयका वर्णन४३९
२९-नरकासुरका वध३९१५-आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान्‌के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन४४२
३०-पारिजात-हरण३९४६-केशिध्वज और खाण्डिक्यकी कथा४४९
७-ब्रह्मयोगका निर्णय४५२
८-शिष्यपरम्परा, माहात्म्य और उपसंहार४६०

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ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः

श्रीविष्णुपुराण

प्रथम अंश

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

पहला अध्याय

ग्रन्थका उपोद्घात

श्रीसूत उवाच
ॐ पराशरं मुनिवरं कृतपौर्वाह्निकक्रियम्।<br>मैत्रेयः परिपप्रच्छ प्रणिपत्याभिवाद्य च॥ १॥**श्रीसूतजी बोले—**मैत्रेयजीने नित्यकर्मोंसे निवृत्त हुए मुनिवर पराशरजीको प्रणाम कर एवं उनके चरण छूकर पूछा—॥ १॥
त्वत्तो हि वेदाध्ययनमधीतमखिलं गुरो।<br>धर्मशास्त्राणि सर्वाणि तथाङ्गानि यथाक्रमम्॥ २॥“हे गुरुदेव! मैंने आपसे सम्पूर्ण वेद, वेदांग और सकल धर्मशास्त्रोंका क्रमशः अध्ययन किया है॥ २॥
त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ मामन्ये नाकृतश्रमम्।<br>वक्ष्यन्ति सर्वशास्त्रेषु प्रायशो येऽपि विद्विषः॥ ३॥हे मुनिश्रेष्ठ! आपकी कृपासे मेरे विपक्षी भी मेरे लिये यह नहीं कह सकेंगे कि 'मैंने सम्पूर्ण शास्त्रोंके अभ्यासमें परिश्रम नहीं किया'॥ ३॥
सोऽहमिच्छामि धर्मज्ञ श्रोतुं त्वत्तो यथा जगत्।<br>बभूव भूयश्च यथा महाभाग भविष्यति॥ ४॥हे धर्मज्ञ! हे महाभाग! अब मैं आपके मुखारविन्दसे यह सुनना चाहता हूँ कि यह जगत् किस प्रकार उत्पन्न हुआ और आगे भी (दूसरे कल्पके आरम्भमें) कैसे होगा ?॥ ४॥
यन्मयं च जगद्ब्रह्मन्द्यतश्चैतच्चराचरम्।<br>लीनमासीद्यथा यत्र लयमेष्यति यत्र च॥ ५॥तथा हे ब्रह्मन्! इस संसारका उपादान-कारण क्या है? यह सम्पूर्ण चराचर किससे उत्पन्न हुआ है? यह पहले किसमें लीन था और आगे किसमें लीन हो जायगा ?॥ ५॥
यत्प्रमाणानि भूतानि देवादीनां च सम्भवम्।<br>समुद्रपर्वतानां च संस्थानं च यथा भुवः॥ ६॥इसके अतिरिक्त [आकाश आदि] भूतोंका परिमाण, समुद्र, पर्वत तथा देवता आदिकी उत्पत्ति, पृथिवीका अधिष्ठान
सूर्यादीनां च संस्थानं प्रमाणं मुनिसत्तम।<br>देवादीनां तथा वंशान्मन्वूनमन्वन्तराणि च॥ ७॥और सूर्य आदिका परिमाण तथा उनका आधार, देवता आदिके वंश, मनु, मन्वन्तर,
कल्पान् कल्पविभागांश्च चातुर्युगविकल्पितान्।<br>कल्पान्तस्य स्वरूपं च युगधर्मांश्च कृत्स्नशः॥ ८॥[बार-बार आनेवाले] चारों युगोंमें विभक्त कल्प और कल्पोंके विभाग, प्रलयका स्वरूप, युगोंके

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* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० १

देवर्षिपार्थिवानां च चरितं यन्महामुने।
वेदशाखाप्रणयनं यथावद्व्यासकर्तृकम्॥ ९
धर्मंश्च ब्राह्मणादीनां तथा चाश्रमवासिनाम्।
श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं त्वत्तो वासिष्ठनन्दन॥ १०
ब्रह्मन्प्रसादप्रवणं कुरुष्व मयि मानसम्।
येनाहमेतज्जानीयां त्वत्प्रसादान्महामुने॥ ११
श्रीपराशर उवाच
साधु मैत्रेय धर्मज्ञ स्मारितोऽस्मि पुरातनम्।
पितुः पिता मे भगवान् वसिष्ठो यदुवाच ह॥ १२
विश्वामित्रप्रयुक्तेन रक्षसा भक्षितः पुरा।
श्रुतस्तातस्ततः क्रोधो मैत्रेयाभून्ममातुलः॥ १३
ततोऽहं रक्षसां सत्रं विनाशाय समारभम्।
भस्मीभूताश्च शतशस्तस्मिन्सत्रे निशाचराः॥ १४
ततः सङ्क्षीयमाणेषु तेषु रक्षस्स्वशेषतः।
मामुवाच महाभागो वसिष्ठो मत्पितामहः॥ १५
अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि।
राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं हि तत्॥ १६
मूढानामेव भवति क्रोधो ज्ञानवतां कुतः।
हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान्॥ १७
सञ्चितस्यापि महता वत्स क्लेशेन मानवैः।
यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः परः॥ १८
स्वर्गापवर्गव्यासेधकारणं परमर्षयः।
वर्जयन्ति सदा क्रोधं तात मा तद्वशो भव॥ १९
अलं निशाचरैर्दग्धैर्दीनैरनपकारिभिः।
सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः॥ २०
एवं तातेन तेनाहमनुनीतो महात्मना।
उपसंहृतवान्सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात्॥ २१
ततः प्रीतः स भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः।
सम्प्राप्तश्च तदा तत्र पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः॥ २२
पितामहेन दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः।
मामुवाच महाभागो मैत्रेय पुलहाग्रजः॥ २३


[हिन्दी अनुवाद]

पृथक्-पृथक् सम्पूर्ण धर्म, देवर्षि और राजर्षियोंके चरित्र, श्रीव्यासजीकृत वैदिक शाखाओंकी यथावत् रचना तथा ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंके धर्म—ये सब, हे महामुनि शक्तिनन्दन! मैं आपसे सुनना चाहता हूँ॥६—१०॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरे प्रति अपना चित्त प्रसादोन्मुख कीजिये जिससे हे महामुने! मैं आपकी कृपासे यह सब जान सकूँ'॥११॥

श्रीपराशरजी बोले—"हे धर्मज्ञ मैत्रेय! मेरे पिताजीके पिता श्रीवसिष्ठजीने जिसका वर्णन किया था, उस पूर्व प्रसंगका तुमने मुझे अच्छा स्मरण कराया—[इसके लिये तुम धन्यवादके पात्र हो]॥१२॥ हे मैत्रेय! जब मैंने सुना कि पिताजीको विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसने खा लिया है, तो मुझको बड़ा भारी क्रोध हुआ॥१३॥ तब राक्षसोंका ध्वंस करनेके लिये मैंने यज्ञ करना आरम्भ किया। उस यज्ञमें सैकड़ों राक्षस जलकर भस्म हो गये॥१४॥ इस प्रकार उन राक्षसोंको सर्वथा नष्ट होते देख मेरे महाभाग पितामह वसिष्ठजी मुझसे बोले—॥१५॥ "हे वत्स! अत्यन्त क्रोध करना ठीक नहीं, अब इसे शान्त करो। राक्षसोंका कुछ भी अपराध नहीं है, तुम्हारे पिताके लिये तो ऐसा ही होना था॥१६॥ क्रोध तो मूर्खोंको ही हुआ करता है, विचारवानोंको भला कैसे हो सकता है? भैया! भला कौन किसीको मारता है? पुरुष स्वयं ही अपने कियेका फल भोगता है॥१७॥ हे प्रियवर! यह क्रोध तो मनुष्यके अत्यन्त कष्टसे संचित यश और तपका भी प्रबल नाशक है॥१८॥ हे तात! इस लोक और परलोक दोनोंको बिगाड़नेवाले इस क्रोधका महर्षिगण सर्वदा त्याग करते हैं, इसलिये तू इसके वशीभूत मत हो॥१९॥ अब इन बेचारे निरपराध राक्षसोंको दग्ध करनेसे कोई लाभ नहीं; अपने इस यज्ञको समाप्त करो। साधुओंका धन तो सदा क्षमा ही है'॥२०॥

महात्मा दादाजीके इस प्रकार समझानेपर उनकी बातोंके गौरवका विचार करके मैंने वह यज्ञ समाप्त कर दिया॥२१॥ इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी बहुत प्रसन्न हुए। उसी समय ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यजी वहाँ आये॥२२॥ हे मैत्रेय! पितामह [वसिष्ठजी]-ने उन्हें अर्घ्य दिया, तब वे महर्षि पुलहके ज्येष्ठ भ्राता महाभाग पुलस्त्यजी आसन ग्रहण करके मुझसे बोले॥२३॥

अ० २ ] * प्रथम अंश * ९


पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
वैरे महति यद्वाक्याद्गुरोरद्याश्रिता क्षमा।<br>त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्च्छास्त्राणि वेत्स्यति ॥ २४तुमने, चित्तमें बड़ा वैरभाव रहनेपर भी अपने बड़े-बूढ़े वसिष्ठजीके कहनेसे क्षमा स्वीकार की है, इसलिये तुम सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता होगे ॥ २४ ॥
सन्ततेर्न ममोच्छेदः क्रुद्धेनापि यतः कृतः।<br>त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम् ॥ २५हे महाभाग ! अत्यन्त क्रोधित होनेपर भी तुमने मेरी सन्तानका सर्वथा मूलोच्छेद नहीं किया; अतः मैं तुम्हें एक और उत्तम वर देता हूँ ॥ २५ ॥
पुराणसंहिताकर्ता भवान्वत्स भविष्यति।<br>देवतापारमार्थ्यं च यथावद्वेत्स्यते भवान् ॥ २६हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके वक्ता होगे और देवताओंके यथार्थ स्वरूपको जानोगे ॥ २६ ॥
प्रवृत्ते च निवृत्ते च कर्मण्यस्तमला मतिः।<br>मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति ॥ २७तथा मेरे प्रसादसे तुम्हारी निर्मल बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति (भोग और मोक्ष)-के उत्पन्न करनेवाले कर्मोंमें निःसन्देह हो जायगी ॥ २७ ॥
ततश्च प्राह भगवान्वसिष्ठो मे पितामहः।<br>पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति ॥ २८[पुलस्त्यजीके इस तरह कहनेके अनन्तर] फिर मेरे पितामह भगवान् वसिष्ठजी बोले “पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य होगा” ॥ २८ ॥
इति पूर्वं वसिष्ठेन पुलस्त्येन च धीमता।<br>यदुक्तं तत्स्मृतिं याति त्वत्प्रश्नादखिलं मम ॥ २९हे मैत्रेय ! इस प्रकार पूर्वकालमें बुद्धिमान् वसिष्ठजी और पुलस्त्यजीने जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हारे प्रश्नसे मुझे स्मरण हो आया है ॥ २९ ॥
सोऽहं वदाम्यशेषं ते मैत्रेय परिपृच्छते।<br>पुराणसंहितां सम्यक् तां निबोध यथातथम् ॥ ३०अतः हे मैत्रेय ! तुम्हारे पूछनेसे मैं उस सम्पूर्ण पुराणसंहिताको तुम्हें सुनाता हूँ; तुम उसे भली प्रकार ध्यान देकर सुनो ॥ ३० ॥
विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्।<br>स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः ॥ ३१यह जगत् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है, वे ही इसकी स्थिति और लयके कर्ता हैं तथा यह जगत् भी वे ही हैं ॥ ३१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमऽशे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


दूसरा अध्याय

चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्‌के उत्पत्ति-क्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने।<br>सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ १<br><br>नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च।<br>वासुदेवाय ताराय सर्गस्थित्यन्तकारिणे ॥ २जो ब्रह्मा, विष्णु और शंकररूपसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कारण हैं तथा अपने भक्तोंको संसार-सागरसे तारनेवाले हैं, उन विकाररहित, शुद्ध, अविनाशी, परमात्मा, सर्वदा एकरस, सर्वविजयी भगवान् वासुदेव विष्णुको नमस्कार है ॥ १-२ ॥
एकानेकस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः।<br>अव्यक्तव्यक्तरूपाय विष्णवे मुक्तिहेतवे ॥ ३जो एक होकर भी नाना रूपवाले हैं, स्थूल-सूक्ष्ममय हैं, अव्यक्त (कारण) एवं व्यक्त (कार्य) रूप हैं तथा [अपने अनन्य भक्तोंकी] मुक्तिके कारण हैं, [उन श्रीविष्णुभगवान्‌को नमस्कार है] ॥ ३ ॥
सर्गस्थितिविनाशानां जगतो यो जगन्मयः।<br>मूलभूतो नमस्तस्मै विष्णवे परमात्मने ॥ ४जो विश्वरूप प्रभु विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके मूल-कारण हैं, उन परमात्मा विष्णुभगवान्‌को नमस्कार है ॥ ४ ॥

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१० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
आधारभूतं विश्वस्याप्यणीयांसमणीयसाम् ।<br>प्रणम्य सर्वभूतस्थमच्युतं पुरुषोत्तमम् ॥ ५<br><br>ज्ञानस्वरूपमत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः ।<br>तमेवार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥ ६<br><br>विष्णुं ग्रसिष्णुं विश्वस्य स्थितौ सर्गे तथा प्रभुम् ।<br>प्रणम्य जगतामीशमजमक्षयमव्ययम् ॥ ७<br><br>कथयामि यथापूर्वं दक्षाद्यैर्मुनिसत्तमैः ।<br>पृष्टः प्रोवाच भगवानब्जयोनिः पितामहः ॥ ८जो विश्वके अधिष्ठान हैं, अतिसूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, सर्व प्राणियोंमें स्थित पुरुषोत्तम और अविनाशी हैं, जो परमार्थतः (वास्तवमें) अति निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्था रूपसे प्रतीत होते हैं, तथा जो [कालस्वरूपसे] जगत्की उत्पत्ति और स्थितिमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, उन जगदीश्वर, अजन्मा, अक्षय और अव्यय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके तुम्हें वह सारा प्रसंग क्रमशः सुनाता हूँ जो दक्ष आदि मुनिश्रेष्ठोंके पूछनेपर पितामह भगवान् ब्रह्माजीने उनसे कहा था॥ ५–८॥
तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदातटे ।<br>सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च ॥ ९वह प्रसंग दक्ष आदि मुनियोंने नर्मदा-तटपर राजा पुरुकुत्सको सुनाया था तथा पुरुकुत्सने सारस्वतसे और सारस्वतने मुझसे कहा था॥ ९॥
परः पराणां परमः परमात्मात्मसंस्थितः ।<br>रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जितः ॥ १०<br><br>अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्द्धिजन्मभिः ।<br>वर्जितः शक्यते वक्तुं यः सदास्तीति केवलम् ॥ ११<br><br>सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः ।<br>ततः स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यते ॥ १२<br><br>तद्ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम् ।<br>एकस्वरूपं तु सदा हेयाभावाच्च निर्मलम् ॥ १३'जो पर (प्रकृति)-से भी पर, परमश्रेष्ठ, अन्तरात्मामें स्थित परमात्मा, रूप, वर्ण, नाम और विशेषण आदिसे रहित है; जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश—इन छः विकारोंका सर्वथा अभाव है; जिसको सर्वदा केवल 'है' इतना ही कह सकते हैं, तथा जिनके लिये यह प्रसिद्ध है कि 'वे सर्वत्र हैं और उनमें समस्त विश्व बसा हुआ है—इसलिये ही विद्वान् जिसको वासुदेव कहते हैं' वही नित्य, अजन्मा, अक्षय, अव्यय, एकरस और हेय गुणोंके अभावके कारण निर्मल परब्रह्म है॥ १०–१३॥
तदेव सर्वमेवैतद्व्यक्ताव्यक्तस्वरूपवत् ।<br>तथा पुरुषरूपेण कालरूपेण च स्थितम् ॥ १४वही इन सब व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) जगत्के रूपसे, तथा इसके साक्षी पुरुष और महाकारण कालके रूपसे स्थित है॥ १४॥
परस्य ब्रह्मणो रूपं पुरुषः प्रथमं द्विज ।<br>व्यक्ताव्यक्ते तथैवान्ये रूपे कालस्तथा परम् ॥ १५हे द्विज! परब्रह्मका प्रथम रूप पुरुष है, अव्यक्त (प्रकृति) और व्यक्त (महदादि) उसके अन्य रूप हैं तथा [सबको क्षोभित करनेवाला होनेसे] काल उसका परमरूप है॥ १५॥
प्रधानपुरुषव्यक्तकालानां परमं हि यत् ।<br>पश्यन्ति सूरयः शुद्धं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १६इस प्रकार जो प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल—इन चारोंसे परे है तथा जिसे पण्डितजन ही देख पाते हैं वही भगवान् विष्णुका परमपद है॥ १६॥
प्रधानपुरुषव्यक्तकालास्तु प्रविभागशः ।<br>रूपाणि स्थितिसर्गान्तव्यक्तिसद्भावहेतवः ॥ १७प्रधान, पुरुष, व्यक्त और काल—ये [भगवान् विष्णुके] रूप पृथक्-पृथक् संसारकी उत्पत्ति, पालन और संहारके प्रकाश तथा उत्पादनमें कारण हैं॥ १७॥
व्यक्तं विष्णुस्तथाव्यक्तं पुरुषः काल एव च ।<br>क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय ॥ १८भगवान् विष्णु जो व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष और कालरूपसे स्थित होते हैं, इसे उनकी बालवत् क्रीडा ही समझो॥ १८॥
अव्यक्तं कारणं यत्तत्प्रधानमृषिसत्तमैः ।<br>प्रोच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा नित्यं सदसदात्मकम् ॥ १९उनमेंसे अव्यक्त कारणको, जो सदसद्रूप (कारण-शक्तिविशिष्ट) और नित्य (सदा एकरस) है, श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं॥ १९॥

अ० २ ] * प्रथम अंश * ११

अक्षय्यं नान्यदाधारममेयमजरं ध्रुवम्। शब्दस्पर्शविहीनं तद्रूपादिभिरसंहितम्॥ २०

त्रिगुणं तज्जगद्योनिरनादिप्रभवाप्ययम्। तेनाग्रे सर्वमेवासीद्व्याप्तं वै प्रलयादनु॥ २१

वेदवादविदो विद्वन्नियता ब्रह्मवादिनः। पठन्ति चैतमेवार्थं प्रधानप्रतिपादकम्॥ २२

नाहो न रात्रिर्न नभो न भूमि- र्नासीत्तमो ज्योतिरभूच्च नान्यत्। श्रोत्रादिबुद्ध्यानुपलभ्यमेकं प्राधानिकं ब्रह्म पुमांस्तदासीत्॥ २३

विष्णोः स्वरूपात्परतो हि ते द्वे रूपे प्रधानं पुरुषश्च विप्र। तस्यैव तेऽन्येन धृते वियुक्ते रूपान्तरं तद्द्विज कालसंज्ञम्॥ २४

प्रकृतौ संस्थितं व्यक्तमतीतप्रलये तु यत्। तस्मात्प्राकृतसंज्ञोऽयमुच्यते प्रतिसञ्चरः॥ २५

अनादिर्भगवान्कालो नान्तोऽस्य द्विज विद्यते। अव्युच्छिन्नास्ततस्त्वेते सर्गस्थित्यन्तसंयमाः॥ २६

गुणसाम्ये ततस्तस्मिन्पृथक्पुंसि व्यवस्थिते। कालस्वरूपं तद्विष्णोर्मैत्रेय परिवर्त्तते॥ २७

ततस्तु तत्परं ब्रह्म परमात्मा जगन्मयः। सर्वगः सर्वभूतेशः सर्वात्मा परमेश्वरः॥ २८

प्रधानपुरुषौ चापि प्रविश्यात्मेच्छया हरिः। क्षोभयामास सम्प्राप्ते सर्गकाले व्ययाव्ययौ॥ २९

यथा सन्निधिमात्रेण गन्धः क्षोभाय जायते। मनसो नोपकर्तृत्वात्तथाऽसौ परमेश्वरः॥ ३०

स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च पुरुषोत्तमः। स सङ्कोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः॥ ३१

विकासाणुस्वरूपैश्च ब्रह्मरूपादिभिस्तथा। व्यक्तस्वरूपश्च तथा विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः॥ ३२


वह क्षयरहित है, उसका कोई अन्य आधार भी नहीं है तथा अप्रमेय, अजर, निश्चल शब्द-स्पर्शादिशून्य और रूपाविरहित है॥ २०॥ वह त्रिगुणमय और जगत्का कारण है तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लयसे रहित है। यह सम्पूर्ण प्रपंच प्रलयकालसे लेकर सृष्टिके आदितक उसीसे व्याप्त था॥ २१॥ हे विद्वन् ! श्रुतिके मर्मको जाननेवाले, श्रुतिपरायण ब्रह्मवेत्ता महात्मागण इसी अर्थको लक्ष्य करके प्रधानके प्रतिपादक इस (निम्नलिखित) श्लोकको कहा करते हैं— ॥ २२ ॥ 'उस समय (प्रलयकालमें) न दिन था, न रात्रि थी, न आकाश था, न पृथिवी थी, न अन्धकार था, न प्रकाश था और न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था। बस, श्रोत्रादि इन्द्रियों और बुद्धि आदिका अविषय एक प्रधान ब्रह्म और पुरुष ही था' ॥ २३ ॥

हे विप्र ! विष्णुके परम (उपाधिरहित) स्वरूपसे प्रधान और पुरुष—ये दो रूप हुए; उसी (विष्णु)-के जिस अन्य रूपके द्वारा वे दोनों [सृष्टि और प्रलयकालमें] संयुक्त और वियुक्त होते हैं, उस रूपान्तरका ही नाम 'काल' है॥ २४॥ बीते हुए प्रलयकालमें यह व्यक्त प्रपंच प्रकृतिमें लीन था, इसलिये प्रपंचके इस प्रलयको प्राकृत प्रलय कहते हैं॥ २५॥ हे द्विज ! कालरूप भगवान् अनादि हैं, इनका अन्त नहीं है इसलिये संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी कभी नहीं रुकते [ वे प्रवाहरूपसे निरन्तर होते रहते हैं ] ॥ २६ ॥

हे मैत्रेय ! प्रलयकालमें प्रधान (प्रकृति)-के साम्यावस्थामें स्थित हो जानेपर और पुरुषके प्रकृतिसे पृथक् स्थित हो जानेपर विष्णुभगवान्का कालरूप [ इन दोनोंको धारण करनेके लिये ] प्रवृत्त होता है॥ २७॥ तदनन्तर [ सर्गकाल उपस्थित होनेपर ] उन परब्रह्म परमात्मा विश्वरूप सर्वव्यापी सर्वभूतेश्वर सर्वात्मा परमेश्वरने अपनी इच्छासे विकारी प्रधान और अविकारी पुरुषमें प्रविष्ट होकर उनको क्षोभित किया॥ २८-२९॥ जिस प्रकार क्रियाशील न होनेपर भी गन्ध अपनी सन्निधिमात्रसे ही मनको क्षुभित कर देता है उसी प्रकार परमेश्वर अपनी सन्निधिमात्रसे ही प्रधान और पुरुषको प्रेरित करते हैं॥ ३०॥ हे ब्रह्मन् ! वह पुरुषोत्तम ही इनको क्षोभित करनेवाले हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं तथा संकोच (साम्य) और विकास (क्षोभ) युक्त प्रधानरूपसे भी वे ही स्थित हैं॥ ३१॥ ब्रह्मादि समस्त ईश्वरोंके ईश्वर वे विष्णु ही समष्टि-व्यष्टिरूप, ब्रह्मादि जीवरूप तथा महत्तत्त्वरूपसे स्थित हैं॥ ३२॥

१२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


गुणसाम्यात्ततस्तस्मात्क्षेत्रज्ञाधिष्ठितान्मुने।
गुणव्यञ्जनसम्भूतः सर्गकाले द्विजोत्तम॥ ३३

प्रधानतत्त्वमुद्भूतं महान्तं तत्समावृणोत्।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्॥ ३४

प्रधानतत्त्वेन समं त्वचा बीजमिवावृतम्।
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः॥ ३५

त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्त्वादजायत।
भूतेन्द्रियाणां हेतुस्स त्रिगुणत्वान्महामुने।
यथा प्रधानेन महान्महता स तथावृतः॥ ३६

भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः।
ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम्॥ ३७

शब्दमात्रं तथाकाशं भूतादिः स समावृणोत्।
आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह॥ ३८

बलवानभवद्वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः।
आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्॥ ३९

ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह।
ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते॥ ४०

स्पर्शमात्रं तु वै वायु रूपमात्रं समावृणोत्।
ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह॥ ४१

सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि च।
रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्रं समावृणोत्॥ ४२

विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससर्जिरै।
सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः॥ ४३

तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता॥ ४४

तन्मात्राण्यविशेषाणि अविशेषास्ततो हि ते॥ ४५

न शान्ता नापि घोरास्ते न मूढाश्चाविशेषिणः।
भूततन्मात्रसर्गोऽयमहङ्कारात्तु तामसात्॥ ४६

तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश।
एकादशं मनश्चात्र देवा वैकारिकाः स्मृताः॥ ४७


हिन्दी अनुवाद

हे द्विजश्रेष्ठ! सर्गकालके प्राप्त होनेपर गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रधान जब विष्णुके क्षेत्रज्ञरूपसे अधिष्ठित हुआ तो उससे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति हुई॥ ३३॥ उत्पन्न हुए महान्‌को प्रधानतत्त्वने आवृत किया; महत्तत्त्व सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारका है। किन्तु जिस प्रकार बीज छिलकेसे समभावसे ढँका रहता है वैसे ही यह त्रिविध महत्तत्त्व प्रधान-तत्त्वसे सब ओर व्याप्त है। फिर त्रिविध महत्तत्त्वसे ही वैकारिक (सात्त्विक) तैजस (राजस) और तामस भूतादि तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ। हे महामुने! वह त्रिगुणात्मक होनेसे भूत और इन्द्रिय आदिका कारण है और प्रधानसे जैसे महत्तत्त्व व्याप्त है, वैसे ही महत्तत्त्वसे वह (अहंकार) व्याप्त है ॥ ३४—३६॥

भूतादि नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्द-तन्मात्रा और उससे शब्द-गुणवाले आकाशकी रचना की॥ ३७॥ उस भूतादि तामस अहंकारने शब्द-तन्मात्रारूप आकाशको व्याप्त किया। फिर [शब्द-तन्मात्रारूप] आकाशने विकृत होकर स्पर्श-तन्मात्राको रचा॥ ३८॥ उस (स्पर्श-तन्मात्रा)-से बलवान् वायु हुआ, उसका गुण स्पर्श माना गया है। शब्द-तन्मात्रारूप आकाशने स्पर्श-तन्मात्रावाले वायुको आवृत किया है॥ ३९॥

फिर [स्पर्श-तन्मात्रारूप] वायुने विकृत होकर रूप-तन्मात्राकी सृष्टि की। (रूप-तन्मात्रायुक्त) वायुसे तेज उत्पन्न हुआ है, उसका गुण रूप कहा जाता है॥ ४०॥ स्पर्श-तन्मात्रारूप वायुने रूप-तन्मात्रावाले तेजको आवृत किया। फिर [रूप-तन्मात्रामय] तेजने भी विकृत होकर रस-तन्मात्राकी रचना की॥ ४१॥ उस (रस-तन्मात्रारूप)-से रस-गुणवाला जल हुआ। रस-तन्मात्रावाले जलको रूप-तन्मात्रामय तेजने आवृत किया॥ ४२॥

[रस-तन्मात्रारूप] जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध-तन्मात्राकी सृष्टि की, उससे पृथिवी उत्पन्न हुई है जिसका गुण गन्ध माना जाता है॥ ४३॥ उन-उन आकाशादि भूतोंमें तन्मात्रा है [अर्थात् केवल उनके गुण शब्दादि ही हैं] इसलिये वे तन्मात्रा (गुणरूप) ही कहे गये हैं॥ ४४॥

तन्मात्राओंमें विशेष भाव नहीं है इसलिये उनकी अविशेष संज्ञा है॥ ४५॥ वे अविशेष तन्मात्राएँ शान्त, घोर अथवा मूढ़ नहीं हैं [अर्थात् उनका सुख-दुःख या मोहरूपसे अनुभव नहीं हो सकता] इस प्रकार तामस अहंकारसे यह भूत-तन्मात्रारूप सर्ग हुआ है॥ ४६॥

दस इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारसे और उनके अधिष्ठाता देवता वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। इस प्रकार इन्द्रियोंके अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवाँ मन वैकारिक (सात्त्विक) हैं॥ ४७॥

अ० २ ] * प्रथम अंश * १३


त्वक् चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पञ्चमम्।
शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि वै द्विज ॥ ४८
पायूपस्थौ करौ पादौ वाक् च मैत्रेय पञ्चमी।
विसर्गाशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते ॥ ४९
आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा।
शब्दादिभिर्गुणैर्ब्रह्मन्संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५०
शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ॥ ५१
नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना।
नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ५२
समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयाः।
एकसङ्घातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५३
पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च।
महदाद्या विशेषाsub:न्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ५४
तत्क्रमेण विवृद्धं सज्जलबुद्बुदवत्समम्।
भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे महत्तदुदकेशयम्।
प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥ ५५
तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ व्यक्तरूपो जगत्पतिः।
विष्णुर्ब्रह्मस्वरूपेण स्वयमेव व्यवस्थितः ॥ ५६
मेरुरुल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः।
गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन्सुमहात्मनः ॥ ५७
साद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः।
तस्मिन्नण्डेऽभवद्विप्र सदेवासुरमानुषः ॥ ५८
वारिवह्न्यनिलाकाशैस्ततो भूतादिना बहिः।
वृतं दशगुणैरण्डं भूतादिर्महता तथा ॥ ५९
अव्यक्तेनावृतो ब्रह्मंस्तैः सर्वैः सहितो महान्।
एभिरावरणेरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम्।
नारिकेलफलस्यान्तर्बीजं बाह्यदलैरिव ॥ ६०
जुषन् रजो गुणं तत्र स्वयं विश्वेश्वरो हरिः।
ब्रह्मा भूत्वास्य जगतो विसृष्टौ सम्प्रवर्त्तते ॥ ६१


हे द्विज! त्वक्, चक्षु, नासिका, जिह्वा और श्रोत्र—ये पाँचों बुद्धिकी सहायतासे शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं॥ ४८॥ हे मैत्रेय! पायु (गुदा), उपस्थ (लिंग), हस्त, पाद और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। इनके कर्म [मल-मूत्रका] त्याग, शिल्प, गति और वचन बतलाये जाते हैं॥ ४९॥ आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी—ये पाँचों भूत उत्तरोत्तर (क्रमशः) शब्द-स्पर्श आदि पाँच गुणोंसे युक्त हैं॥ ५०॥ ये पाँचों भूत शान्त घोर और मूढ हैं [अर्थात् सुख, दुःख और मोहयुक्त हैं] अतः ये विशेष कहलाते हैं* ॥ ५१ ॥

इन भूतोंमें पृथक्-पृथक् नाना शक्तियाँ हैं। अतः वे परस्पर पूर्णतया मिले बिना संसारकी रचना नहीं कर सके॥ ५२॥ इसलिये एक-दूसरेके आश्रय रहनेवाले और एक ही संघातकी उत्पत्तिके लक्ष्यवाले महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त प्रकृतिके इन सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधान-तत्त्वके अनुग्रहसे अण्डकी उत्पत्ति की॥ ५३-५४॥ हे महाबुद्धे! जलके बुलबुलेके समान क्रमशः भूतोंसे बढ़ा हुआ वह गोलाकार और जलपर स्थित महान् अण्ड ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) रूप विष्णुका अति उत्तम प्राकृत आधार हुआ॥ ५५॥ उसमें वे अव्यक्त-स्वरूप जगत्पति विष्णु व्यक्त हिरण्यगर्भरूपसे स्वयं ही विराजमान हुए॥ ५६॥ उन महात्मा हिरण्यगर्भका सुमेरु उल्ब (गर्भको ढँकनेवाली झिल्ली), अन्य पर्वत, जरायु (गर्भशय) तथा समुद्र गर्भशयस्थ रस था॥ ५७॥ हे विप्र! उस अण्डमें ही पर्वत और द्वीपादिके सहित समुद्र, ग्रह-गणके सहित सम्पूर्ण लोक तथा देव, असुर और मनुष्य आदि विविध प्राणिवर्ग प्रकट हुए॥ ५८॥ वह अण्ड पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा दस-दस-गुण अधिक जल, अग्नि, वायु, आकाश और भूतादि अर्थात् तामस-अहंकारसे आवृत है तथा भूतादि महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है॥ ५९॥ और इन सबके सहित वह महत्तत्त्व भी अव्यक्त प्रधानसे आवृत है। इस प्रकार जैसे नारियलके फलका भीतरी बीज बाहरसे कितने ही छिलकोंसे ढँका रहता है वैसे ही यह अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे घिरा हुआ है॥ ६०॥

उसमें स्थित हुए स्वयं विश्वेश्वर भगवान् विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुणका आश्रय लेकर इस संसारकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं॥ ६१॥


* परस्पर मिलनेसे सभी भूत शान्त, घोर और मूढ प्रतीत होते हैं, पृथक्-पृथक् तो पृथिवी और जल शान्त हैं, तेज और वायु घोर हैं तथा आकाश मूढ है।

१४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३
सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना।<br>सत्त्वभृद्भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥ ६२<br><br>तमोद्रेकी च कल्पान्ते रुद्ररूपी जनार्दनः।<br>मैत्रेयाखिलभूतानि भक्षयत्यतिदारुणः ॥ ६३<br><br>भक्षयित्वा च भूतानि जगत्येकार्णवीकृते।<br>नागपर्यङ्कशयने शेते च परमेश्वरः ॥ ६४<br><br>प्रबुद्धश्च पुनः सृष्टिं करोति ब्रह्मारूपधृक् ॥ ६५<br><br>सृष्टिस्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्।<br>स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दनः ॥ ६६<br><br>स्रष्टा सृजति चात्मानं विष्णुः पाल्यं च पाति च।<br>उपसंह्रियते चान्ते संहर्ता च स्वयं प्रभुः ॥ ६७<br><br>पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।<br>सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज्जगत् ॥ ६८<br><br>स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्ययः।<br>सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम् ॥ ६९<br><br>स एव सृज्यः स च सर्गकर्ता<br>   स एव पात्यत्ति च पाल्यते च।<br>ब्रह्माद्यवस्थाभिरशेषमूर्ति-<br>   र्विष्णुर्वरिष्ठो वरदो वरेण्यः ॥ ७०तथा रचना हो जानेपर सत्त्वगुण-विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यन्त युग-युगमें पालन करते हैं॥ ६२॥ हे मैत्रेय! फिर कल्पका अन्त होनेपर अति दारुण तमःप्रधान रुद्ररूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतोंका भक्षण कर लेते हैं॥ ६३॥ इस प्रकार समस्त भूतोंका भक्षण कर संसारको जलमय करके वे परमेश्वर शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ६४॥ जगनेपर ब्रह्मारूप होकर वे फिर जगत्‌की रचना करते हैं॥ ६५॥ वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन संज्ञाओंको धारण करते हैं॥ ६६॥ वे प्रभु विष्णु स्रष्टा (ब्रह्मा) होकर अपनी ही सृष्टि करते हैं, पालक विष्णु होकर पाल्यरूप अपना ही पालन करते हैं और अन्तमें स्वयं ही संहारक (शिव) तथा स्वयं ही उपसंहृत (लीन) होते हैं॥ ६७॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि जितना जगत् है सब पुरुषरूप है और क्योंकि वह अव्यय विष्णु ही विश्वरूप और सब भूतोंके अन्तरात्मा हैं, इसलिये ब्रह्मादि प्राणियोंमें स्थित सर्गादिक भी उन्हींके उपकारक हैं। [अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजोंद्वारा किया हुआ हवन यजमानका उपकारक होता है, उसी तरह परमात्माके रचे हुए समस्त प्राणियोंद्वारा होनेवाली सृष्टि भी उन्हींकी उपकारक है ]॥ ६८-६९॥ वे सर्वस्वरूप, श्रेष्ठ, वरदायक और वरेण्य (प्रार्थनाके योग्य) भगवान् विष्णु ही ब्रह्मा आदि अवस्थाओं‌द्वारा रचनेवाले हैं, वे ही रचे जाते हैं, वे ही पालते हैं, वे ही पालित होते हैं तथा वे ही संहार करते हैं [और स्वयं ही संहृत होते हैं ]॥ ७०॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


तीसरा अध्याय

ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप

श्रीमैत्रेय उवाच<br>निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः।<br>कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ १**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे भगवन्! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है उसका सर्गादिका कर्ता होना कैसे सिद्ध हो सकता है?॥ १॥

अ० ३ ] * प्रथम अंश * १५


श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय!
शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः।<br>यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः।<br>भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥ २समस्त भाव-पदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य-ज्ञानकी विषय होती हैं; [उनमें कोई युक्ति काम नहीं देती] अतः अग्निकी शक्ति उष्णताके समान ब्रह्मकी भी सर्गादि-रचनारूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं॥ २॥
तन्निबोध यथा सर्गे भगवान्सम्प्रवर्त्तते।<br>नारायणाख्यो भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३<br>उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्नित्यमेवोपचारतः॥ ४अब जिस प्रकार नारायण नामक लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं सो सुनो। हे विद्वन्! वे सदा उपचारसे ही ‘उत्पन्न हुए’ कहलाते हैं॥ ३-४॥
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत्पराख्यं तदर्द्धं च परार्द्धमभिधीयते॥ ५उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी कही जाती है। उस (सौ वर्ष)-का नाम पर है, उसका आधा परार्द्ध कहलाता है॥ ५॥
कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ।<br>तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ६<br>अन्येषां चैव जन्तूनां चराणामचराश्च ये।<br>भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ७हे अनघ! मैंने जो तुमसे विष्णुभगवान्का कालस्वरूप कहा था उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी तथा और भी जो पृथिवी, पर्वत, समुद्र आदि चराचर जीव हैं उनकी आयुका परिमाण किया जाता है॥ ६-७॥
काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम।<br>काष्ठा त्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः॥ ८हे मुनिश्रेष्ठ! पन्द्रह निमेषको काष्ठा कहते हैं, तीस काष्ठाकी एक कला तथा तीस कलाका एक मुहूर्त होता है॥ ८॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ९तीस मुहूर्तका मनुष्यका एक दिन-रात कहा जाता है और उतने ही दिन-रातका दो पक्षयुक्त एक मास होता है॥ ९॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ १०छः महीनोंका एक अयन और दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन मिलकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन॥ १०॥
दिव्यैर्वर्षसहस्त्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११देवताओंके बारह हजार वर्षोंके सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग नामक चार युग होते हैं। उनका अलग-अलग परिमाण मैं तुम्हें सुनाता हूँ॥ ११॥
चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्।<br>दिव्याब्दानां सहस्त्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२पुरातत्त्वके जाननेवाले सत्युग आदिका परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष बतलाते हैं॥ १२॥
तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते।<br>सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ वर्षकी सन्ध्या बतायी जाती है और युगके पीछे उतने ही परिमाणवाले सन्ध्यांश होते हैं [अर्थात् सत्युग आदिके पूर्व क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ दिव्य वर्षकी सन्ध्याएँ और इतने ही वर्षके सन्ध्यांश होते हैं]॥ १३॥
सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम।<br>युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः॥ १४हे मुनिश्रेष्ठ! इन सन्ध्या और सन्ध्यांशोंके बीचका जितना काल होता है, उसे ही सत्युग आदि नामवाले युग जानना चाहिये॥ १४॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम्।<br>प्रोच्यते तत्सहस्त्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने॥ १५हे मुने! सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलि ये मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं; ऐसे हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ १५॥
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश।<br>भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६हे ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनो॥ १६॥
सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः।<br>एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनुके पुत्र राजालोग [पूर्वकल्पानुसार] एक ही कालमें रचे जाते हैं और एक ही कालमें उनका संहार किया जाता है॥ १७॥

१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४


चतुर्युगाणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः।
मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम ॥ १८

अष्टौ शत सहस्त्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम्।
द्विपञ्चाशत्तथान्यनि सहस्त्राण्यधिकानि तु ॥ १९

त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज।
सप्तषष्टिस्तथान्यनि नियुतानि महामुने ॥ २०

विंशतिस्तु सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना।
मन्वन्तरस्य सङ्ख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१

चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्ममहः स्मृतम्।
ब्राह्मो नैमित्तिको नाम तस्यान्ते प्रतिसञ्चरः ॥ २२

तदा हि दह्यते सर्वं त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम्।
जनं प्रयान्ति तापार्ता महर्लोकनिवासिनः ॥ २३

एकार्णवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा नारायणात्मकः।
भोगिशय्यां गतः शेते त्रैलोक्यग्रासबृंहितः ॥ २४

जनस्थैर्योगिभिर्देवैश्चिन्त्यमानोऽब्जसम्भवः।
तत्प्रमाणां हि तां रात्रिं तदन्ते सृजते पुनः ॥ २५

एवं तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशतं च यत्।
शतं हि तस्य वर्षाणां परमायुर्महात्मनः ॥ २६

एकमस्य व्यतीतं तु परार्द्धं ब्रह्मणोऽनघ।
तस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ॥ २७

द्वितीयस्य परार्द्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज।
वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकीर्तितः ॥ २८

हे सत्तम! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक* कालका एक मन्वन्तर होता है। यही मनु और देवता आदिका काल है॥ १८॥ इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनासे एक मन्वन्तरमें आठ लाख बावन हजार वर्ष बताये जाते हैं॥ १९॥ तथा हे महामुने! मानवी वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका परिमाण पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हजार वर्ष है, इससे अधिक नहीं॥ २०-२१॥ इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका दिन होता है, इसके अनन्तर नैमित्तिक नामवाला ब्राह्म-प्रलय होता है॥ २२॥

उस समय भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक तीनों जलने लगते हैं और महर्लोकमें रहनेवाले सिद्धगण अति सन्तप्त होकर जनलोकको चले जाते हैं॥ २३॥ इस प्रकार त्रिलोकीके जलमय हो जानेपर जनलोकवासी योगियोंद्वारा ध्यान किये जाते हुए नारायणरूप कमलयोनि ब्रह्माजी त्रिलोकीके ग्राससे तृप्त होकर दिनके बराबर ही परिमाणवाली उस रात्रिमें शेषशय्यापर शयन करते हैं और उसके बीत जानेपर पुनः संसारकी सृष्टि करते हैं॥ २४-२५॥ इसी प्रकार (पक्ष, मास आदि) गणनासे ब्रह्माका एक वर्ष और फिर सौ वर्ष होते हैं। ब्रह्माके सौ वर्ष ही उस महात्मा (ब्रह्मा) की परमायु हैं॥ २६॥ हे अनघ! उन ब्रह्माजीका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था॥ २७॥ हे द्विज! इस समय वर्तमान उनके दूसरे परार्द्धका यह वाराह नामक पहला कल्प कहा गया है॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


चौथा अध्याय

ब्रह्माजीकी उत्पत्ति वराहभगवान्द्वारा पृथिवीका उद्धार और ब्रह्माजीकी लोक-रचना

श्रीमैत्रेय उवाच
ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ कल्पादौ भगवान्यथा।
ससर्ज सर्वभूतानि तदाचक्ष्व महामुने ॥ १

श्रीमैत्रेय बोले— हे महामुने! कल्पके आदिमें नारायणाख्य भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार समस्त भूतोंकी रचना की वह आप वर्णन कीजिये॥ १॥


* इकहत्तर चतुर्युगके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९८ चतुर्युग होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते हैं, अतः छः चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है, इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।


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अ० ४ ] * प्रथम अंश * १७

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—प्रजापतियोंके स्वामी नारायणस्वरूप भगवान् ब्रह्माजीने जिस प्रकार प्रजाकी सृष्टि की थी वह मुझसे सुनो॥ २॥ पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें सोकर उठनेपर सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त भगवान् ब्रह्माजीने सम्पूर्ण लोकोंको शून्यमय देखा॥ ३॥ वे भगवान् नारायण पर हैं, अचिन्त्य हैं, ब्रह्मा, शिव आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके स्थान हैं॥ ४॥ [मनु आदि स्मृतिकार] उन ब्रह्मस्वरूप श्रीनारायणदेवके विषयमें जो इस जगत्की उत्पत्ति और लयके स्थान हैं, यह श्लोक कहते हैं॥ ५॥ नर [अर्थात् पुरुष—भगवान् पुरुषोत्तम]—से उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहते हैं; वह नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (निवास-स्थान) है। इसलिये भगवान्‌को 'नारायण' कहा है॥ ६॥
प्रजाः ससर्ज भगवान्ब्रह्मा नारायणात्मकः।<br>प्रजापतिपतिर्देवो यथा तन्मे निशामय॥ २
अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः।<br>सत्त्वोद्रिक्तस्तथा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत॥ ३
नारायणः परोऽचिन्त्यः परेषामपि स प्रभुः।<br>ब्रह्मस्वरूपी भगवाननादिः सर्वसम्भवः॥ ४
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति।<br>ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवोप्ययम्॥ ५
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ ६
तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा जगत्येकार्णवीकृते।<br>अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः॥ ७सम्पूर्ण जगत् जलमय हो रहा था। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीने अनुमानसे पृथिवीको जलके भीतर जान उसे बाहर निकालनेकी इच्छासे एक दूसरा शरीर धारण किया। उन्होंने पूर्व-कल्पोंके आदिमें जैसे मत्स्य, कूर्म आदि रूप धारण किये थे वैसे ही इस वाराह कल्पके आरम्भमें वेदयज्ञमय वाराह शरीर ग्रहण किया और सम्पूर्ण जगत्की स्थितिमें तत्पर हो सबके अन्तरात्मा और अविचल रूप वे परमात्मा प्रजापति ब्रह्माजी, जो पृथिवीको धारण करनेवाले और अपने ही आश्रयसे स्थित हैं, जन-लोकस्थित सनकादि सिद्धेश्वरोंसे स्तुति किये जाते हुए जलमें प्रविष्ट हुए॥ ७–१०॥ तब उन्हें पाताललोकमें आये देख देवी वसुन्धरा अति भक्तिविनम्रा हो उनकी स्तुति करने लगी॥ ११॥
अकरोत्स्वतनुमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा।<br>मत्स्यकूर्मादिकां तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः॥ ८
वेदयज्ञमयं रूपमशेषजगतः स्थितौ।<br>स्थितः स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्मा प्रजापतिः॥ ९
जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>प्रविवेश तदा तोयमात्माधारो धराधरः॥ १०
निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम्।<br>तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुन्धरा॥ ११
पृथिव्युवाचपृथिवी बोली—हे शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करनेवाले कमलनयन भगवन्! आपको नमस्कार है। आज आप इस पातालतलसे मेरा उद्धार कीजिये। पूर्वकालमें आपहीसे मैं उत्पन्न हुई थी॥ १२॥ हे जनार्दन! पहले भी आपहीने मेरा उद्धार किया था। और हे प्रभो! मेरे तथा आकाशादि अन्य सब भूतोंके भी आप ही उपादान-कारण हैं॥ १३॥ हे परमात्मस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुरुषात्मन्! आपको नमस्कार है। हे प्रधान (कारण) और व्यक्त (कार्य) रूप! आपको नमस्कार है। हे कालस्वरूप! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ १४॥ हे प्रभो! जगत्की सृष्टि आदिके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप धारण करनेवाले आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति, पालन और नाश करनेवाले हैं॥ १५॥ और जगत्के एकार्णवरूप (जलमय) हो जानेपर, हे गोविन्द! सबको भक्षणकर अन्तमें आप ही मनीषिजनोंद्वारा चिन्तित होते हुए जलमें शयन करते हैं॥ १६॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष शङ्खचक्रगदाधर।<br>मामुद्धरास्मादद्य त्वं त्वत्तोऽहं पूर्वमुत्थिता॥ १२
त्वयाहमुद्धृता पूर्वं तन्मयाहं जनार्दन।<br>तथान्यानि च भूतानि गगनादीन्यशेषतः॥ १३
नमस्ते परमात्मन्पुरुषात्मन्नमोऽस्तु ते।<br>प्रधानव्यक्तभूताय कालभूताय ते नमः॥ १४
त्वं कर्ता सर्वभूतानां त्वं पाता त्वं विनाशकृत्।<br>सर्गादिषु प्रभो ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मरूपधृक्॥ १५
सम्भक्षयित्वा सकलं जगत्येकार्णवीकृते।<br>शेषे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः॥ १६

१८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ४

भवतो यत्परं तत्त्वं तन्न जानाति कश्चन। अवतारtargetेषु यद्रूपं तदर्चन्ति दिवौकसः ॥ १७ त्वामाराध्य परं ब्रह्म याता मुक्तिं मुमुक्षवः। वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्स्यति ॥ १८ यत्किञ्चिन्मनसा ग्राह्यं यद्ग्राह्यं चक्षुरादिभिः। बुद्ध्या च यत्परिच्छेद्यं तद्रूपमखिलं तव ॥ १९ तन्मयाहं त्वदाधारा त्वत्सृष्टा त्वत्समाश्रया। माधवीमिति लोकोऽयमभिधत्ते ततो हि माम् ॥ २० जयाखिलज्ञानमय जय स्थूलमयाव्यय। जयाऽनन्त जयाव्यक्त जय व्यक्तमय प्रभो ॥ २१ परापरात्मन्विश्वात्मञ्जय यज्ञपतेऽनघ। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारस्त्वमग्नयः ॥ २२ त्वं वेदास्त्वं तदङ्गानि त्वं यज्ञपुरुषो हरे। सूर्यादयो ग्रहास्तारा नक्षत्राण्यखिलं जगत् ॥ २३ मूर्त्तामूर्त्तमदृश्यं च दृश्यं च पुरुषोत्तम। यच्चोक्तं यच्च नैवोक्तं मयात्र परमेश्वर। तत्सर्वं त्वं नमस्तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः ॥ २४

श्रीपराशर उवाच

एवं संस्तूयमानस्तु पृथिव्या धरणीधरः। सामस्वरध्वनिः श्रीमाञ्जगर्ज परिघर्घरम् ॥ २५ ततः समुत्क्षिप्य धरां स्वदंष्ट्रया महावराहः स्फुटपद्मलोचनः। रसातलादुत्पलपत्रसन्निभः समुत्थितो नील इवाचलो महान् ॥ २६ उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहतं तत्सम्भवाम्भो जनलोकसंश्रयान्। प्रक्षालयामास हि तान्महाद्युतीन् सनन्दनादीनपकल्मषान् मुनीन् ॥ २७ प्रयान्ति तोयानि खुराग्रविक्षत- रसातलेऽधः कृतशब्दसन्तति। श्वासानिलास्ताः परितः प्रयान्ति सिद्धा जने ये नियता वसन्ति ॥ २८

हे प्रभो! आपका जो परतत्त्व है उसे तो कोई भी नहीं जानता; अतः आपका जो रूप अवतारोंमें प्रकट होता है उसीकी देवगण पूजा करते हैं ॥ १७ ॥ आप परब्रह्मकी ही आराधना करके मुमुक्षुजन मुक्त होते हैं। भला वासुदेवकी आराधना किये बिना कौन मोक्ष प्राप्त कर सकता है? ॥ १८ ॥ मनसे जो कुछ ग्रहण (संकल्प) किया जाता है, चक्षु आदि इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण (विषय) करनेयोग्य है, बुद्धिद्वारा जो कुछ विचारणीय है वह सब आपहीका रूप है ॥ १९ ॥ हे प्रभो! मैं आपहीका रूप हूँ, आपहीके आश्रित हूँ और आपहीके द्वारा रची गयी हूँ तथा आपहीकी शरणमें हूँ। इसीलिये लोकमें मुझे 'माधवी' भी कहते हैं ॥ २० ॥ हे सम्पूर्ण ज्ञानमय! हे स्थूलमय! हे अव्यय! आपकी जय हो। हे अनन्त! हे अव्यक्त! हे व्यक्तमय प्रभो! आपकी जय हो ॥ २१ ॥ हे परापर-स्वरूप! हे विश्वात्मन्! हे यज्ञपते! हे अनघ! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही ओंकार हैं और आप ही (आहवनीयादि) अग्नयाँ हैं ॥ २२ ॥ हे हरे! आप ही वेद, वेदांग और यज्ञपुरुष हैं तथा सूर्य आदि ग्रह, तारे, नक्षत्र और सम्पूर्ण जगत् भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ हे पुरुषोत्तम! हे परमेश्वर! मूर्त्त-अमूर्त्त, दृश्य-अदृश्य तथा जो कुछ मैंने कहा है और जो नहीं कहा, वह सब आप ही हैं। अतः आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है ॥ २४ ॥

श्रीपराशरजी बोले-पृथिवीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सामस्वर ही जिनकी ध्वनि है उन भगवान् धरणीधरने घर्घर शब्दसे गर्जना की ॥ २५ ॥ फिर विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले उन महावराहने अपनी डाढ़ोंसे पृथिवीको उठा लिया और वे कमल-दलके समान श्याम तथा नीलाचलके सदृश विशालकाय भगवान् रसातलसे बाहर निकले ॥ २६ ॥ निकलते समय उनके मुखके श्वाससे उछलते हुए जलने जनलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी और निष्पाप सनन्दनादि मुनीश्वरोंको भिगो दिया ॥ २७ ॥ जल बड़ा शब्द करता हुआ उनके खुरोंसे विदीर्ण हुए रसातलमें नीचेकी ओर जाने लगा और जनलोकमें रहनेवाले सिद्धगण उनके श्वास-वायुसे विक्षिप्त होकर इधर-उधर भागने लगे ॥ २८ ॥

अ० ४ ] * प्रथम अंश * १९


उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षे-
र्महावराहस्य महीं विगृह्य।
विधुन्वतो वेदमयं शरीरं
रोमान्तरस्था मुनयः स्तुवन्ति॥ २९

तं तुष्टुवुस्तोषपरीतचेतसो
लोके जने ये निवसन्ति योगिनः।
सनन्दनाद्या ह्यतिनम्रकन्धरा
धराधरं धीरतरोद्धवेक्षणम्॥ ३०

जयेश्वराणां परमेश केशव
प्रभो गदाशङ्खधरासिचक्रधृक्।
प्रसूतिनाशस्थितिहेतुरीश्वर-
स्त्वमेव नान्यत्परमं च यत्पदम्॥ ३१

पादेषु वेदास्तव यूपदंष्ट्र
दन्तेषु यज्ञाश्चितयश्च वक्त्रे।
हुताशजिह्वोऽसि तनूरुहाणि
दर्भाः प्रभो यज्ञपुमांस्त्वमेव॥ ३२

विलोचने रात्र्यहनी महात्म-
न्सर्वाश्रयं ब्रह्म परं शिरस्ते।
सूक्तान्यशेषाणि सटाकलापो
घ्राणं समस्तानि हवींषि देव॥ ३३

स्रुक्तुण्ड सामस्वरधीरनाद
प्राग्वंशकायाखिलसत्रसन्धे।
पूर्तेष्टधर्मश्रवणोऽसि देव
सनातनात्मन्भगवन्प्रसीद ॥ ३४

पदक्रमाक्रान्तभुवं भवन्त-
मादिस्थितं चाक्षर विश्वमूर्ते।
विश्वस्य विद्मः परमेश्वरोऽसि
प्रसीद नाथोऽसि परावरस्य॥ ३५

दंष्ट्राग्रविन्यस्तमशेषमेतद्-
भूमण्डलं नाथ विभाव्यते ते।
विगाहतः पद्मवनं विलग्नं
सरोजिनीपत्रमिवोढपङ्कम् ॥ ३६

द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव
यदन्तरं तद्वपुषा तवैव।
व्याप्तं जगद्व्याप्तिसमर्थदीप्ते
हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्॥ ३७


जिनकी कुक्षि जलमें भीगी हुई है वे महावराह जिस समय अपने वेदमय शरीरको कँपाते हुए पृथिवीको लेकर बाहर निकले उस समय उनकी रोमावलीमें स्थित मुनिजन स्तुति करने लगे॥ २९॥ उन निश्शंक और उन्नत दृष्टिवाले धराधर भगवान्‌की जनलोकमें रहनेवाले सनन्दनादि योगीश्वरोंने प्रसन्नचित्तसे अति नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर इस प्रकार स्तुति की॥ ३०॥

'हे ब्रह्मादि ईश्वरोंके भी परम ईश्वर! हे केशव! हे शंख-गदाधर! हे खड्ग-चक्रधारी प्रभो! आपकी जय हो। आप ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कारण हैं, तथा आप ही ईश्वर हैं और जिसे परम पद कहते हैं वह भी आपसे अतिरिक्त और कुछ नहीं है॥ ३१॥ हे यूपरूपी दाढ़ोंवाले प्रभो! आप ही यज्ञपुरुष हैं। आपके चरणोंमें चारों वेद हैं, दाँतोंमें यज्ञ हैं, मुखमें [श्येन चित आदि] चितियाँ हैं। हुताशन (यज्ञाग्नि) आपकी जिह्वा है तथा कुशाएँ रोमावलि हैं॥ ३२॥ हे महात्मन्! रात और दिन आपके नेत्र हैं तथा सबका आधारभूत परब्रह्म आपका सिर है। हे देव! वैष्णव आदि समस्त सूक्त आपके सटाकलाप (स्कन्धके रोम-गुच्छ) हैं और समग्र हवि आपके प्राण हैं॥ ३३॥ हे प्रभो! स्रुक् आपका तुण्ड (थूथनी) है, सामस्वर धीर-गम्भीर शब्द है, प्राग्वंश (यजमानगृह) शरीर है तथा सत्र शरीरकी सन्धियाँ हैं। हे देव! इष्ट (श्रौत) और पूर्त (स्मार्त) धर्म आपके कान हैं। हे नित्यस्वरूप भगवन्! प्रसन्न होइये॥ ३४॥ हे अक्षर! हे विश्वमूर्ते! अपने पाद-प्रहारसे भूमण्डलको व्याप्त करनेवाले आपको हम विश्वके आदिकारण समझते हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्‌के परमेश्वर और नाथ हैं; अतः प्रसन्न होइये॥ ३५॥ हे नाथ! आपकी डाढ़ोंपर रखा हुआ यह सम्पूर्ण भूमण्डल ऐसा प्रतीत होता है मानो कमलवनको रौंदते हुए गजराजके दाँतोंसे कोई कीचड़में सना हुआ कमलका पत्ता लगा हो॥ ३६॥ हे अनुपम प्रभावशाली प्रभो! पृथिवी और आकाशके बीचमें जितना अन्तर है वह आपके शरीरसे ही व्याप्त है। हे विश्वको व्याप्त करनेमें समर्थ तेजयुक्त प्रभो! आप विश्वका कल्याण कीजिये॥ ३७॥