भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 558 में से

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पृष्ठ 245

२३४ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १

सानुरागश्च तस्यां बुधःपुरूरवसमात्मज-<br>मुत्पादयामास॥ १२॥ जातेऽपि तस्मिन्नमिततेजोभिः<br>परमर्षिभिरिष्टिमय ऋङ्मयो यजुर्मयस्साम-<br>मयोऽथर्वणमयस्सर्ववेदमयो मनोमयो ज्ञानमयो<br>न किञ्चिन्मयोऽन्नमयो भगवान् यज्ञपुरुषस्वरूपी<br>सुद्युम्नस्य पुंस्त्वमभिलषद्भिर्यथावदिष्टस्तत्प्रसादा-<br>दिला पुनरपि सुद्युम्नोऽभवत् ॥ १३॥ तस्याप्यु-<br>त्कल गयविनतास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥<br>सुद्युम्नस्तु स्त्रीपूर्वकत्वाद्द्ब्राह्यभागं न लेभे ॥ १५ ॥<br>तत्पित्रा तु वसिष्ठवचनात्प्रतिष्ठानं नाम नगरं<br>सुद्युम्नाय दत्तं तच्चासौ पुरूरवसे प्रादात् ॥ १६ ॥<br>तदन्वयाश्च क्षत्रियास्सर्वे दिक्ष्वभवन्।<br>पृषध्रस्तु मनुपुत्रो गुरुगोवधाच्छूद्रत्वमगमत्॥ १७॥<br>मनोः पुत्रः करूषः करूषात्कारूषाः क्षत्रिया<br>महाबलपराक्रमा बभूवुः ॥ १८॥ दिष्टपुत्रस्तु<br>नाभागो वैश्यतामगमत्तस्माद्बलन्धनः<br>पुत्रोऽभवत्॥ १९॥ बलन्धनाद्वत्सप्रीतिरुदार-<br>कीर्त्तिः ॥ २०॥ वत्सप्रीतेः प्रांशुरभवत् ॥ २१ ॥<br>प्रजापतिश्च प्रांशोरेकोऽभवत् ॥ २२॥<br>ततश्च खनित्रः॥ २३॥ तस्माच्चाक्षुषः॥ २४॥<br>चाक्षुषाच्चातिबलपराक्रमो विंशोऽभवत्॥ २५॥<br>ततो विविंशकः॥ २६॥ तस्माच्च<br>खनिनेत्रः ॥ २७॥ ततश्चाति-विभूतिः ॥ २८ ॥<br>अतिविभूतेरतिबलपराक्रमः करन्धमः<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २९ ॥ तस्मादप्य-विक्षित् ॥ ३० ॥<br>अविक्षितोऽप्यतिबलपराक्रमः पुत्रो मरुत्तो<br>नामाभवत्; यस्येमावद्यापि श्लोकौ गीयेते ॥ ३१॥<br>मरुत्तस्य यथा यज्ञस्तथा कस्याभवद्भुवि ।<br>सर्वं हिरण्मयं यस्य यज्ञवस्त्वतिशोभनम्॥ ३२॥<br>अमाद्य-दिन्द्रस्सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः।<br>मरुतः परिवेष्टारस्सदस्याश्च दिवौकसः ॥ ३३॥<br>स मरुत्तश्चक्रवर्ती नरिष्यन्तनामानं पुत्रम-<br>वाप ॥ ३४॥ तस्माच्च दमः ॥ ३५ ॥ दमस्य पुत्रो राज-<br>वर्द्धनो जज्ञे ॥ ३६॥ राजवर्द्धनात्सुवृद्धिः ॥ ३७॥बुधने अनुरक्त होकर उस स्त्रीसे पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया॥ १२॥ पुरूरवाके जन्मके अनन्तर भी परमर्षिगणने सुद्युम्नको पुरुषत्वलाभकी आकांक्षासे क्रतुमय ऋग्यजुःसामाथर्वमय, सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थतः अकिंचिन्मय भगवान् यज्ञपुरुषका यथावत् यजन किया। तब उनकी कृपासे इला फिर भी सुद्युम्न हो गयी॥ १३॥ उस (सुद्युम्न)-के भी उत्कल, गय और विनत नामक तीन पुत्र हुए॥ १४॥ पहले स्त्री होनेके कारण सुद्युम्नको राज्याधिकार प्राप्त नहीं हुआ॥ १५॥ वसिष्ठजीके कहनेसे उनके पिताने उन्हें प्रतिष्ठान नामक नगर दे दिया था, वही उन्होंने पुरूरवाको दिया॥ १६॥<br>पुरूरवाकी सन्तान सम्पूर्ण दिशाओंमें फैले हुए क्षत्रियगण हुए। मनुका पृषध्र नामक पुत्र गुरुकी गौका वध करनेके कारण शूद्र हो गया॥ १७॥ मनुका पुत्र करूष था। करूषसे कारूष नामक महाबली और पराक्रमी क्षत्रियगण उत्पन्न हुए॥ १८॥ दिष्टका पुत्र नाभाग वैश्य हो गया था; उससे बलन्धन नामका पुत्र हुआ॥ १९॥ बलन्धनसे महान् कीर्तिमान् वत्सप्रीति, वत्सप्रीतिसे प्रांशु और प्रांशुसे प्रजापति नामक इकलौता पुत्र हुआ॥ २०-२२॥ प्रजापतिसे खनित्र, खनित्रसे चाक्षुष तथा चाक्षुषसे अति बल-पराक्रम-सम्पन्न विंश हुआ॥ २३-२५॥ विंशसे विविंशक, विविंशकसे खनिनेत्र, खनिनेत्रसे अतिविभूति और अतिविभूतिसे अति बलवान् और शूरवीर करन्धम नामक पुत्र हुआ॥ २६-२९॥ करन्धमसे अविक्षित् हुआ और अविक्षित्‌के मरुत्त नामक अति बल-पराक्रमयुक्त पुत्र हुआ, जिसके विषयमें आजकल भी ये दो श्लोक गाये जाते हैं॥ ३०-३१॥<br>'मरुत्तका जैसा यज्ञ हुआ था वैसा इस पृथिवीपर और किसका हुआ है, जिसकी सभी याज्ञिक वस्तुएँ सुवर्णमय और अति सुन्दर थीं॥ ३२॥ उस यज्ञमें इन्द्र सोमरससे और ब्राह्मणगण दक्षिणासे परितृप्त हो गये थे, तथा उसमें मरुद्गण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे'॥ ३३॥<br>उस चक्रवर्ती मरुत्तके नरिष्यन्त नामक पुत्र हुआ तथा नरिष्यन्तके दम और दमके राजवर्द्धन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ३४-३६॥ राजवर्द्धनसे सुवृद्धि,
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